- शीला मिश्रा

बसंत ऋतु इस देश में सबसे पसंद की जाने वाली ऋतु है क्योंकि इस समय प्रकृति अपने यौवन में होती है और उसकी सुन्दरता आंखों को चमत्कृत कर जाती है। प्रकृति श्रृंगार से ऐसे संवर उठती है कि पलकें झपकना भूल जातीं हैं और मन बावरा हो उठता है। जौ और गेहूं की बालियों का लहलहाना, खेतों में पीली सरसों की चादर का बिछ जाना, रंग-बिरंगे पुष्पों की छटा बिखर जाना, अलमस्त हवा का बहना,आम के पेड़ों का बौर से लद जाना फिर मदमाती गंध का बिखरना; ये सब बसंत ऋतु का सौन्दर्य है तिस पर रंग-बिरंगी तितलियों का घूम-घूमकर नृत्य करना और कोयल की कूक का कानों में रस घोलना , ये सब कितना आनंददायी , कितना मनमोहक है तभी तो प्रकृति को प्रसन्न देख मनुष्य में भी नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। बसंत ऋतु का आध्यात्मिक पक्ष विद्या की देवी माँ वीणा पाणि से जुड़ा हुआ है। वास्तव में आज विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती का पूजन किया जाता है। कला के क्षेत्र से जुड़े सभी साधक चाहे वह लेखक हों, वादक हों, गायक हों, आज अपने-अपने उपकरणों की पूजा करते हैं। वहीं दूसरी ओर छात्र माँ वीणा पाणि के सामने अपनी पुस्तक रखकर उनसे प्रार्थना करते हैं मुझे ज्ञान प्राप्त हो।
इस संबंध में पुराणों में एक कथा का उल्लेख मिलता है। जब इस धरती में मनुष्य योनि की रचना की गई तब सब ओर मौन व्याप्त था। सृष्टि में छाये सूनेपन को देखकर ब्रह्माणी ने विष्णु भगवान की आज्ञा लेकर पृथ्वी में जल छिडक़ा और जल के गिरते ही एक देवी प्रकट हुई जिसे माँ वीणा पाणि कहा गया क्योंकि उनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर की मुद्रा में था। वे बाकी दो हाथों में ग्रंथ एवं माला धारण किए हुए थीं। ब्रह्मा जी ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया और जैसे ही उन्होंने वीणा बजाना आरंभ किया, मधुर नाद से पूरी सृष्टि को वाणी प्राप्त हो गई, ध्वनि को सरस प्रवाह देने के कारण ब्रह्मा जी ने देवी को सरस्वती कहा। इनको भगवती, वीणा पाणि, वीणा वादिनी आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ पीले कपड़े पहन कर पूजा के स्थान पर एक पटा रखकर उसमें साफ पीला कपड़ा बिछाकर मांँ सरस्वती की मूर्ति रखी जाती है। रोली, हल्दी, पीले फूल, गुलाब चढ़ाए जाते हैं और पीले मिष्ठान्न का भोग लगाया जाता है?। विद्यार्थी गण अपनी पुस्तक माँ के सामने रख देते हैं इस आशा के साथ कि उन्हें विद्या की प्राप्ति हो और इस श्लोक का पाठ किया जाता है :-
या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रावृत्ता
या वीणा वरदण्ड मंडितकरा या श्वेत पद्मासना
या ब्रह्माच्युत शंकर प्रभृतिर्भि दैवै: सदा वंदिता
सा माम् पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा।
और अगर हम साहित्य की बात करें तो हिंदी साहित्य के महान कवि श्री सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का जन्म भी बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था और संयोग देखिए, उन्होंने माँ वीणा पाणि की स्तुति में ऐसी रचना की, जो आज प्रत्येक कार्यारंभ में गाई जाती है,वीणा वादिनी वर दे
आज के ही दिन बच्चे का विद्यारंभ कराया जाता है। जब बच्चा तीन साल का हो जाता है, तब बसंत पंचमी के दिन ही स्लेट पर चॉक से उसके हाथ से गणेश भगवान का ‘ग’ लिखवाकर माँ वीणापाणि का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस प्रकार से पूजन करके विद्यारंभ किया जाता है तो बच्चे की शिक्षा के प्रति रुचि जागृत होती है उसकी बुद्धि कुशाग्र होती है। इसीलिए यह उत्सव नव-सृजन का उत्सव कहलाता है।
