नियुक्तियों पर घमासान, बढ़ी खींचतान

नियुक्तियों पर घमासान
  • अधर में कांग्रेस संगठन सृजन अभियान  

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में संगठन को मजबूत बनाने के लिए आलाकमान ने संगठन सृजन अभियान चला रखा है। वहीं दूसरी तरफ पार्टी में नियुक्तियों पर घमासान मचा हुआ है। इस कारण नेताओं के बीच खींचतान बढ़ गई है। दरअसल, कांग्रेस में मनमर्जी की स्थिति आए दिन दिखाई दे रही है। कभी कोई संगठन मंत्री नियुक्त कर देता है तो कभी कोई समिति बना देता है। जबकि, सबके लिए एक प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र निर्धारित है। नियुक्तियों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। हालही में प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में तो प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए बनाए गए बूथ लेवल एजेंटों  की सूची पर ही संदेह जता दिया। जिला और ब्लॉक अध्यक्ष की नियुक्तियों को लेकर कई आपत्तियां सामने आ चुकी हैं। टैलेंट हंट के लिए बनाई समिति का आदेश भी विवादों में घिर गया। मामला बढ़ा तो प्रदेश मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक ने पद से त्यागपत्र दे दिया। जैसे-तैसे उन्हें मनाया गया पर इससे एक बात तो साफ हो गई कि कांग्रेस में संगठन के सशक्तीकरण के लेकर चल रहे प्रयासों में अभी बहुत काम करने की आवश्यकता है।
गौरतलब है कि प्रदेश में चुनावों में लगातार मिल रही हार के बाद कांग्रेस ने वर्ष 2025 को संगठन वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया। उद्देश्य साफ था कि भाजपा से यदि चुनाव में मुकाबला करना है तो पहले संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत बनाना होगा। इसके लिए चहेतों को पद देकर उपकृत करने के स्थान पर संगठन सृजन अभियान के माध्यम से जिला अध्यक्षों की नियुक्ति की गई। ताजा मामला प्रदेश में प्रवक्ताओं की नियुक्ति के लिए टैलेंट हंट कार्यक्रम करने के लिए समिति गठित करने से जुड़ा है। प्रदेश संगठन ने 11 सदस्यीय समिति गठित की। इसके बाद 23 दिसंबर को मीडिया विभाग के अध्यक्ष मुकेश नायक ने आदेश जारी कर दिए। इसमें राष्ट्रीय आदिवासी कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया को भी सदस्य बना दिया, जबकि राष्ट्रीय पदाधिकारी की किसी भी समिति में नियुक्ति से पहले केंद्रीय संगठन से सहमति आवश्यक है। इस आदेश को प्रभारी महासचिव अभय तिवारी ने निरस्त कर दिया। मामला बढ़ा तो मुकेश नायक ने पद से त्यागपत्र दे दिया। यद्यपि, प्रदेश अध्यक्ष ने इसे अस्वीकार कर दिया, मगर विवाद तो खड़ा हो ही गया।
वरिष्ठों में ही समन्वय नहीं
 संगठन को मजबूत करने के लिए कांग्रेस संगठन सूजन अभियान चला रही है। अभियान के तहत संगठन में विभिन्न स्तरों पर पदाधिकारियों की नियुक्तियां की जा रही हैं, लेकिन इन नियुक्तियों को लेकर पार्टी में खीचतान जारी है। पार्टी के नेता नियुक्तियों का विरोध कर रहे हैं। यहां तक की प्रदेश कांग्रेस प्रभारी ने नवंबर में जिला संगठन मंत्रियों की नियुक्तियां निरस्त कर दी थीं। ऐसे में कांग्रेस के संगठन के सूजन पर सवाल उठ रहे हैं। संगठन सूजन अभियान के तहत पार्टी ने अगस्त में 71 जिला व शहर कांग्रेस अध्यक्षों की घोषणा की थी। इंदौर, भोपाल, सतना, गुना सहित अन्य जिलों में जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों को लेकर स्थानीय नेताओं ने जमकर विरोध किया था। यहां तक की इंदौर ग्रामीण जिला अध्यक्ष की नियुक्ति के विरोध में स्थानीय नेताओं ने दिल्ली स्थित पार्टी कार्यालय पहुंचकर विरोध जताया था। भोपाल में भी विरोध प्रदर्शन किया गया था। सतना जिला कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति के विरोध में वहां के स्थानीय नेताओं ने भोपाल में पार्टी कार्यालय के बाहर धरना दिया था। जैसे-तैसे यह मामला शांत हुआ, तो जिला संगठन मंत्रियों की नियुक्ति का विवाद सामने आ गया। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने जिला संगठन मंत्रियों की नियुक्तियां कर दीं, जिसे प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि पहले केंद्रीय संगठन से अनुमोदन लिया जाना था। उनका यह भी कहना था कि कांग्रेस में जिला संगठन मंत्री पद की परंपरा नहीं है। पार्टी कार्यालय में हुई प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में तो प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए बनाए गए बूथ लेवल एजेंटों (बीएलए) की सूची पर ही संदेह जता दिया था।
लगातार बढ़ रहा विवाद
ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति में भी लगभग यह स्थिति बनी। पहली बार एक साथ 780 ब्लॉक अध्यक्ष नियुक्त किए गए लेकिन रतलाम, आलीराजपुर सहित अन्य जगह विवाद सामने आए। जिला अध्यक्षों ने व्यक्तिगत कारण बताते हुए अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिए। दरअसल, संगठन सृजन अभियान में यह कहा गया था कि जिले में नियुक्ति से लेकर कोई भी निर्णय जिला अध्यक्षों की सहमति के बिना नहीं होगा, पर नियुक्तियों में कोई पूछपरख नहीं हुई। संगठन महामंत्री संजय कामले कहते हैं कि पीढ़ी परिवर्तन हो रहा है। 71 जिले, 1,047 ब्लॉक, 230 विधानसभा समिति से लेकर 71 हजार मतदान केंद्रों पर संगठन को खड़ा करना बड़ी बात है। जब बड़े स्तर पर काम होता है तो कुछ असहमति होना अस्वभाविक नहीं है। समन्वय बनाना किसी एक का काम नहीं, सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। संवाद में बड़ी शक्ति होती है, जहां तक त्यागपत्र की बात है तो वे अस्वीकार किए जा चुके हैं।

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