10 लाख आउटसोर्स कर्मचारी संभाल रहे महत्वपूर्ण काम

  • आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे सरकारी कामकाज

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र अब लगभग सभी विभागों में आउटसोर्स कर्मियों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। बिजली कंपनियां, अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, स्कूल-छात्रावास, नगरीय निकायों के सफाईकर्मी सहित लगभग हर विभाग अब आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे है। इसकी सबसे बड़ी वजह है पिछले करीब आठ साल से प्रमोशन पर प्रतिबंध और भर्तियों की धीमी गति ने विभागों की चिंता बढ़ाई है। खासकर लिपिकीय संवर्ग की कमी से सबसे ज्यादा हालात खराब हो रहे हैं। इधर कर्मचारी चयन मंडल कई विभागों को पत्र लिख चुका है, लेकिन यहां से भर्तियों के प्रस्ताव नहीं पहुंच पाए हैं। हालात यह है कि आउट सोर्स कर्मचारियों से अधिकांश विभागों का काम चल रहा है। दिलचस्प यह भी है कि इन आउटसोर्स कर्मचारियों के पास विभागों का महत्वपूर्ण काम है।
कर्मचारी संगठनों के मुताबिक बीते 15 से 20 सालों में मप्र में मुख्य रूप से क्लास तृतीय और चतुर्थ की भर्तियां नहीं हुई हैं। संविदा के अलावा हर विभाग में आउटसोर्स कर्मियों से काम चल रहा है। ऑल डिपार्टमेंट आउटसोर्स, अस्थायी कर्मचारी मोर्चा की मानें तो क्लास तृतीय और चतुर्थ को मिलाकर कुल 10 लाख आउटसोर्स कर्मी विभागों में सेवा दे रहे हैं। लिपिकीय अमले की राज्य से लेकर ब्लॉक स्तर तक कमी बनी है। इन पदों पर निजी एजेंसियों का सहारा लेकर आउट सोर्स काम चलाया जा रहा है। स्कूल शिक्षा विभाग की लोक शिक्षण संचालनालय इकाई में देखें तो लिपिकों की विभिन्न श्रेणियों के पदों पर आउट सोर्स काम कर रहे हैं। अन्य विभागों में भी राज्य संभाग, जिला और विकासखंड कार्यालयों तक यही स्थिति बनी है। मप्र लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के कार्यकारी अध्यक्ष संजय दुबे का कहना है कि हर विभाग में क्लेरिकल स्टॉफ के प्रत्येक श्रेणी के पद खाली है। इन पर सीधी भर्तियां करवाने की बजाय निजी एजेंसियों से आउट सोर्स का सहारा लिया जा रहा है। जो पूरी तरह गलत है। इससे व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
आउटसोर्स के पास महत्वपूर्ण काम
दिलचस्प यह भी है कि इन आउटसोर्स कर्मचारियों के पास विभागों का महत्वपूर्ण काम है। प्रदेश में लोक निर्माण, जल संसाधन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, ग्रामीण यांत्रिकी, तकनीकी शिक्षा, उच्च शिक्षा, ऊर्जा, खनिज, स्कूल शिक्षा, आर्थिक सांख्यिकी, विद्युत, महिला बाल विकास विभागों में लिपिकीय संवर्ग के पदों का भारी अभाव है। मौजूदा कर्मचारी बताते हैं कि स्वीकृत पद संरचना के अनुसार जिस अनुपात में भर्तियां होना चाहिए, वह प्रक्रिया गति नहीं पकड़ पा रही है। जबकि रिटायर्डमेंट लगातार हो रहा है। प्रमोशन पर प्रतिबंध ने और भी ज्यादा संकट बढ़ाया है। अब कार्य व्यवस्था को संभालने के लिए ज्यादातर डिपार्टमेंट में आउट सोर्स का सहारा लिया जा रहा है। जबकि रिक्त पदों पर सीधी भर्तियां की जानी थीं। इस संबंध में कर्मचारी चयन मंडल भी अनेक विभागों को पिछले साल पत्र लिख जानकारी मांग चुका है। जिसमें यह जानकारी चाही गई थी कि कितने कैडर के कौन कौन से पद खाली हैं। यदि पद रिक्त हैं तो प्रस्ताव भेजा जाए, ताकि इन पर भर्ती परीक्षा आयोजित की जा सके।
विभागों में भर्तियों के प्रति गंभीरता नहीं
मप्र राज्य कर्मचारी संघ के अध्यक्ष हेमंत श्रीवास्तव का कहना है कि विभागों में भर्तियों के प्रति गंभीरता नहीं है। यही वजह है कि शासन की अनुमति लेकर कर्मचारी चयन मंडल को भर्तियों के लिए प्रस्ताव नहीं भेजे जा रहे हैं। इससे शिक्षित बेरोजगारों का जबर्दस्त नुकसान हो रहा है।  प्रदेश के विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में लिपिकीय संवर्ग (क्लेरिकल स्टॉफ) के पद खाली पड़े हुए हैं। अकेले सहायक ग्रेड 3 के 30000 पद, सहायक ग्रेड 2 के 26000, सहायक ग्रेड वन के 16000, वरिष्ठ लेखा परीक्षक के 6000, कनिष्ठ लेखा परीक्षक के 4500, सहायक अधीक्षक के 7000, अधीक्षक के 5000 और जबकि कनिष्ठ लेखा अधिकारी के 14000 पद रिक्त हैं। यह सभी प्रमोशन के पद हैं, लेकिन इस प्रक्रिया पर प्रतिबंध होने के कारण व्यवस्था प्रभावित है। दूसरी ओर रिटायर्डमेंट होने के कारण नीचे से लेकर ऊपर के पद रिक्त हो रहे हैं। जिसका सीधा असर प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ रहा है।
कैडर समाप्ति का ज्यादा असर आउटसोर्स पर
मप्र में सरकार के विभागों के लिए 10 लाख से ज्यादा आउटसोर्स कर्मचारी अब तक काम कर रहे हैं। अब तक इन कर्मियों को विभागों में सृजित पदों के विरुद्ध काम पर रखा जाता था। उनकी सेवाएं अब निजी कंपनियों के जरिए ली जाएंगी। यानी ये कर्मचारी पूरी तरह कंपनी के अधीन होंगे। कर्मचारी विभाग से किसी तरह की मदद नहीं ले पाएंगे और उन्हें वेतन, पीएफ, छुट्टी सहित अन्य सुविधाओं पर कंपनी ही निर्णय लेगी। आउटसोर्स कर्मचारी सालों से सरकार से नियमित करने की मांग कर रहे थे। अब उन्हें कंपनी के अधीन होना पड़ रहा है। इस वजह से आउटसोर्स कर्मचारियों में सबसे ज्यादा नाराजगी है।

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