
- मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का सपना
देश की सबसे स्वच्छ राजधानी भोपाल हो या देश का सबसे साफ शहर इंदौर, या ग्वालियर-जबलपुर या कोई छोटा शहर उनमें झुग्गी बस्तियां दाग की तरह हैं। इस दाग को हटाने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सपना बुना है की अपना मप्र झुग्गी मुक्त बनेगा।
विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। मप्र में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार 2047 के विकास की प्लानिंग के अनुसार काम कर रही है। इसके लिए मुख्यमंत्री का टारगेट है कि मप्र को पूरी तरह झुग्गी मुक्त बनाया जाए। इसके लिए वे अधिकारियों के साथ निरंतर कार्ययोजना बना रहे हैं और उस पर काम करवा रहे हैं। गतदिनों नगरीय विकास एवं आवास विभाग की मुख्यमंत्री निवास स्थित समत्व भवन में समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्रदेश के नगरों में झुग्गी बस्तियों के विस्तार को नियंत्रित करने के उद्देश्य से, लोगों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए किफायती और सुविधाजनक आवास सुविधा विकसित करने कार्य-योजना बनाई जाए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि भोपाल के बड़े तालाब के आसपास अवैध निर्माण का सर्वेक्षण करवा कर उन पर कार्रवाई के लिए अभियान चलाया जाए। मुख्यमंत्री ने नगरीय विकास विभाग के अफसरों से कहा है कि शहरों में झुग्गी बस्तियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नगरीय आवास और विकास विभाग किफायती और सुविधाजनक आवास विकसित करने की कार्ययोजना बनाएगा। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्रों में कॉलोनियों के विकास में देश के प्रतिष्ठित बिल्डर्स और कॉलोनाइजर्स को जोड़ा जाए। शहरी इलाकों की एक करोड़ 30 लाख लाड़ली बहनों को आर्थिक सहायता के साथ आवास दिए जाएंगे। नगरीय विकास विभाग के कामों की समीक्षा करते हुए सीएम डॉ. यादव ने कहा कि झुग्गी-बस्तियों को कंट्रोल करने के लिए लोगों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति का आकलन करें और किफायती, सुविधाजनक आवास सुविधा विकसित करने कार्ययोजना बनाई जाए। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अधिकारियों ने बताया कि प्रदेश में शहरी क्षेत्रों की एक करोड़ 30 लाख लाड़ली बहनों को आर्थिक सहायता के साथ आवास दिए जाएंगे। प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी 1.0 में 8 लाख 55 हजार आवास बनकर तैयार हो गए हैं। दूसरे चरण में अब तक 4 लाख से अधिक आवेदन प्राप्त हो गए हैं। संकल्प बिन्दु के अनुसार वर्ष 2027 तक भोपाल और इंदौर मेट्रो लाईन का पूर्ण संचालन किया जाएगा। मुख्यमंत्री नगरीय क्षेत्र अधोसंरचना निर्माण योजना में 1070 करोड़ रुपए की 1062 परियोजनाएं मंजूर हैं। बताया गया कि 183 नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 218 पिंक शौचालय संचालित हो रहे हैं। मुख्यमंत्री का कहना है कि शहर को झुग्गी मुक्त बनाने के उद्देश्य से विकसित आवासीय सुविधाएं किराए पर नहीं जाएं, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अवैध कॉलोनियों और झुग्गियों के निर्माण के संबंध में सतर्क रहें, संबंधित क्षेत्र में इस प्रकार की गतिविधियां होने पर उस क्षेत्र के राजस्व और नगर निगम अधिकारी सीधे जिम्मेदार होंगे। मुख्यमंत्री ने भोपाल के सभी शासकीय भवनों पर प्राथमिकता से सोलर पैनल लगाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य से कार्य किया जाए कि सौर ऊर्जा के उपयोग में राजधानी भोपाल, देश के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करें।
भोपाल में हटेंगी 1.50 लाख झुग्गियां
मप्र सरकार झुग्गी झोंपड़ी हटाकर वहां रहनेवाले लोगों को पक्के मकान देने की योजना पर काम कर रही है। इसकी शुरुआत राजधानी भोपाल से की जा रही है। यहां करीब 1.50 लाख झुग्गियां हैं जिन्हें हटाने का प्लान बनाया गया है। राजधानी को झुग्गी मुक्त बनाने के लिए सबसे पहले राज्य मंत्रालय वल्लभ भवन के सामने से झुग्गियां हटाई जाएंगी। यह काम 7 दिनों में शुुरु कर दिया जाएगा जिसके तैयारियां तेज हो चुकी हैं। शनिवार को कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने इस संबंध में जिला प्रशासन और नगर निगम के अधिकारियों की बैठक बुलाई। झुग्गी हटाने की शुरूआत मंत्रालय वल्लभ भवन से की जाएगी। यहां करीब 150 हेक्टेयर से ज्यादा की सरकारी जमीन उपलब्ध है जिसमें से 40 हेक्टेयर पर 9 झुग्गी बस्तियां बसी हैं। भीम नगर, ओम नगर, वल्लभ नगर आदि बस्तियों में करीब 15 हजार झुग्गियां बताई जा रही हैं। इन सभी झुग्गियों को हटाकर निवासियों को पक्के मकान बनाकर दिए जाएंगे। सरकार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानि पीपीपी मोड के तहत यह काम करेगी। पहले चरण में मंत्रालय के पास की झुग्गियों के 6 हजार से ज्यादा परिवारों को पक्के मकानों में शिफ्ट किया जाएगा। 40 हेक्टेयर जमीन में से करीब 12 हेक्टेयर पर पक्के मकान बनाए जाएंगे जबकि शेष 28 हेक्टेयर सरकारी जमीन पर व्यवसायिक कांप्लेक्स, माल, सुपर बाजार जैसे प्राइम डेवलेपमेंट कार्य किए जाएंगे। सरकारी रिकार्ड में भोपाल जिले में कुल साढ़े 4 लाख मकान हैं। इनमें से 1.50 लाख झुग्गियां बताई जाती हैं। इन सभी झुग्गियों को हटाकर पक्के मकान बनाए जाएंगे। राजधानी को अगले 5 सालों में झुग्गी मुक्त बनाने का लक्ष्य है। सात महीने पहले प्रदेश सरकार ने एक नई पहल शुरू करते हुए शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपडियों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने की योजना बनाने की घोषणा की थी। उसके तहत शहरी क्षेत्रों में आने वाली झुग्गी-बस्तियों के आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। वर्ष-2024 में भोपाल समेत पूरे प्रदेश को झुग्गी फ्री बनाने का फॉमूर्ला बनाया गया था, लेकिन आज तक योजना धरातल पर नहीं उतर पाई है। जिला प्रशासन अब तक कागजी कार्रवाई तो पूरी कर चुका है, लेकिन सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने अथवा झुग्गियों के विस्थापन की शुरुआत अभी नहीं हो सकी है। दरअसल, सात महीने पहले प्रदेश सरकार ने एक नई पहल शुरू करते हुए शहरी क्षेत्रों में झुग्गी-झोपडियों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने की योजना बनाने की घोषणा की थी। उसके तहत शहरी क्षेत्रों में आने वाली झुग्गी-बस्तियों के आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। इसकी शुरुआत भोपाल से की गई। पहले चरण में सरकार शहरी क्षेत्रों में स्थित झुग्गी बस्तियों के आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। इसके साथ ही इन बस्तियों में रहने वाले परिवारों का सर्वे किया जा रहा है। जिससे कि यहां रहने वाले लोगों की गणना की जा सके। लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ पाया है। भोपाल सहित पूरे मप्र के शहरों में अवैध झुग्गियों को राजनीतिक संरक्षण है। भोपाल में कुछ चिन्हित राजनेता न सिर्फ वोटों के लालच में बल्कि अवैध मासिक उगाही के फेर में भी झुग्गियों और गुमटियों के संरक्षक बने रहे हैं। भोपाल को झुग्गी मुक्त बनाए जाने के प्रयास पहले भी कई बार हो चुके हैं। हालांकि पिछले सभी प्रयास न केवल विफल रहे, बल्कि हर वर्ष शहर की सबसे पॉश और कीमती शासकीय भूमि पर नई झुग्गी बस्तियां विकसित होती गईं। पिछले साल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर राजधानी को झुग्गी मुक्त बनाने की कार्य योजना पर काम शुरू हुआ। इसके लिए प्रशासन ने निजी सहभागिता से शासकीय भूमि पर बहुमंजिला इमारतें तैयार कर झुग्गी बस्तियों के विस्थापन की योजना तैयार की है। झुग्गी विस्थापन योजना के तहत पहले चरण में चिन्हित झुग्गियों को 9 क्लस्टरों में बांटा गया। इसमें सबसे पहले वल्लभ भवन के पास की झुग्गियों का सर्वे पूरा किया जाना था। निजी सहभागिता से इमारत बनाए जाने का काम भी प्रारंभिक तौर पर 17-18 एकड़ से शुरू होना था। कलेक्टर की उपस्थिति में हुई बैठक में एक सप्ताह में डीपीआर डिजाइन, प्लानिंग पॉलिसी, एस्टीमेट और टेंडर की शर्ते एवं सभी तैयारियां पूरी किए जाने पर निर्णय हुआ था। हालांकि तय अवधि में ऐसा हो नहीं सका। भोपाल में चाहे राजभवन से सटे क्षेत्र में 17 एकड़ में फैली रोशनपुरा बस्ती हो या बाणगंगा, भीमनगर, विश्वकर्मा नगर जैसी टॉप 8 झुग्गी-बस्तियां शहर के बीच प्राइम लोकेशंस पर करीब 300 एकड़ में फैली हैं। राहुल नगर, दुर्गा नगर, बाबा नगर, अर्जुन नगर, पंचशील, नया बसेरा, संजय नगर, गंगा नगर, बापू नगर, शबरी नगर, ओम नगर, दामखेड़ा, नई बस्ती, मीरा नगर जैसी कुल 388 बस्तियां शहर में हैं। इन सबकी जमीन का हिसाब लगाएं तो यह करीब 1800 एकड़ के आसपास है। वल्लभ भवन के पास बसी भीमनगर झुग्गी बस्ती 2 लाख 64 हजार 900 वर्गमीटर शासकीय भूमि पर अवैध रूप से बसी है। जिन सात सर्वे नंबरों 1478, 1479, 1480, 1483, 1484, 1489, 1511, पर यह अवैध कब्जा है, उस भूमि की दर 8800 रुपए प्रति वर्गमीटर है, जिसकी कीमत 233.11 करोड़ से अधिक है। इसी प्रकार ईदगाह हिल्स कलेक्ट्रेट के पास स्थित सर्वे नंबरों 105, 106 और 107 की 1.12 लाख वर्गमीटर शासकीय अतिक्रमित भूमि की दर 8 हजार प्रति वर्गमीटर से अधिक है और इसकी कीमत 80.60 करोड़ है। उक्त दोनों ही झुग्गी बस्तियों की भूमि की कुल कीमत 322.71 करोड़ है। रोशनपुरा, बाणगंगा, भीमनगर, विश्वकर्मा नगर सहित 8 झुग्गी-बस्तियां शहर के बीच सबसे महंगे और महत्वपूर्ण स्थानों पर 300 एकड़ में फैली हैं। इनके अलावा संजय नगर, राहुल नगर, दुर्गा नगर, बाबा नगर, अर्जुन नगर, मीरा नगर, पंचशील, नया बसेरा, गंगा नगर, बापू नगर, शबरी नगर, ओम नगर, दामखेड़ा, उडिय़ा बस्ती, नई बस्ती, जैसी कुल 388 चिन्हित बस्तियां शहर में हैं।
सेंट्रल विस्टा के लिए हटेंगी 8 झुग्गी-बस्तियां
सतपुड़ा व विंध्याचल भवन को तोडक़र अरेरा हिल्स क्षेत्र में दिल्ली के सेंट्रल विस्टा की तर्ज पर नया प्रशासनिक परिसर बनाया जाएगा। बुधवार को साधिकार समिति ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी। इसे मप्र हाउसिंग बोर्ड द्वारा बनाया जाएगा। बैठक में निर्णय हुआ कि जब तक वल्लभ भवन के पास नए भवन नहीं बन जाते, तब तक पुराने भवनों को नहीं तोड़ा जाएगा ताकि मौजूदा दफ्तरों को शिफ्ट न करना पड़े। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने नगर निगम और कलेक्टर को अरेरा हिल्स की झुग्गियों का शीघ्र विस्थापन करने के निर्देश दिए। साथ ही हाउसिंग बोर्ड को 15 दिन में यह सर्वे करने को कहा गया है कि किन विभागों को नए भवन में शिफ्ट किया जा सकता है। इसके लिए बोर्ड को सभी विभागाध्यक्षों से चर्चा कर शिफ्टिंग की संभावनाएं तय करनी होंगी। सीएस ने बोर्ड से कहा कि दो माह में कॉम्प्रहेंसिव प्लान को विस्तारित कर नए प्लान की डीटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) अगले दो माह में सबमिट करें और काम शुरू करें। बैठक में यह भी तय किया गया कि हाउसिंग बोर्ड अपने सर्वे में केंद्र के उन दफ्तरों के एचओडी से भी बात करे, जो भोपाल में चल रहे हैं। यदि केंद्र सरकार से मंजूरी मिलती है तो इन दफ्तरों को भी यहां शिफ्ट किया जा सकता है। हालांकि, जिला स्तर के दफ्तरों को यहां लाने का विचार तभी किया जाएगा, जब एचओडी और केंद्र सरकार के दफ्तरों की बैठक व्यवस्था का प्लान पूरी तरह बना लिया जाए। इसके बाद भी यदि स्थान मिलेगा तो जिला स्तर के दफ्तरों को भी यहां शिफ्ट किया जा सकता है। सुबह करीब 11 बजे से साढ़े 12 बजे तक मुख्य सचिव दफ्तर के सभागार में चली इस बैठक में एसीएस नगरीय आवास एवं विकास संजय शुक्ल और हाउसिंग बोर्ड कमिश्नर राहुल हरिदास समेत अन्य विभागाध्यक्ष भी मौजूद थे। बैठक में फिलहाल यह तय नहीं हुआ है कि इस प्रोजेक्ट को रीडेंसीफिकेशन के तहत बनाया जाएगा या राज्य सरकार इसके लिए अलग से बजट जारी करेगी।
सीएस ने बोर्ड से कहा है कि नए भवन ग्रीन बिल्डिंग कॉन्सेप्ट पर बनाए जाएं, ताकि इनमें कम से कम बिजली खपत हो। यह पूरी प्लानिंग अगले 50 साल की जरूरतों के हिसाब से की जाए। वल्लभ भवन व इसके आसपास 8 झुग्गी बस्तियां हैं। इनमें पत्रकार कॉलोनी के पास मालवीय नगर, ओम नगर-2,3, भीम नगर, वल्लभ नगर-1,2 मैप में है। वहीं दो बस्तियां राजीव नगर व अर्जुन नगर मैप में नहीं हैं। बैठक में तय हुआ कि अरेरा हिल्स को ऑरेंज और ब्लू मेट्रो रूट से जोड़ा जाएगा। लोगों की सुविधा के लिए कवर्ड पाथ-वे बनाए जाएंगे, जिनमें हॉकर्स कॉर्नर और संड्री शॉप्स होंगी। सडक़ों को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट सभी को आसानी से मिले। बैठक में तय हुआ कि भोपाल के सेंट्रल विस्टा की ओर आने वाली हर सडक़ की प्लानिंग की जाए। एक लेन ऐसी भी हो, जिससे वीआईपी मूवमेंट आसानी से हो सके और आम लोगों को परेशान न होना पड़े। मौजूदा स्थिति में सतपुड़ा-विंध्याचल भवन के बाहर सडक़ों पर भी गाडिय़ां खड़ी रहती हैं। ऐसा नए भवनों में न हो।
2047 के लिए तैयार हो रहा मप्र
वर्ष 2047 के लिए तैयार प्रदेश की योजना में 22 प्रमुख मिशन और 300 से ज्यादा एक्शन पॉइंट्स शामिल हैं, जिनमें से 200 से अधिक लक्ष्यों को आगामी पांच वर्षों में पूरा किया जा सकता है। पंचायत स्तर पर 22 हजार 519 ग्राम पंचायतों को 9 विषयों पर सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल के लिए प्रशिक्षित किया गया है। मप्र राज्य नीति आयोग के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ऋषि गर्ग ने बताया कि कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें निजी क्षेत्र, नागरिक समाज और आमजन की साझेदारी जरूरी है। उधर, मप्र में स्वच्छ भारत मिशन 2.0 (शहरी) के अंतर्गत नगरों में गतिविधियां निरंतर जारी हैं। मिशन के तहत सभी गतिविधियां एक अक्टूबर 2026 तक संचालित होंगी। इसके लिये लक्ष्य भी तय कर लिये गये हैं। इन गतिविधियों में प्रमुख रूप से उपयोगी जल के प्रबंधन के साथ स्वच्छता व्यवहारों को संस्थागत स्वरूप प्रदान करते हुए उन्हें व्यवहारिक बनाना है। आगामी वर्षों में प्रदेश के शहरों को कचरा मुक्त बनाना, खुले में शौच से मुक्ति, मानदंडों ओडीएफ+, ओडीएफ++, वॉटर+ को स्थायी बनाये रखना, इसी के साथ स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने के लिये नागरिकों की अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास किये जा रहे हैं। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत सभी कार्यवाही नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अंतर्गत सुनिश्चित की जा रही हैं। स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत प्रदेश में स्त्रोत पृथक्कीकरण, निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट सहित कचरे के सभी भागों का पूर्ण प्रसंस्करण, प्लास्टिक अपशिष्ट और सिंगल यूज प्लास्टिक को चरणबद्ध रूप से कम करना और संपूर्ण लीगेसी वेस्ट को उपचारित करते हुए सभी शहरों को कचरा मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इस मिशन में इस बात पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है कि सीवर्स, सेप्टिक टैंक की सफाई में मानव श्रम को सीधे रूप से रोका जाये और मशीनों के माध्यम से सफाई की व्यवस्था की जाये। शहरी क्षेत्रों में उपयोगी जल को जल संरचनाओं में जाने से पूर्व उपचार और पुर्न-उपयोग के लिये सीवेज ट्रीटमेंट इकाई, नालों में इंटरसेप्शन व डायवर्जन आदि सुविधाओं का विकास करना प्रमुख है। स्वच्छ भारत मिशन 2.0 (शहरी) में मप्र में संचालित योजनाओं के लिये करीब 4 हजार 914 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें करीब 2200 करोड़ रूपये की राशि केन्द्र सरकार की ओर से और 1800 करोड़ रूपये राशि राज्य सरकार के अंशदान के रूप में होगी। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत नगरीय क्षेत्रों में उन स्थानों को चिन्हित किया जा रहा है, जिन स्थानों पर आवाजाही ज्यादा होती है। इनमें धार्मिक स्थल, पर्यटन स्थल के आस-पास सुलभ काम्प्लेक्स की सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिये नगरीय निकायों को कहा गया है।
मप्र में नगरीय निकायों में हर साल की तरह स्वच्छ सर्वेक्षण-2024 शुरू हो चुका है। इस साल इसमें देश के 4900 से अधिक शहर स्वच्छता में श्रेष्ठता की दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं। स्वच्छ सर्वेक्षण मुख्य रूप से जमीनी स्वच्छता के साथ शहरों के स्वच्छता प्रमाणीकरण के लिए किया जा रहा है। प्रमाणीकरण में खुले में शौच से मुक्ति के लिए ओडीएफ, जल के पुन: उपयोग के लिए वॉटर प्लस और कचरा मुक्ति हेतु स्टार रेटिंग प्रमुख हैं। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत नगरीय निकायों की टीम साल भर काम करती हैं। इसमें नियमित रूप से सफाई के अलावा, कचरा संग्रह, प्र-संस्करण, अधोसंरचना विस्तार, रख-रखाव और शहरों का सौंदर्यीकरण शामिल हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के हस्तक्षेप से आज यह देश ही नहीं दुनिया का सबसे बड़ा आयोजन बन गया है। हर शहर को इसमें शामिल होना और अपनी रैंकिंग में सुधार करना गौरव का अनुभव कराता है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने स्वच्छ सर्वेक्षण के संबंध में मैदानी अमले को निर्देश भी जारी किये हैं। वर्ष-2024 का स्वच्छ सर्वेक्षण अब तक का 9वां सर्वेक्षण है, जिसकी प्रमुख थीम 3-आर (रिसाइकल, रिड्यूस, रियूज) पर आधारित है। इसके प्रारंभ होने से मप्र ने देश के स्वच्छता परिदृश्य में अपनी बढ़त बना ली थी। अपने नियमित योगदान से मप्र शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। वर्ष 2022 में मप्र को देश के सर्वश्रेष्ठ स्वच्छ प्रदेश का सम्मान प्राप्त हुआ एवं वर्ष 2023 में यह नजदीकी मुकाबले में देश के दूसरे नंबर का बेहतर राज्य घोषित किया गया। मप्र का शहर इंदौर लगातार सात सालों से देश का सबसे स्वच्छ शहर बना हुआ है। वर्ष 2024 में इसे सुपर लीग श्रेणी में शामिल किया गया है। इस वर्ष मप्र के सभी शहर इसमें अपनी दावेदारी कर रहे हैं। प्रदेश के सभी शहरों ने स्टार रेटिंग, ओडीएफ डबल प्लस के लिए अपना दावा किया है। इसके अलावा 44 शहरों ने वॉटर प्लस के लिए अपनी दावेदारी की है। हर शहर स्वच्छता के मापदंडों पर सफाई, संग्रहण, कचरा निपटान, प्रोसेसिंग आदि पर पूरा ध्यान दे रहा है। आज प्रदेश में लगभग 6700 टन कचरा प्रतिदिन संग्रह किया जाता है। इसके लिए 7500 से अधिक कचरा वाहन उपलब्ध कराए गए हैं। इस संग्रहित कचरे की प्रोसेसिंग के लिए हर छोटे-बड़े शहर में कम्पोस्टिंग इकाइयां, मटेरियल रिकवरी फैसिलिटीज, निर्माण अपशिष्ट प्रबंधन इकाई और मल-जल निस्तारण के लिये एफएसटीपी उपलब्ध हैं। प्रदेश के बड़े शहरों में कचरा प्रोसेसिंग के लिए अत्याधुनिक इकाइयों की स्थापना की गई है। इसमें जबलपुर और रीवा में कचरे से बिजली, सागर व कटनी में कम्पोस्टिंग, के साथ इंदौर में कचरे से बॉयो सीएनजी निर्माण की इकाइयां लगाई जा चुकी हैं। इसके अलावा भोपाल में कपड़ा, थर्माकोल, प्लास्टिक, निर्माण के साथ मांसाहारी बाजारों से आने वाले कचरे के निपटान के लिए व्यवस्थाएं की गई हैं। प्रदेश में आज 700 से अधिक रिसाइकल, रिड्युज और रियूज़ (आरआरआर) केंद्र संचालित हैं। प्रदेश में एक लाख से कम जनसंख्या के शहरों में मल-जल प्रबंधन व्यवस्थाओं को तैयार करने के लिए कार्यवाही की जा रही है। इसके अंतर्गत जिन शहरों में सीवेज लाइन नहीं हैं, वहाँ नालियों को आपस में जोडक़र उन्हें एसटीपी तक ले जाने का कार्य किया जा रहा है।
कॉलोनाइजर पर सरकार सख्त
मप्र में अवैध कालोनियों के खिलाफ सरकार अब कड़ा रुख अपनाने जा रही है। यदि किसी व्यक्ति ने नियमों को दरकिनार कर गैरकानूनी तरीके से कॉलोनी बसाई, तो उसके खिलाफ सीधे एफआईआर दर्ज कर जेल भेजा जाएगा। उसके साथ ही ऐसे कॉलोनाइजर की संपत्ति जब्त कर उसके बैंक खाते सीज किए जाएंगे। मोहन सरकार ने इस दिशा में मप्र नगरपालिका कॉलोनी विकास नियमों को और सख्त करने की तैयारी कर ली है। नए नियमों का प्रारूप बन चुका है और इसे जल्द ही कैबिनेट से मंजूरी के बाद लागू कर दिया जाएगा। वर्ष 1998 से ही मप्र नगरपालिका कॉलोनी विकास नियमों में यह प्रावधान है कि कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त किसी भी अवैध कॉलोनी के निर्माण पर कॉलोनाइजर को जेल भेज सकते हैं। इतना ही नहीं, यह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है, जिसमें पुलिस को सीधे गिरफ्तारी का अधिकार है। इसके बावजूद अब तक किसी कॉलोनाइजर पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, जिससे अवैध कॉलोनियों की संख्या लगातार बढ़ती गई। अब सरकार नियमों को प्रभावी और सख्त बनाकर इस समस्या पर अंकुश लगाने जा रही है। नए प्रस्ताव के अनुसार किसी कॉलोनाइजर ने कृषि भूमि पर बिना अनुमति कॉलोनी काटी, तो सरकार पहले उस कॉलोनी का अधिग्रहण करेगी। उसके बाद वहां मौजूद खाली प्लॉट को सरकार द्वारा बेचा जाएगा और कॉलोनी का व्यवस्थित विकास किया जाएगा। इससे स्थानीय निकायों को राजस्व की हानि से बचाया जा सकेगा। रहवासियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी। वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा ऐसे कॉलोनियों का सर्वे करवाया जा रहा है। जब तक सर्वे पूर्ण नहीं होता, तब तक उन कॉलोनियों में किसी भी प्रकार की रजिस्ट्री और नामांतरण पर रोक रहेगी। वैध करने के पुराने नियमों में भी बदलाव की तैयारी है। पूर्ववर्ती शिवराज सरकार ने वर्ष 2022 तक की अवैध कॉलोनियों को वैध करने का निर्णय लिया था। इसके लिए 2021 में कॉलोनी विकास नियमों में संशोधन कर 31 दिसंबर 2016 तक बनी कॉलोनियों को वैध करने का प्रविधान जोड़ा गया था। वर्तमान में यह संशोधित नियम लागू है, जिसमें यह भी तय किया गया कि एलआईजी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के रहवासियों से कोई विकास शुल्क नहीं लिया जाएगा। जबकि अन्य वर्गों से विकास शुल्क का केवल 50 प्रतिशत ही वसूला जाएगा और शेष 50 प्रतिशत राशि निकाय द्वारा वहन की जाएगी। प्रदेश में वर्तमान समय में 3000 से अधिक अवैध कॉलोनियां हैं। इनमें अधिकांश नगर निगम और नगर निकाय की सीमा से लगे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। अब सरकार का उद्देश्य ऐसे अवैध निर्माण को पूरी तरह से रोकना है। सरकार चाहती है कि भविष्य में कोई भी कॉलोनाइजर नियमों का उल्लंघन कर कॉलोनी विकसित न कर सके। इसके लिए कठोर कानूनी व्यवस्था की जा रही है ताकि प्रदेश का नगरीय विकास सुव्यवस्थित तरीके से हो सके।