अपने हितों’ के लिए जातियों में बंटे कर्मचारी संगठन

  • संगठनों की आपसी बयानबाजी और विरोधाभासी मांगों के कारण प्रशासनिक निर्णय उलझे

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र में कर्मचारियों के हितों के लिए आंदोलनरत रहने वाले संगठनों का उद्देश्य समय के साथ बदल गया है। पहले कर्मचारियों के लिए आवाज उठाने वाले अधिकांश संगठन अब अपने हितों के कारण जातियों में बंट गए हैं। आलम यह है कि प्रदेश में कर्मचारी संगठनों का स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। कर्मचारी संगठनों की आपसी बयानबाजी और विरोधाभासी मांगों के कारण प्रशासनिक निर्णय उलझते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति के पीछे कर्मचारी संगठनों के बीच बढ़ता आपसी मनमुटाव, राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़ाव और जातिगत आधार पर नए-नए संगठन बनाना प्रमुख कारण है। इससे न केवल संगठनों की विश्वसनीयता घटी है, बल्कि सरकार के सामने कर्मचारियों की आवाज भी कमजोर पड़ी है। संगठनों जुड़े नेता अब एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करने में जुटे हुए है। कर्मचारियों के हितों के लिए खड़े होने वाले संगठन अब से जातियों में बटकर रह गए।
आज स्थिति यह है कि राजनीतिक विचारधाराओं से शुरू हुई कर्मचारी एकजुटता अब खुलकर जातिगत खेमों में बंट चुकी है। सपाक्स, अजाक्स और अपाक्स जैसे संगठन जहां सवर्ण, अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के अधिकारी-कर्मचारियों के हितों की लड़ाई का दावा कर रहे हैं, वहीं दर्जनों गैर मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठन भी इसी तर्ज पर सक्रिय हो गए हैं। इसका सीधा असर न केवल कर्मचारियों के प्रमोशन और सुविधाओं पर पड़ रहा है, बल्कि विभागों के शासकीय कामकाज पर भी दिखाई देने लगा है। इससे सरकारी कर्मचारी भी अब जातिगत खेमों में बंटते नजर आ रहे हैं। स्थिति यह है कि वर्ग संघर्ष के चलते प्रमोशन, पदोन्नति से जुड़े लाभ और केंद्रीय सुविधाएं शर्तों के अनुरूप कर्मचारियों को नहीं मिल पा रही हैं। कर्मचारी संगठनों की आपसी बयानबाजी और विरोधाभासी मांगों के कारण प्रशासनिक निर्णय उलझते जा रहे हैं।
60 से अधिक संगठन, प्रभाव नहीं
प्रदेश में एक समय ऐसा भी था जब शासकीय तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ और लघु वेतन कर्मचारी संगठन जैसे गिने-चुने संगठन ही कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करते थे। उस दौर में पंडित एनपी शर्मा और सत्यनारायण तिवारी जैसे नेताओं के एक आह्वान पर हजारों कर्मचारी सड़कों पर उतर आते थे और मुख्यमंत्री निवास से सीधे संवाद के लिए बुलावा आ जाता था। आज हालात इसके ठीक उलट हैं। वर्तमान में प्रदेश में लगभग 20 मान्यता प्राप्त और 40 से अधिक गैर मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठन सक्रिय हैं। इसके बावजूद सरकार इन संगठनों से संवाद करने में रुचि नहीं दिखा रही। कई बार तो मंत्रालय में अधिकारी घंटों इंतजार कराने के बाद भी प्रतिनिधियों की बात सुनने को तैयार नहीं होते। जातिगत आधार पर संघों से जुड़ते कर्मचारियों सुविधाओं पर लगातार संकट बढ़ रहा है। अधिकारी कर्मचारी संयुक्त मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष एमपी द्विवेदी का कहना है कि किसी भी कर्मचारी संघ के नेता को जातियों के आधार पर सरकारी सेवकों का नेतृत्व नहीं करना चाहिए। अगर उसे ऐसा करना है तो वह पहले सेवा से इस्तीफा दे। फिर वह शुद्ध सामाजिक संघ का नेतृत्व करे।
अजाक्स के गठन के बाद बदली स्थिति
प्रदेश में 90 के दशक के बाद कर्मचारी संगठनों दिशा बदलती चली गई। अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी-कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व के लिए अजाक्स का गठन हुआ, जबकि पिछड़े वर्ग के शासकीय सेवकों के लिए अपाक्स संगठन सामने आया। वर्ष 2016 में जब अजाक्स ने प्रमोशन में आरक्षण को लेकर आंदोलन तेज किया, तो इसके विरोध में सवर्ण अधिकारी-कर्मचारियों ने सपाक्स संगठन खड़ा कर लिया। सपाक्स ने पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के शासकीय सेवकों को भी अपने साथ जोडऩे का दावा किया, लेकिन अब तक उसे शासन की मान्यता नहीं मिल पाई है। वर्तमान में अपाक्स और अजाक्स को जहां शासन की मान्यता प्राप्त है, वहीं एक अन्य गैर मान्यता प्राप्त पिछड़ा वर्ग अधिकारी-कर्मचारी संगठन भी सक्रिय है, जो समय-समय पर ओबीसी की मांगों के लिए आंदोल करता है। रिटायर्ड शिक्षक एवं संगठन मंत्री पिछड़ा वर्ग संघ के मुरारीलाल सोनी का कहना है कि पिछड़े वर्गों का सिर्फ उपयोग किया जा रहा है। सबसे अधिक आबादी के बाद भी इनकी भलाई नहीं। जिस प्रकार के हालात शासकीय सेवकों के बीच बन रहे हैं, उसको देखते हुए सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।

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