आदिवासी अंचल में पलायन की मजबूरी

  • आजीविका के अभाव में मौसमी और स्थायी पलायन बनी गंभीर समस्या

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र के आदिवासी अंचलों (विशेषकर झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बड़वानी, खरगोन और डिंडोरी) में लोग आजीविका के अभाव में मौसमी और स्थायी पलायन के गंभीर शिकार हैं। एक अनुमान के अनुसार, इन क्षेत्रों की एक बड़ी आबादी काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर है। यह पलायन कृषि पर निर्भरता, गरीबी और वन संसाधनों में कमी के कारण होता है। आदिवासियों के पलायन की कई वजहें हैं। अधिकांश आदिवासी क्षेत्रों में खेती केवल मानसून पर निर्भर है, जिससे साल के बाकी महीनों में वे बेरोजगार हो जाते हैं और पलायन करते हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों की कमी और कर्ज का बोझ उन्हें मजबूरी में पलायन करने के लिए प्रेरित करता है। जानकारी के अनुसार पारंपरिक आजीविका के साधन (जंगल और वन उपज) कम होने से भी लोग रोजी-रोटी के लिए शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। वहीं विकास, बांध, और वन्यजीव अभयारण्य के कारण कई बार आदिवासियों को अपनी जमीन और घर छोड़कर विस्थापित होना पड़ता है। रोजगार के अन्य साधन न होने के कारण भी वे अकुशल श्रमिक के रूप में काम करने के लिए मजबूर होते हैं।
आदिवासियों के पलायन के तीन स्वरूप हैं। मौसमी पलायन को स्थानीय भाषा में नवाडभी कहा जा सकता है, जहां लोग फसल कटने के बाद नवंबर से जून के बीच काम की तलाश में जाते हैं। वहीं कुछ परिवार काम की तलाश में स्थायी रूप से शहरों में बस जाते हैं, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में उनके पास आजीविका के साधन नहीं बचते। वहीं  गंतव्य पलायन के तहत वे मुख्य रूप से इंदौर, भोपाल, मुंबई, गुजरात और राजस्थान जैसे निकटवर्ती शहरों में ईंट भट्टों, निर्माण स्थलों, और ढाबों पर अकुशल श्रमिक के रूप में काम करते हैं। पलायन करने वाले आदिवासी परिवारों को अक्सर कम मजदूरी, बाल श्रम और ठेकेदारों के शोषण का सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और पलायन के कारण बच्चों की शिक्षा में बाधा उत्पन्न होती है, जिससे वे कुपोषण और बीमारी के शिकार होते हैं। मौसमी और स्थायी पलायन को लेकर सरकार भी चिंतित है, तो राजनैतिक दलों में भी अपना वोट बैंक खिसकने का डर सता रहा है। हालांकि पिछले दो वर्षों में मौजूदा सरकार ने इस स्थिति को थामने के प्रयास किए हैं, जिस पर अभी और काम होना बाकी है। जानकारों की मानें तो श्योपुर सहित कुछ अन्य आदिवासी अंचलों से युवा राजस्थान या दूसरे प्रांतों में मौसमी पलायन कर जाते हैं। यानि ये युवा स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिलने की वजह से पड़ोसी राज्यों में फसलों की कटाई के लिए कई महीनों तक अपना घर-बार छोड़ देते हैं। बताया गया है कि इनमें कई युवा दूसरे प्रांतों में कटाई करने के साथ-साथ वहां पर स्थानीय रोजगार तलाशने लगते हैं, जिससे वे वहीं रहने लगते हैं, यानी कि मौसमी पलायन स्थायी पलायन में तब्दील हो जाता है।
केंद्र सरकार की रिपोर्ट में सामने आई हकीकत
गौरतलब है कि वर्ष 2011 की जनसंख्या के आधार पर राज्य की कुल आबादी का 21.1 प्रतिशत आदिवासी हैं। यानि 1.53 करोड़ आदिवासी समुदाय के लोग मध्यप्रदेश में निवास करते हैं, यह देश के दूसरे राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है। अगर आदिवासी जाति वर्ग के हिसाब से देखा जाए, तो प्रदेश में भील सबसे बड़ी जाति है, इसके बाद गौड़ हैं। इनके अलावा सहारिया, कोटकू और बैगा व अन्य जनजातियां आती हैं। झाबुआ, धार, बड़वानी, खरगोन, डिंडौरी, श्योपुर, शहडोल और आलीराजपुर जैसे जिलों के कुछ अंचलों में आदिवासी आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है। देश भर के आदिवासी अंचलों से जनजातियों का शहरों की ओर पलायन को लेकर वर्ष 2018 में केन्द्र सरकार की जनजातीय स्वास्थ्य पर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में भी इस बात का उल्लेख किया गया था कि जनजातीय क्षेत्रों से पलायन जैसी स्थिति है। इसमें मध्य प्रदेश भी शामिल है। इसके पीछे आदिवासी अंचलों में खनन, विस्थापन और वन पट्टे निरस्त होने जैसे कारण बताए गए हैं। मध्यप्रदेश में भी पिछले 4 वर्षों में 1,30 हजार हेक्टेयर से अधिक आदिवासी बाहुल्य भूमि खनन के लिए आरक्षित की गई है। इसी तरह 11 नए अभयारणों के निर्माण के कारण 22 प्रतिशत आदिवासी आबादी पर विस्थापन का भी खतरा उत्पन्न होने की वजह से संबंधित क्षेत्रों से भी पलायन जैसी स्थिति निर्मित हुई है।
पलायन रोकने सरकार ने उठाए कदम
जानकारों की मानें तो मौजूदा सरकार ने इस दिशा में गहराई से अध्ययन करने के उपरांत पलायन रोकने की दिशा में रणनीति के तहत काम किया है। इसका असर भी कुछ जिलों में हुआ है। विशेषकर सरकार स्थानीय रोजगार की उपलब्धता को सुनिश्चित करने कई तरह की योजनाएं संचालित कर रही है। युवाओं को जहां इन योजनाओं से जोडऩे का प्रयास किया गया है, तो वहीं युवाओं को उनके कौशल के आधार पर उन्हें प्रशिक्षित कर रोजगार से जोडने के लिए भी काम किया जा रहा है। लेकिन अभी भी सरकार को अपने तय लक्ष्य को पाने के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे। राज्यसभा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी का कहना है कि कुछ वर्षों में जिस तरह से आदिवासी अंचलों में लिफ्ट एरिगेशन के जरिए खेतों में सिंचाई की सुविधाएं बढ़ी हैं, उससे आदिवासी खेतों में साल में दो फसलों की खेती करने लगे हैं। इसी तरह इन क्षेत्रों में अधोसंरचना के कार्यों में तेजी होने से मानव संसाधन की वजह से पलायन में काफी कमी आई है। सरकार के हालिया सर्वे को मानें तो खेती किसानी की वजह से पलायन करने वाले आदिवासियों की संख्या न्यूनतम तक पहुंच गई है। धार, मनासा और दूसरे क्षेत्रों में औद्योगिक संस्थानों के स्थापित होने ने भी आदिवासी पलायन को रोक दिया है।

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