- पुलिस जल्द बनाएगी खुद का सैटेलाइट नेटवर्क

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र पुलिस अब हाईटेक पुलिसिंग की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। टेलीकॉम कंपनियों के नेटवर्क पर निर्भरता खत्म कर पुलिस खुद का कम्यूनिकेशन सिस्टम तैयार करने की योजना पर काम कर रही है। नए साल में पुलिस अपने सैटेलाइट की तैयारी शुरू कर रही है। सैटेलाइट प्रोजेक्ट फिलहाल प्लानिंग स्टेज में है। इसकी लागत, तकनीकी पहलू और अन्य व्यवस्थाओं पर काम चल रहा है। अनुमान है कि इस परियोजना पर 100 करोड़ से अधिक का खर्च आ सकता है। इससे मप्र पुलिस अपने सेटेलाइट पर दिए जाने वाले निर्देशों और रणनीतियों को अभेद बनाने जा रही है। अब अपनी पारंपरिक संचार प्रणाली के स्थान पर सैटेलाइट आधारित नेटवर्क पर शिफ्ट होने जा रही है। केंद्र सरकार के पुलिस वायरलेस समन्वय निदेशालय (डीसीपीडब्ल्यू) के मार्गदर्शन में होने वाला यह बदलाव राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा। पुलिस के नक्सल ऑपरेशन के दौरान यह देखा गया कि शातिर उपद्रवी पुलिस के वायरलेस संदेशों को बीच में इंटरसेप्ट कर लेते हैं, जिससे पुलिस की रेड या ऑपरेशन फेल हो जाते हैं। लेकिन 100 करोड़ रुपए के इस नए प्रोजेक्ट के बाद ऐसा करना नामुमकिन होगा। यह सिस्टम पूरी तरह एनक्रिप्टेड होगा, यानी पुलिस की हर बात कोड में सुरक्षित रहेगी जिसे कोई भी बाहरी व्यक्ति डिकोड नहीं कर पाएगा। इस नए सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसका डिजास्टर प्रूफ होना है। जब भी कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़ या भूकंप आता है, तो जमीन पर लगे मोबाइल टावर और बिजली लाइनें ठप हो जाती हैं। ऐसे समय में पुलिस का वायरलेस संपर्क टूट जाता है, जो राहत कार्यों में बड़ी बाधा बनता है। सैटेलाइट नेटवर्क सीधे अंतरिक्ष से संचालित होगा, इसलिए जमीन पर तबाही होने के बावजूद यह चौबीसों घंटे काम करेगा।
पुलिस की लाइन कभी बिजी नहीं होगी
मप्र पुलिस का यह सफर फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 1956 में प्रदेश की स्थापना के समय पुलिस सेना के रिजेक्टेड रेडियो सेट और मोर्स कोड (टिक-टिक वाली आवाज) के भरोसे थी। 1972 में पहली बार पुलिस के हाथ में वॉकी-टॉकी जैसे दिखने वाले वीएचएफ वायरलेस सेट आए। ये वेरी हाई फ्रीक्वेंसी पर काम करते थे। अब लगभग 70 साल बाद पुलिस बल सीधे अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल कर आधुनिक युग की चुनौतियों से लड़ने के लिए तैयार है। आम जनता के मोबाइल सिग्नल और पुलिस के नेटवर्क के बीच अक्सर ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति बन जाती है। इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए एक अलग रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम आवंटित किया है। इसका फायदा यह होगा कि पुलिस की लाइन कभी बिजी नहीं होगी। पारंपरिक वीएचएफ सिग्नलों को स्कैनर या रेडियो रिसीवर की मदद से आसानी से इंटरसेप्ट किया (चोरी-छिपे सुना) जा सकता है। अपराधी पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखने इसका फायदा उठाते रहे हैं। अब सैटेलाइट संचार आधुनिक डिजिटल एन्क्रिप्शन का उपयोग करता है। इसमें सूचनाओं को कोड में बदल दिया जाता है, जिससे बातचीत को डिकोड करना नामुमकिन हो जाता है। वीएचफ सिस्टम केवल वॉयस कम्युनिकेशन के लिए बना है। इसके जरिए बड़ी फाइलें, हाई क्वालिटी वीडियो या लाइव लोकेशन साझा करना बहुत धीमा या असंभव होता है।
हर जगह एक समान काम करेगा यह सिस्टम
आधुनिक सैटेलाइट सिस्टम उच्च बैंडविड्थ पर चलते हैं। इसके जरिए रियल-टाइम वीडियो स्ट्रीमिंग, बायोमेट्रिक डेटा और जटिल डेटा फ़ाइलों को पलक झपकते ही ट्रांसफर किया जा सकता है। प्रदेश में इस तकनीकी बदलाव पर लगभग 100 करोड़ का खर्च आएगा। इस नए सिस्टम को अपनाने जल्द ही टेंडर की प्रक्रिया शुरू होगी। इसका एक बड़ा फायदा असीमित कवरेज के रूप में भी मिलेगा। वर्तमान वीएचएफ रेडियो लाइन ऑफ-साइट सिद्धांत पर काम करता है। इसकी सीमा आमतौर पर 40-60 किमी तक होती है। पहाड़ों, ऊंची इमारतों या घने जंगलों के कारण इसके सिग्नल बाधित हो जाते हैं। इससे उलट सैटेलाइट संचार में दूरी मायने नहीं रखती। सिग्नल सीधे अंतरिक्ष में स्थित उपग्रह से आते हैं, इसलिए यह ऊंचे पहाड़ों से लेकर गहरे जंगलों और सुदूर ग्रामीण इलाकों तक समान रूप से काम करता है। वीएचएफ में रेडियो फ्रीक्वेंसी का ओवरलैप होना एक समस्या है। ऐसे में इसमें काफी नॉयस और डिस्टर्बेस आता है। जबकि सैटेलाइट फ्रीक्वेंसी बहुत ऊंची होती है, जिससे स्थानीय रेडियो तरंगों का असर नहीं होता और आवाज क्रिस्टल क्लियर होती है।
