80 हजार पौधों के लिए बजट का संकट

  • अयोध्या बायपास प्रोजेक्ट में हरियाली की भरपाई पर सवाल
  • 4.72 करोड़ में 15 साल तक पौधों की देखभाल कैसे होगी, जबकि अनुमानित खर्च 40 करोड़ रुपये

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। विकास की रफ्तार के सामने पेड़ों की कटाई में महज आठ दिन लगे, लेकिन उनकी भरपाई के लिए 80 हजार पौधे लगाने और उन्हें 15 साल तक जीवित रखने की व्यवस्था अब तक बजट के सवालों में उलझी है। भोपाल के अयोध्या बायपास को 10 लेन में विकसित करने की परियोजना में 7,871 पेड़ों की कटाई के बदले क्षतिपूर्ति पौधरोपण की योजना बनाई गई है। इसके लिए जमीन तलाशने और उसे उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन पौधे कहां से आएंगे, उन्हें लगाने वाली एजेंसी कौन होगी और लंबे समय तक रखरखाव का खर्च कौन उठाएगा, इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने नहीं आए हैं। जिला प्रशासन ने हुजूर क्षेत्र के झिरनिया में करीब 180 एकड़ जमीन खाली कराकर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू की है। योजना के तहत 80 हजार पौधे लगाए जाने हैं। इनमें से 58 हजार पौधे झिरनिया, 12 हजार झांगरिया खुर्द और 10 हजार अयोध्या बायपास के किनारे लगाए जाने का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त नगर निगम के पार्कों में एक हजार पौधे लगाने की योजना भी बताई गई है।
सबसे बड़ा सवाल बजट का है। नगर निगम ने पेड़ों की कटाई के एवज में प्रति पेड़ छह हजार रुपये के हिसाब से करीब 4.72 करोड़ रुपये जमा कराए हैं। यदि इसी राशि से 80 हजार पौधों का रोपण और उनकी देखभाल करनी है, तो प्रति पौधा औसतन 590 रुपये ही उपलब्ध होंगे। जबकि छह फीट ऊंचे पौधे लगाने और उनके 15 साल तक रखरखाव का अनुमानित खर्च प्रति पौधा पांच हजार रुपये माना जाए, तो कुल लागत 40 करोड़ रुपये पहुंचती है। यानी प्रस्तावित व्यवस्था और अनुमानित खर्च के बीच करीब 35.28 करोड़ रुपये का अंतर है।
जमीन की व्यवस्था शुरू, पौधे और बजट का इंतजार
क्षतिपूर्ति पौधरोपण के लिए झिरनिया में 180 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है। योजना के मुताबिक, यहां 58 हजार पौधे लगाए जाएंगे। झांगरिया खुर्द में 12 हजार पौधों का रोपण प्रस्तावित है। इसके अलावा बायपास पर आशाराम तिराहे से रत्नागिरी चौराहे तक सडक़ के दोनों ओर 10 हजार पौधे लगाने की योजना है। पौधों की ऊंचाई छह फीट रखने की शर्त है। इसके लिए नीम, आम, महुआ, शीशम, सागौन और अन्य देशी प्रजातियों के पौधों की बड़ी संख्या में जरूरत पड़ेगी। इतने बड़े पैमाने पर पौधों की उपलब्धता, उनकी गुणवत्ता, परिवहन और रोपण की व्यवस्था पहले से सुनिश्चित करनी होगी। लेकिन योजना के सामने सवाल केवल पौधे खरीदने का नहीं है। पौधरोपण के लिए गड्ढे खोदने, मिट्टी तैयार करने, पौधों को सुरक्षित तरीके से लगाने, पानी और खाद उपलब्ध कराने तथा उन्हें सूखने से बचाने के लिए भी खर्च करना होगा। इसके बाद कई वर्षों तक सुरक्षा और निगरानी की जरूरत पड़ेगी। यदि शुरुआत में ही पौधों की उपलब्धता और रखरखाव के लिए पर्याप्त राशि तय नहीं होती, तो बड़े पैमाने पर पौधे लगाने के बावजूद उनके जीवित रहने की गारंटी देना कठिन होगा। इसलिए जमीन उपलब्ध कराने के साथ वित्तीय और क्रियान्वयन संबंधी तैयारी भी जरूरी है।
पौधों की जिम्मेदारी किसकी, निगरानी कौन करेगा?
क्षतिपूर्ति योजना के क्रियान्वयन को लेकर कई व्यावहारिक सवाल उठ रहे हैं। 80 हजार छह फीट ऊंचे पौधे एक साथ उपलब्ध कराने वाली नर्सरियों की पहचान, पौधों की खरीद, परिवहन और रोपण के लिए एजेंसी का चयन अभी स्पष्ट नहीं बताया गया है। इसी तरह 15 साल तक रखरखाव के लिए बजट और जिम्मेदारी तय होने की जानकारी भी सामने नहीं आई है। यह भी महत्वपूर्ण है कि पौधरोपण के बाद निगरानी की व्यवस्था कैसे होगी। कितने पौधे लगाए गए, कितने जीवित हैं, कितने सूख गए और उनकी जगह नए पौधे लगाए गए या नहीं—इन सबका नियमित रिकॉर्ड होना चाहिए। केवल रोपण के समय की तस्वीरों या शुरुआती रिपोर्ट के आधार पर योजना की सफलता तय नहीं की जा सकती।
590 रुपये में 15 साल की देखभाल कैसे?
इस परियोजना में क्षतिपूर्ति पौधरोपण की सफलता का आकलन केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं किया जा सकता। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि पौधे जीवित रहें और बड़े होकर हरियाली की भरपाई में योगदान दें। उपलब्ध अनुमान के अनुसार, छह फीट ऊंचे देशी प्रजातियों के पौधे लगाने और उनके 15 साल तक रखरखाव पर प्रति पौधा 3,500 से 6,500 रुपये तक खर्च आ सकता है। पांच हजार रुपये प्रति पौधा के औसत अनुमान से 80 हजार पौधों की कुल लागत 40 करोड़ रुपये होगी। इसके मुकाबले 4.72 करोड़ रुपये की राशि को 80 हजार पौधों पर बांटने से प्रति पौधा करीब 590 रुपये मिलते हैं। यह अंतर इस बात की ओर संकेत करता है कि पौधरोपण और दीर्घकालीन देखभाल के लिए अलग से बजट की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि, वास्तविक लागत पौधों की प्रजाति, स्थान, सिंचाई, सुरक्षा व्यवस्था और रखरखाव के मॉडल पर निर्भर करेगी। देशी प्रजातियों के पौधे स्थापित होने के बाद अपेक्षाकृत कम देखभाल में विकसित हो सकते हैं, लेकिन शुरुआती वर्षों में नियमित पानी, सुरक्षा और निगरानी जरूरी है। ऐसे में केवल पौधे खरीदने की लागत नहीं, बल्कि उनकी जीवित रहने की दर और देखभाल की जवाबदेही भी योजना का हिस्सा होनी चाहिए।
बायपास पर पौधे लगाने के लिए जगह भी चुनौती
योजना का एक हिस्सा उसी अयोध्या बायपास के किनारे पौधे लगाने से जुड़ा है, जहां सडक़ को चार लेन से बढ़ाकर 10 लेन करने का प्रस्ताव है। यहां 10 हजार पौधे लगाए जाने हैं। ऐसे में सडक़ विस्तार, सर्विस रोड और अन्य निर्माण कार्यों के बीच पौधरोपण के लिए पर्याप्त जगह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा। परियोजना में करीब 16 किलोमीटर लंबे बायपास का विस्तार किया जाना है। इसमें 7.5 मीटर चौड़ी सर्विस रोड के दोनों ओर व्यवस्था, आठ फ्लाईओवर और एक रेलवे ओवरब्रिज का निर्माण प्रस्तावित है। परियोजना की लागत 836 करोड़ रुपये बताई गई है। ऐसे में सडक़ किनारे पौधरोपण के लिए उपलब्ध भूमि, उपयोगिता सेवाओं, यातायात सुरक्षा और निर्माण की सीमाओं को ध्यान में रखकर स्थान तय करना होगा। यदि पौधे लगाने के लिए जमीन पहले से चिन्हित नहीं की गई, तो बाद में निर्धारित लक्ष्य पूरा करने में मुश्किल आ सकती है। नगर निगम के पार्कों में एक हजार पौधे लगाने की योजना भी है। इसके लिए चिनार, स्मार्ट सिटी, मयूर और स्वर्ण जयंती सहित अन्य पार्कों का उल्लेख किया गया है। यहां भी पौधों की देखभाल, सिंचाई और निगरानी की जिम्मेदारी स्पष्ट होना जरूरी है।

Related Articles