मिशन मोड में मोहन ‘राज’

 मोहन ‘राज’
  • चुनावों और सिंहस्थ पर फोकस…

वर्ष 2026 का आगाज होते ही मप्र में चुनावी माहौल बनने लगा है। इसकी वजह है प्रदेश में इस साल सहकारिता, मंडी और जल उपभोक्ता समिति के चुनाव, 2027 में नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायतराज संस्थाओं के चुनाव तथा 2028 के अंत में विधानसभा के चुनाव होने हैं। वहीं विधानसभा चुनाव से सिंहस्थ होना है। ऐसे में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार मिशन मोड में आ गई है।

गौरव चौहान/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मप्र में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनकी सरकार के सामने विकास के साथ ही चुनाव और सिंहस्थ पर फोकस है। इसके लिए सरकार नए साल की शुरूआत के साथ ही मिशन मोड में आ गई है। दरअसल, आगामी तीन साल सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं। एक तरफ सरकार को जहां आगामी तीन सालों के दौरान 6 चुनाव कराने हैं, वहीं सरकार के मुखिया को अपनी पार्टी के साथ मिलकर भाजपा की जीत के लिए भी काम करना है। इस कारण नए साल यानी 2026 की शुरुआत से सरकार मिशन इलेक्शन मोड में आ गई है। दरअसल, 2026 में सहकारिता, मंडी और जल उपभोक्ता समिति के चुनाव होने हैं। वहीं 2027 में नगरीय निकाय और त्रिस्तरीय पंचायतराज संस्थाओं के चुनाव तथा 2028 के अंत में विधानसभा के चुनाव होने हैं। चुनावों के साथ ही सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिंहस्थ है। सिंहस्थ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं होता है, बल्कि इसे शासन, प्रशासन और समाज के समन्वय क्षमता की परीक्षा भी माना जाता है। मोहन यादव के सामने यह अवसर है कि वे अपनी पहचान सिर्फ एक राजनेता तक सीमित न रखें, बल्कि खुद को दूरदर्शी और सक्षम प्रशासक के रूप में स्थापित करें। यदि सिंहस्थ में सब कुछ सुचारु और व्यवस्थित रहा, तो यह न केवल उज्जैन बल्कि पूरे प्रदेश के लिए गौरव का क्षण होगा। यह आयोजन प्रदेश की छवि को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचाई देगा और विधानसभा चुनाव में मोहन यादव की स्थिति को और मजबूत करेगा। 2028 का सिंहस्थ और चुनाव एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए सिंहस्थ की सफलता केवल धार्मिक आस्था की पूर्ति नहीं होगी, बल्कि यह जनता के विश्वास का प्रमाण भी बनेगी। मोहन यादव के लिए यह अवसर है कि वे अपनी राजनीतिक यात्रा को एक नए शिखर पर पहुंचाएं। सिंहस्थ के दौरान उनकी हर नीति, हर निर्णय और हर व्यवस्था चुनावी समीकरणों को प्रभावित करेगी। यानी ये महाआयोजन केवल आस्था का महासागर नहीं, बल्कि सत्ता की दिशा तय करने वाली लहर भी साबित हो सकता है।
2028 में विधानसभा चुनाव सिंहस्थ के कुछ ही महीने बाद होंगे। सिंहस्थ में आने वाले करोड़ों लोग न केवल धार्मिक आस्था के कारण जुड़ते हैं, बल्कि उनकी नजरें सरकार की कार्यप्रणाली पर भी रहती हैं। सिंहस्थ का अनुभव सीधे-सीधे जनता के मन में सरकार की छवि तय करेगा। यदि सिंहस्थ का आयोजन सफल रहा, तो यह मोहन यादव और उनकी टीम के लिए चुनावी अभियान की मजबूत नींव का काम करेगा। यह दिखाएगा कि प्रदेश सरकार बड़े आयोजनों को संभालने में सक्षम है और धार्मिक परंपराओं को सम्मानपूर्वक निभाने का सामथ्र्य रखती है। दूसरी ओर, यदि व्यवस्थाएं बिगड़ीं या असंतोष फैला, तो विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बना सकता है। सिंहस्थ का महत्व केवल उज्जैन तक सीमित नहीं है। इंदौर, भोपाल, जबलपुर और पूरे मालवा-निमाड़ क्षेत्र में इसका व्यापक प्रभाव होगा। यह वही क्षेत्र है जहां चुनाव के नतीजे अक्सर सत्ता की दिशा तय करते हैं। मोहन यादव ने सिंहस्थ को लेकर शुरुआती दौर से ही गंभीरता दिखाई है। उन्होंने सिंहस्थ की तैयारियों के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है, जिसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ धार्मिक नेताओं और सामाजिक संगठनों को भी शामिल किया गया है। योजना केवल भीड़ प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्मार्ट टेक्नोलॉजी का भी समावेश किया जा रहा है।

इस साल सहकारिता और मंडी चुनाव
सरकार इस साल सहकारिता और मंडी चुनाव कराने की तैयारी कर रही है। प्रदेश में सहकारी समितियों और कृषि मंडियों के चुनाव लगातार टलते जा रहे हैं। पिछले करीब 12 साल से सहकारिता और मंडी चुनाव नहीं हो पाए हैं। प्रदेश की 4,523 प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति और 38 जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों के चुनाव 2013 में हुए थे। नियमानुसार 2018 में चुनाव होने थे लेकिन विधानसभा और लोकसभा चुनाव के कारण ये टल गए। कांग्रेस ने कर्जमाफी योजना के कारण इन्हें स्थगित रखा और डेढ़ साल बाद जब फिर भाजपा सरकार लौटी तो किसी ना किसी बहाने से चुनाव टलते गए। इस बीच हाईकोर्ट में कई याचिकाएं लगीं और चुनाव कराने के निर्देश भी मिले लेकिन समितियों के पुनर्गठन और नए समिति के गठन के कारण मामला टल गया। सरकार ने अधिनियम में संशोधन करके यह प्रविधान भी कर दिया कि विशेष परिस्थिति में चुनाव कराने संबंधी प्रविधान को शिथिल भी किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि समितियों के कामकाज में ठहराव आ गया है क्योंकि प्रशासक की रुचि केवल समिति सुचारू रूप से काम करती रहे, तक ही सीमित होती है। भले ही सहकारी समितियों के चुनाव गैर दलीय आधार पर होते हैं, लेकिन इसमें राजनीतिक दखलंदाजी पूरी तरह रहती है। कार्यकर्ताओं को इनमें अवसर भी मिलता है। समितियों के पुनर्गठन का काम भी दो-तीन माह में पूरा हो जाएगा। भारतीय किसान संघ से लेकर अन्य संगठन भी चुनाव कराने की मांग रहे हैं। इसे देखते हुए सरकार ने तैयारी प्रारंभ कर दी है। यही स्थिति कृषि उपज मंडी समितियों की है। इनके चुनाव भी वर्ष 2017 में होने थे लेकिन टलते गए। प्रशासक अधिकतम दो वर्ष के लिए रखे जा सकते थे, वह अवधि भी पूरी हो गई है। जल उपभोक्ताओं समितियों के भी यही हाल हैं। इनके चुनाव भी 2028-19 से नहीं हुए। इस बीच यह संशोधन भी कर दिया गया कि अब समितियों का कार्यकाल दो के स्थान पर पांच वर्ष का रहेगा।
गौरतलब है कि अक्टूबर 2025 में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अधिकारियों को संकेत दे दिया था कि आने वाले समय में सहकारी समिति, कृषि उपज मंडी और निकायों के चुनाव होंगे। परिसीमन और नए सिरे से आरक्षण भी होगा। सभी इसकी तैयारी में जुट जाएं। प्रदेश में कई काम हुए हैं अत: सकारात्मक माहौल बनाएं। भले ही सहकारी समितियों और कृषि उपज समितियों के चुनाव दलीय आधार पर नहीं होते लेकिन इसमें राजनीतिक दलों की पूरी भूमिका होती है। वे अपने समर्थकों की जीत सुनिश्चित करने के लिए कई समीकरण बनाते हैं। दरअसल, इन समितियों का आधार बड़ा है और विधानसभा व लोकसभा चुनाव में इस नेटवर्क का माहौल बनाने में बड़ी भूमिका होती है। चूंकि, लंबे समय से चुनाव नहीं हुए हैं इसलिए कार्यकर्ता भी हतोत्साहित हैं। इसे देखते हुए सरकार नए साल में एक-एक करके लंबित सभी चुनाव कराएगी। इससे एक तो भाजपा के प्रति माहौल पता लगा जाएगा, वहीं दूसरी ओर कार्यकर्ता भी व्यस्त हो जाएंगे।

2027 में निकाय और पंचायत चुनाव
मप्र में 2027 में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव होंगे। इस बार नगर पालिका और नगर परिषद के अध्यक्ष का चुनाव सीधे मतदाता करेंगे। सरकार ने हाल ही में नगर पालिका अधिनियम में संशोधन करके पुरानी व्यवस्था लागू कर दी है। 2022 में सरकार ने पार्षदों के माध्यम से अध्यक्ष के चुनाव कराए थे। जिला और जनपद पंचायतों में अभी यही व्यवस्था है। सदस्य अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। इसमें भी नगरीय निकायों की तरह व्यवस्था बनाने की मांग उठ रही है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में इसे लेकर विचार भी चल रहा है। वहीं नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने सरकार से राज्य परिसीमन आयोग बनाने की सिफारिश की है। सरकार इस प्रस्ताव को मानती है तो नगर निगम के मेयर, नगर पालिका-परिषद के अध्यक्ष, पंचायत में पंच-सरपंच, जनपद और जिला पंचायत अध्यक्ष के पदों का आरक्षण और वार्डों के परिसीमन का जिम्मा आयोग का रहेगा। अभी नगरीय निकायों के लिए ये काम नगरीय प्रशासन विभाग और पंचायतों के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग करता है। राज्य निर्वाचन आयोग ने इसका ड्राफ्ट बनाकर सरकार को भेज दिया है। केंद्रीय परिसीमन आयोग को जो अधिकार मिले हैं, ठीक उसी तरह राज्य परिसीमन आयोग के अधिकार भी प्रस्तावित किए हैं। इसमें नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव के पुनर्गठन, परिसीमन और परिमार्जन का जिक्र किया है। खास बात ये है कि आयोग के फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। सरकार और भाजपा के लिए चुनौती यह है कि कांग्रेस ने पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों के लिए सक्रिय हो गई है। आगामी चुनाव के लिए संगठन को मजबूत करने अब कांग्रेस गांव की तरफ चली है। नए साल के पहले दिन कांग्रेस ने भोपाल के कोडिया देवका और टीला खेडी गांव से गांव चलो अभियान की शुरूआत की है। इस अभियान के तहत कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी गांवों में पहुंचे और लोगों से संवाद किया। इस अभियान के तहत कांग्रेस 5 जनवरी से प्रदेश भर की ग्राम पंचायतों और वार्डों जा रही है और ग्राम पंचायत कांग्रेस कमेटी का गठन किया जा रहा है। कांग्रेस ने 20 फरवरी तक प्रदेश की सभी 26 हजार ग्राम पंचायतों में कमेटी गठित किए जाने का लक्ष्य रखा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि ग्राम स्तर और वार्ड स्तर पर कांग्रेस का संगठन गठित हो। इसका मुख्य उद्देश्य है कि कांग्रेस की विचारधारा और भारतवर्ष के भाईचारे को घर-घर तक ले जाना। इसके जरिए हमारी कोशिश बीजेपी की नफरत से लडऩे की है। हमने हर कार्यकर्ता, सभी वरिष्ठ नेताओं और पदों पर बैठे पदाधिकारियों को कहा है कि प्रदेश भर में इस अभियान को चलाएं और पूरे प्रदेश में 20 फरवरी तक हर ग्राम पंचायत और वार्ड में कमेटी गठित कर दी जाएंगी। पार्टी का यह अभियान संगठनात्मक मजबूती और आम लोगों से सीधे संवाद स्थापित करने की दिशा में निर्णायक कदम होगा। कांग्रेस ने एक तरह से आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव की तैयारियां अभी से शुरू कर दी हैं इसके लिए कांग्रेस संगठन सृजन के तहत अपने संगठन को मजबूत करने की कोशिश में जुटी हुई है। लंबी मशक्कत के बाद कांग्रेस सभी जिलों में अध्यक्ष और ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति कर चुकी है। इसके बाद उन्हें अगले एक साल का टास्क भी सौंपा जा चुका है। जिला और ब्लॉक अध्यक्षों के बाद अब कांग्रेस वार्ड और ग्राम पंचायतों में भी पहली बार अपना संगठन खड़ा कर रही है ताकि जमीनी स्तर तक पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज तैयार की जा सके। कांग्रेस ने उन क्षेत्रों को अभी से चिन्हित किया है, जहां पार्टी की स्थिति बीजेपी से बेहतर, बराबरी या फिर कमजोर है। जहां पार्टी मजबूत हैं, उन क्षेत्रों को और बेहतर बनाने के लिए भी कोशिश की जा रही है। कांग्रेस का साल 2026 में पूरा फोकस संगठन की मजबूती और चुनाव तैयारियों को लेकर है। कांग्रेस अब कांग्रेस सहकारी समिति, मंडी और पंचायत चुनाव के लिए भी अलग-अलग टीमें बनाएगी। हालांकि यह सभी चुनाव गैर दलीय होते हैं लेकिन यह भी राजनीति दखल से अलग नहीं होते।

विधानसभा चुनाव के लिए अभी से तैयारी
मप्र में विधानसभा चुनाव को अभी 3 साल का समय है। लेकिन चुनाव की तैयारियों को लेकर शासन-प्रशासन अभी से जुट गए हैं। चुनाव आयोग विधानसभा चुनाव को लेकर एसआईआर करवा रहा है। वहीं सरकार चुनावी वर्ष से पहले प्रदेश में विकास पर अधिक से अधिक फोकस करने जा रही है। गौरतलब है कि 2028 नवंबर-दिसंबर में विधानसभा का चुनाव प्रस्तावित हैं। चुनावों को देखते हुए सभी संबंधित विभागों ने तैयारी प्रारंभ कर दी है। उधर, वित्त विभाग भी तीन वर्ष की वित्तीय आवश्यकता को देखते हुए रोलिंग बजट तैयार करा रहा है यानी विभागों को अभी से आकलन करना है कि उन्हें तीन वर्ष में कितने बजट की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही सरकार चुनाव को विवाद रहित बनाने के लिए भी काम कर रही है। मप्र में भाजपा और कांग्रेस अपना-अपना जनाधार बढ़ाने के लिए दोनों पार्टियों के नेता लगातार सक्रियता बढ़ा रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि दोनों पार्टियों का यूथ संगठन अपनी टीम का गठन नहीं कर पाए हंै। दोनों पार्टियों के यूथ संगठन भाजपा का भारतीय जनता युवा मोर्चा और कांग्रेस का युवक कांग्रेस के अध्यक्षों की नियुक्ति डेढ़-दो माह पहले हो गई है, लेकिन वे अभी तक अपनी टीम का गठन नहीं कर पाए हैं। इसका असर यह देखने को मिल रहा है कि दोनों पार्टियों के नेता अपनी सक्रियता नहीं बढ़ा पा रहे हैं। मप्र की राजनीति में जेन-जी की दिलचस्पी बढ़ रही है। ऐसे में युवाओं का बड़ा महत्व है। इसके लिए भाजपा ने भारतीय जनता युवा मोर्चा और कांग्रेस ने युवक कांग्रेस बनाया है। दोनों पार्टियों की राजनीति करने वाले युवाओं के लिए ये संगठन पाठशाला हैं। दोनों संगठनों ने अपनी-अपनी पार्टी को बड़े-बड़े नेता दिए हैं। इसलिए इनका महत्व काफी है। लेकिन विडंबना यह है कि दोनों संगठनों के अध्यक्षों ने अभी तक अपनी प्रदेश इकाई का गठन नहीं किया है। भाजपा संगठन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का बड़ा महत्व है। ऐसे में भाजपा संगठन मप्र में पार्टी के युवा मोर्चा में 18 से 25 वर्ष तक के युवाओं को भी प्रतिनिधित्व देने पर विचार कर रहा है। इसके साथ ही युवा मोर्चा टीम में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी विचार चल रहा है। युवा मोर्चा की नई टीम जनवरी के अंत तक सामने आ सकती है। युवा मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष के पद पर श्याम टेलर की नियुक्ति 22 नवंबर को हुई थी, तब से लगभग डेढ़ माह का वक्त बीत चुका है। नई टीम के गठन को लेकर टेलर का कहना है कि यह निर्णय पार्टी संगठन लेगा। टेलर का कहना है कि भाजपा में सामूहिक नेतृत्व के आधार पर निर्णय लेने की परंपरा है, इसलिए मैं अपने स्तर पर यह तय नहीं कर सकता है कि नई टीम कब तक बन जाएगी और इसमें किन-किन लोगों को मौका मिलेगा। लेकिन, इतना तय है कि युवा मोर्चा की नई टीम सर्व-स्पर्शी और सर्वसमावेशी होगी। हर उम्र, हर क्षेत्र, हर जाति-वर्ग को नई टीम में जगह मिलेगी। भाजपा सूत्रों के मुताबिक युवा मोर्चा में प्रमुख जिम्मेदारियां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से निकले कार्यकर्ताओं को मिलती आई हैं। इस बार भी एबीवीपी में अच्छा काम करने वाले सक्रिय कार्यकर्ताओं को युवा मोर्चा में जगह मिलेगी। वहीं इस संबंध में टेलर ने कहा कि एबीवीपी कार्यकर्ता निर्माण की भट्टी है, लेकिन पार्टी की ओर से युवा मोर्चा को इस बार अभी तक कोई गाइडलाइन नहीं दी है। जहां तक जेन-जी की बात है तो नई पीढ़ी के युवाओं को मोर्चा में जरूर जगह दी जाएगी। वहीं कांग्रेस में काफी खींचतान के बाद यश घनघोरिया यूथ कांग्रेस के नए अध्यक्ष बने हैं। मप्र युवा कांग्रेस में चुनाव की प्रक्रिया पूरी हुए 2 माह बीत चुके हैं। नई कार्यकारिणी का चुनाव भी नवंबर में ही पूरा हो गया। निर्वाचन के जरिए यूथ कांग्रेस के 147 पदाधिकारी चुने गए थे। इनमें 12 उपाध्यक्ष, 48 महासचिव, 60 सचिव समेत अन्य पदाधिकारी शामिल हैं। मप्र युवा कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष यश घनघोरिया का कहना है कि अभी सिर्फ दो माह हुए हैं और तीन महीने तक सभी निर्वाचित पदाधिकारियों का जमीनी स्तर पर काम देखा जाएगा, उसके बाद परफॉर्मेंस के आधार पर उन्हें प्रमोट कर नई कार्यकारिणी गठित करेंगे। नई कार्यकारिणी में 18 से 35 वर्ष तक के युवाओं का निर्वाचन हुआ था। घनघोरिया के मुताबिक नई गठित होने वाली कार्यकारिणी में कम उम्र के युवाओं को तवज्जो दी जाएगी। वहीं कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक युवक कांग्रेस में जमकर गुटबाजी हो रही है, निर्वाचन प्रक्रिया के बाद अब तक हुई यूथ कांग्रेस की दो बैठकों में इसका असर भी देखने को मिला। युवक कांग्रेस को अभी पंचायत चलो अभियान की जिम्मेदारी मिली है, लेकिन इसमें आधी टीम काम नहीं कर रही है।

बनाया जाएगा मेला प्राधिकरण
उज्जैन सिंहस्थ की व्यवस्थाओं को चाकचौबंद करने के लिए सरकार स्थानीय अधिकारियों को अधिक अधिकार संपन्न बनाएगी। इसके लिए सिंहस्थ मेला अधिनियम-1955 में संशोधन की तैयारी है। संशोधन के लिए उत्तर प्रदेश के प्रयागराज मेला अधिनियम के प्रविधान का अध्ययन कराने के साथ अधिकारियों के अलग-अलग दल भेजकर कुंभ की व्यवस्थाओं को दिखवाया गया। इसके आधार पर तय किया गया है कि उज्जैन मेला प्राधिकरण बनाया जाएगा, जो केवल मेला क्षेत्र से जुड़े कामों को देखेगा। मध्य प्रदेश नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अंतर्गत आने वाले ग्राम तथा नगर निवेश संचालनालय द्वारा सिंहस्थ मेला अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि प्रयागराज में होने वाले मेलों का प्रबंधन मेला प्राधिकरण करता है। इसमें आयुक्त, पुलिस महानिरीक्षक, कलेक्टर, मेला अधिकारी, मुख्य कार्यपालक अधिकारी और अन्य संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारी रहते हैं। ठीक इसी तरह से सिंहस्थ मेला प्राधिकरण बनाया जाएगा। इसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री रहेंगे। प्रशासन, नगर निगम, पुलिस, स्वास्थ्य, जल संसाधन, बिजली, परिवहन समेत तमाम विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया जाएगा। महाकाल मंदिर प्रबंधन समिति, श्रद्धालुओं व साधु-संतों से परामर्श करके व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के प्रयास किए जाएंगे। कलेक्टर को अधिक अधिकार संपन्न बनाया जाएगा। मेला आयोजन की सभी व्यवस्थाओं पर सीधा नियंत्रण होगा। विभागीय तालमेल बैठाने का दायित्व भी कलेक्टर का रहेगा और अंतिम निर्णय भी वही लेंगे। किसी कार्रवाई के लिए प्रस्ताव शासन को भेजने की आवश्यकता नहीं होगी, वे सीधी कार्रवाई कर सकेंगे। सिंहस्थ की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सरकार ने नगरीय विकास और पुलिस के अधिकारियों को प्रयागराज कुंभ भेजा था। टीम ने वहां भीड़ प्रबंधन, यातायात और सुरक्षा व्यवस्था में तकनीक का उपयोग, शाही स्थान, स्वास्थ्य, भोजन सहित अन्य व्यवस्थाओं को देखा। इसके आधार सभी संबंधित विभाग अपनी-अपनी कार्य योजना तैयार कर रहे हैं। भीड़, यातायात, आपदा प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था आदि के लिए 60 हजार से अधिक पुलिस बल तैनात किया जाएगा। सुरक्षा व्यवस्था की कमान आइजी, एसपी स्तर के अधिकारियों के हाथ में रहेगी। महाकाल लोक बनने के बाद जिस तरह से उज्जैन में पर्यटक और भगवान महाकाल का दर्शन करने के लिए देश-दुनिया से श्रद्धालु आ रहे हैं। उसने 2028 में होने वाले सिंहस्थ में व्यवस्थाओं के लिए चुनौती बढ़ा दी है। सरकार का अनुमान सिंहस्थ में 40 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का है। इतनी बड़ी संख्या का प्रबंधन करना बड़ी चुनौती होगी। इसलिए 21 किलोमीटर लंबे घाट निर्माण के साथ जल प्रबंधन, सडक़ों के नेटवर्क को दुरुस्त करने के साथ अन्य नागरिक सुविधाओं का विकास किया जा रहा है। अभी तक 18 हजार करोड़ रुपये के काम स्वीकृत किए जा चुके हैं।

2028 की चुनौतियों से निपटने की रणनीति
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने तकरीबन 2 साल के शासन काल में यह दिखा दिया है कि उन्हें चुनौतियों से निपटना भलीभांति आता है। इस समय मुख्यमंत्री और उनकी सरकार का पूरा फोकस विकास के साथ ही सिंहस्थ और विधानसभा चुनाव पर है। दरअसल, 2028 में सरकार के सामने सिंहस्थ और विधानसभा चुनाव ये दो चुनौतियां हैं। इसको देखते हुए सरकार ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। वर्तमान में सरकार का प्रयास है कि सिंहस्थ को ऐतिहासिक बनाया जाए। इसके लिए महाकाल की नगरी उज्जैन के साथ ही आसपास के जिलों में भी विकास की गति तेजी से चल रही है। गौरतलब है कि 2028 का वर्ष मध्यप्रदेश के लिए ऐतिहासिक और राजनीतिक दोनों ही दृष्टियों से बेहद अहम होने जा रहा है। एक ओर उज्जैन की पवित्र धरती पर सिंहस्थ का भव्य आयोजन होगा, जिसमें देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु और साधु-संत जुटेंगे, तो दूसरी ओर इसी साल विधानसभा चुनाव भी होंगे। यह संयोग ही है कि दोनों आयोजन एक ही वर्ष में होने जा रहे हैं, और यही वजह है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए यह समय उनके नेतृत्व, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक दूरदर्शिता की सबसे बड़ी परीक्षा बनकर सामने आएगा। डॉ. मोहन यादव स्वयं उज्जैन के मूल निवासी हैं और इस शहर के प्रति उनका भावनात्मक जुड़ाव किसी से छिपा नहीं है। यही कारण है कि सिंहस्थ का सफल और निर्विघ्न संचालन न सिर्फ उनके लिए व्यक्तिगत गर्व का विषय होगा, बल्कि यह उनकी राजनीतिक पहचान को भी नए आयाम देगा। सिंहस्थ में हर कदम, हर निर्णय और हर व्यवस्था का सीधा असर प्रदेश की जनता तक पहुंचेगा। अगर आयोजन भव्य, व्यवस्थित और शांति से सम्पन्न हुआ, तो इसका संदेश यह होगा कि मोहन यादव न केवल धार्मिक भावनाओं को सम्मान देते हैं बल्कि बड़े आयोजनों को कुशलता से संभालने की क्षमता भी रखते हैं। सिंहस्थ का आयोजन किसी सामान्य मेले या पर्व से कहीं अधिक जटिल होता है। करोड़ों श्रद्धालुओं का आगमन, अनेक अखाड़ों और साधु-संतों की व्यवस्थाएं, सुरक्षा की व्यापक तैयारी, यातायात का सुचारु संचालन, स्वच्छता और स्वास्थ्य संबंधी इंतजाम,ये सभी ऐसे पहलू हैं जो प्रशासन के लिए भारी चुनौती पेश करते हैं। इस बार की चुनौती और बड़ी है, क्योंकि कोरोना महामारी के बाद मध्यप्रदेश में पहली बार इतने विशाल पैमाने पर धार्मिक आयोजन होगा। इसमें न केवल देश बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचेंगे। स्वास्थ्य सुरक्षा, मेडिकल इमरजेंसी और आपदा प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा। साथ ही, उज्जैन जैसे धार्मिक नगर में बुनियादी ढांचे को नए स्तर तक पहुंचाना अनिवार्य होगा। मोहन यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह भी होगी कि व्यवस्था केवल सरकारी न लगे, बल्कि आमजन की भागीदारी के साथ सहज और समग्र अनुभव दे। अगर व्यवस्थाएं असफल रहीं, भीड़ में अव्यवस्था हुई या सुरक्षा में चूक हुई तो इसका राजनीतिक असर चुनाव में देखने को मिल सकता है।

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