प्रदेश पदाधिकारियों के बाद होगी जिलों में नियुक्ति

  • मप्र में भाजपा संगठन पदाधिकारियों की नियुक्ति पर मंथन तेज
  • गौरव चौहान
प्रदेश पदाधिकारियों

मप्र में वर्तमान में भाजपा का फोकस संगठन के विस्तार पर है। भाजपा सूत्रों की माने तो पार्टी पहले प्रदेश संगठन का गठन करेगी। इसके लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में मंथन चल रहा है। मप्र भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की मंशानुसार प्रदेश संगठन में सारे समीकरणों पर नजर रखते हुए नेताओं को नियुक्ति दी जाएगी। उसके बाद जिलों की कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा। इसके पीछे भाजपा की मंशा है कि प्रदेश पदाधिकारियों के साथ समन्वय बनाकर जिलों की कार्यकारिणी का गठन किया जाए।
निगम-मंडलों और आयोगों में अपनी राजनीतिक नियुक्तियों का इंतजार कर रहे भाजपा नेताओं को एक बार फिर थोड़ा इंतजार करना पड़ सकता है। संगठन और सरकार ने इन नियुक्तियों से पहले संगठन की टीम तैयार करने का निर्णय लिया है। संगठन ने तय किया है कि पहले जिलों में टीमें बनाई जाएंगी और उसके बाद प्रदेश कार्यकारिणी का गठन होगा। इसके बाद ही पार्टी नेताओं को निगम-मंडल और आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियों के जरिए समायोजित किया जाएगा। प्रदेश के कई भाजपा नेता पिछले 20 महीनों से राजनीतिक नियुक्तियों का इंतजार कर रहे हैं। सरकार बनने के दो महीने बाद ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पिछले साल फरवरी में अधिकांश निगम-मंडलों और बोर्डों के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों को हटा दिया था। तब से लेकर अब तक अटकलें लग रही थीं कि लोकसभा चुनावों के बाद कार्यकर्ताओं की राजनीतिक नियुक्तियां की जाएंगी।
2020 से नहीं हुआ बदलाव
जानकारी के अनुसार, खंडेलवाल की टीम के गठन की तैयारी अंतिम चरण में है। सूत्रों का कहना है कि प्रदेश पदाधिकारियों की नियुक्ति के बाद जिला पदाधिकारी बनाए जाएंगे। तीसरे चरण में निगम- मंडल में नियुक्तियों की बारी आएगी। जिलों में चल रही खींचतान के चलते जिला कार्यकारिणी गठन का कार्य आगे भी बढ़ाया जा सकता है। वजह यह है कि भोपाल, इंदौर सहित कई जिलों में मंत्री, सांसद और विधायक अपने समर्थकों को जिला कार्यकारिणी में स्थान दिलाना चाहते हैं। पार्टी ने जिला कार्यकारिणी के गठन से पहले सभी जिलों में पर्यवेक्षक भी भेजे थे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट संगठन को सौंप दी है। रिपोर्ट को लेकर हेमंत खंडेलवाल और प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद के बीच एक दौर की बातचीत भी हो चुकी है। साथ ही, प्रदेश कार्यकारिणी के गठन पर राज्य और केंद्रीय नेतृत्व के बीच भी चर्चा हो चुकी है। मध्य प्रदेश में पूर्व भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा का कार्यकाल लगभग साढ़े पांच वर्ष का रहा। फरवरी 2020 में तत्कालीन अध्यक्ष राकेश सिंह की जगह उनकी नियुक्ति की गई थी। तब से अब तक अधिकांश जिलाध्यक्ष, उनकी टीम और प्रदेश पदाधिकारियों की टीम में कोई बदलाव नहीं हुआ है। वर्ष 2024 में संगठन चुनाव के बाद इस वर्ष जुलाई में प्रदेश अध्यक्ष पद पर हेमंत खंडेलवाल का निर्वाचन तो हो गया लेकिन अब तक उन्होंने अपनी नई टीम नहीं बनाई है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति का इंतजार
पार्टी सूत्रों के अनुसार पहले यह तय किया गया था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा के बाद ही प्रदेश की नई टीम को चुना जाएगा। केंद्रीय नेतृत्व ने फिलहाल बदलाव नहीं किया है। बीते सप्ताह हेमंत खंडेलवाल, हितानंद और मुख्यमंत्री मोहन यादव दिल्ली गए थे। जहां राष्ट्रीय संगठन संयुक्त महासचिव शिवप्रकाश के साथ नई टीम के गठन को लेकर चर्चा हुई। चुने गए पदाधिकारियों की सूची भी राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष को सौंप दी गई है। जो केंद्रीय नेतृत्व की सहमति के बाद जारी की जाएगी। पार्टी नेताओं ने यह भी दावा किया कि जिला कार्यकारिणी का विवाद जल्द सुलझा लिया जाएगा और वह भी घोषित कर दी जाएगी।खंडेलवाल का फोकस राजनीतिक नियुक्तियों पर है। जिलों से उम्मीदवारों के नाम लिए जा चुके हैं। जिला अध्यक्षों से नाम लेने के बाद पार्टी ने जिलों में पर्यवेक्षक भी भेजे, जिनमें से अधिकतर ने उपयुक्त नाम तलाशे और संगठन के शीर्ष नेतृत्व को सौंप दिए हैं। पार्टी इन नामों पर विचार करके कार्यकारिणी और राजनीतिक नियुक्तियों में चयन करेगी। बताया जा रहा है कि इस पूरी प्रक्रिया में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका अहम होगी। सूत्रों के अनुसार, राजनीतिक नियुक्तियों और कार्यसमिति में सदस्यों के चयन में आरएसएस की राय महत्वपूर्ण होगी।
खंडेलवाल पर सबको साधने की चुनौती
खंडेलवाल के सामने सबको साधने की चुनौती है। देखना होगा कि वे कैसे ‘सबके साथ’ और ‘सबका साथ’ के वाक्य पर सही उतरते हैं। नजदीक में आने वाली सबसे बड़ी चुनौती की बात करें तो राजनीतिक नियुक्तियां हैं। निगम, मंडल, बोर्डों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष और जिलों में दीनदयाल अंत्योदय समितियों में पदाधिकारियों की नियुक्तियां होनी हैं। इनकी चर्चा लंबे समय से है, पर अब निर्णय नए अध्यक्ष और सरकार के समन्वय से होना है। इसी तरह से सत्ता और सरकार के बीच तालमेल बनाकर रखना भी सामान्य बात नहीं होगी। कारण, भले ही मुख्यमंत्री उनके साथ हैं, लेकिन मंत्रियों की अपनी अपेक्षाएं हैं। इसी तरह से संगठन और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं भी सरकार से हैं। संगठन का मुखिया होने के नाते खंडेलवाल के सामने यह चुनौती रहेगी कि कार्यकर्ता निराश होकर टूटने न पाएं। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस से कई बड़े-छोटे नेताओं ने भाजपा का दामन थामा था। इनमें कुछ तो पार्टी में घुल-मिल गए तो कुछ अभी भी अलग-थलग हैं। कोई दायित्व नहीं मिलने पर वे उलझन में हैं।

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