273 नगर परिषद सुविधाओं के लिए तरस रहे

  • प्रशासनिक बदलाव के बावजूद बुनियादी सुविधाओं का अभाव

गौरव चौहान
मप्र की बड़ी पंचायतों को नगर परिषद बनाया जा रहा है। इसके पीछे सरकार का मकसद है विकास की रफ्तार को गति दिया जाए। लेकिन विडंबना यह है कि जिन ग्राम पंचायतों को नगर पंचायत परिषद बना दिया गया है, लेकिन प्रशासनिक बदलाव के बावजूद वहां के लोग अभी भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। स्थिति यह है कि अब तक ऐसे दो सौ से ज्यादा नगर पंचायतों के लिए न तो सीवेज और कचरा प्रबंधन काम काम हुआ है और न वहां के विकास के लिए कोई कदम उठाए गए हैं।
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश की 273 ग्राम पंचायतों को अपग्रेड कर नगर पंचायत परिषद का दर्जा दिया गया है। लेकिन यहां पर अभी भी सुविधाएं जस की तस हैं। इनमें सबसे अहम गांव वे हैं, जिन्हें प्रदेश के नगर निगम क्षेत्र के दायरे में लाकर वहां सेमी-अर्बन एरिया के रूप में चिन्हित किया गया है। स्थिति यह है कि इन गांवों में प्रशासनिक बदलाव के बावजूद बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है। ग्रामीण से शहरी ढांचा बनने की प्रक्रिया में इन क्षेत्रों में जल निकासी के साथ-साथ पक्की सड़कें, स्ट्रीट लाइट और शहरी नियोजन की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं पंचायतों के अधिकार खत्म होने और नगर परिषद के अधिकार पूरी तरह से लागू न होने से वहां के विकास के काम पूरी तरह से ठप्प पड़े हुए हैं।
आर्थिक बोझ बढ़ा, सुविधाएं नहीं मिली
पंचायतों को नगर परिषद बनाने से वहां के नागरिकों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ा है। क्योंकि उनसे शहरी कर वसूल किया जा रहा है। लेकिन सुविधाएं नहीं मिली हैं। मप्र के ग्रामीण इलाकों में विशेषकर दूर दराज के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और रोजगार के अवसरों की गति अपेक्षाकृत काफी धीमी है। यहां पर सड़क, पानी, बिजली जैसी समस्याओं से स्थानीय बाशिंदों को हर दिन संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि मौजूदा सरकार कृषि भवन सह गार्डन के माध्यम से विकास को गति देने का दावा भी कर रही है। सरकार ऐतिहासिक स्थलों के आसपास पर्यटकों के लिए होम स्टे जैसी योजनाएं क्रियान्वित कर रही है, जिससे स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार के अवसर भी मिल रहे है। लेकिन ऐसे गांवों की संख्या अपेक्षाकृत काफी कम है। गौरतलब है कि पहले प्रदेश में 10 हजार की आबादी वाली ग्राम पंचायतों को नगर पंचायत परिषद का दर्जा मिल जाता था। लेकिन लगभग एक दशक पहले इन नियमों में बदलाव करते हुए आबादी का मापदंड बढ़ा दिया। उसके बाद यदि किसी ग्राम पंचायत की आबादी 20 से 50 हजार के बीच होगी, तभी उन्हें नगर पंचायत में अपग्रेड किया जाएगा। इसके पीछे तत्कालीन सरकार की मंशा थी, कि शहरीकरण से गांवों को बचाया जाएगा और इसके लिए गांवों के समग्र विकास के लिए अलग से योजनाएं बनाई जाएगी। इससे उनका प्रशासनिक ढांचा भी बदल जाएगा। लेकिन जिन उद्देश्यों को लेकर तत्कालीन सरकार ने नियमों में बदलाव किया था, उसकी पूर्ति नहीं हो पा रही है।
ग्राम पंचायतों में समस्याओं का अंबार
नगर पंचायत बनने की राह में खड़ी कई ग्राम पंचायतों में समस्याओं का अंबार है। मौजूदा सरकार ने इनमें से कुछ ग्राम पंचायतों को आदर्श बनाने की दिशा में काम किया है और उनके पंचायत भवन से लेकर सामुदायिक भवनों को आधुनिक सुविधाओं और तकनीक पूर्ण बनाने की दिशा में योजना के एवज में राशि भी उपलब्ध कराई है, लेकिन ऐसी पंचायतों को आसानी से गिना जा सकता है। उधर, मप्र के भोपाल और इंदौर शहर को दूसरे जिलों को मिलाकर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के रूप में तब्दील किया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के इस ड्रीम प्रोजेक्ट का लाभ उन इन क्षेत्रों में आने वाली ग्राम पंचायतों को मिलेगा, जिन्हें नगर परिषद बनाया जाएगा। हालांकि ये ग्राम पंचायतें आबादी की मापदंड के अनुरूप होगी, यानी कि इसका लाभ बड़ी ग्राम पंचायतों को ही मिलेगा। बताया गया है कि इन क्षेत्रों की बसाहट जहां व्यवस्थित ढंग से की जाएगी, तो वहीं यातायात, सार्वजनिक यातायात, वहां की पेयजल व्यवस्था, सीवेज व कचरा प्रबंधन, बिजली आपूर्ति और वहां के दूसरे विकास के लिए प्रयास किए जाऐं। इस दिशा में सरकार ने अपने प्रयास भी शुरू कर दिए हैं।

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