गवाह मुकरा तो…भी आरोपी नहीं बचेगा

  • अब गवाही नहीं, वैज्ञानिक और डिजिटल सबूत होंगे केस की ताकत

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। अपराधियों के हाईटेक होते तरीकों के बीच अब मध्य प्रदेश पुलिस अपनी जांच का तरीका बदलने जा रही है। ऐसे मामलों में जहां गवाह अदालत में पहुंचकर अपने बयान से पलट जाते हैं, वहां पुलिस अब केस को गवाहों की गवाही के भरोसे छोडऩे के बजाय वैज्ञानिक और डिजिटल सबूतों के आधार पर मजबूत करेगी।
इसके लिए जांच अधिकारियों को आधुनिक गैजेट्स के जरिए घटनास्थल से फॉरेंसिक सैंपल, डीएनए और डिजिटल एविडेंस जुटाने की ट्रेनिंग दी गई है। पुलिस मुख्यालय की सीआईडी विंग ने चुनिंदा पुलिस अधिकारियों के लिए तीन दिन की वर्कशॉप-कम-ट्रेनिंग आयोजित की। इसमें फॉरेंसिक, वैज्ञानिक और डिजिटल इन्वेस्टिगेशन के नए तरीकों पर प्रशिक्षण दिया गया। अधिकारियों को खास तौर पर यह समझाया गया कि किसी केस में गवाह बाद में मुकर भी जाएं, तो घटनास्थल से जुटाए गए वैज्ञानिक साक्ष्य जांच की कड़ी को कमजोर न होने दें।
50 फीसदी आरोपियों के कोर्ट से छूटने पर चिंता
पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपियों को अदालत में दोषसिद्ध कराना है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर के बाद करीब 50 फीसदी आरोपी कोर्ट से छूट जाते हैं। इसमें गवाहों के बयान से पलटने की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी गई है। इसी वजह से अब पुलिस का जोर ऐसे साक्ष्य जुटाने पर है, जिन्हें अदालत में तकनीकी रूप से प्रमाणित किया जा सके। घटनास्थल से लिए गए फोटो, वीडियो, डीएनए सैंपल और अन्य फॉरेंसिक साक्ष्य को जांच का अहम आधार बनाया जाएगा।
फॉरेंसिक एक्सपर्ट न हो तो विवेचक खुद जुटाएगा साक्ष्य
ट्रेनिंग के दौरान अधिकारियों को बताया गया कि यदि घटनास्थल पर तत्काल फॉरेंसिक एक्सपर्ट उपलब्ध नहीं है तो जांच अधिकारी की जिम्मेदारी होगी कि वह आधुनिक उपकरणों की मदद से जरूरी सैंपल और डिजिटल सबूत सुरक्षित तरीके से जुटाए। इसके लिए क्राइम सीन की फोटोग्राफी से लेकर सबूत को कोर्ट में पेश करने तक की प्रक्रिया समझाई गई। सीआईडी के स्पेशल डीजी पंकज श्रीवास्तव ने प्रशिक्षण के अंतिम दिन कहा कि आधुनिक अपराधों की जटिल गुत्थियां सुलझाने में तकनीकी ज्ञान की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसलिए पुलिसकर्मियों को जांच के वैज्ञानिक तरीकों में दक्ष होना जरूरी है।
फोटो-वीडियो भी… अब डिजिटल रिकॉर्ड के साथ
पुलिस अब ई-साक्ष्य ऐप के जरिए केस डायरी और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने पर भी जोर दे रही है। घटनास्थल से लिए गए फोटो और वीडियो में समय, तारीख और जियो-लोकेशन दर्ज होगी। इससे डिजिटल साक्ष्य की प्रामाणिकता बनाए रखने और उसमें बाद में छेड़छाड़ की आशंका कम करने में मदद मिलेगी।
क्राइम सीन की तस्वीरों के भी होंगे दो स्तर
जांच अधिकारियों को घटनास्थल की फोटोग्राफी का तरीका भी सिखाया गया है। पहले ओवरऑल फोटोग्राफी के जरिए घटनास्थल और उसके आसपास का पूरा परिदृश्य रिकॉर्ड किया जाएगा। इसके बाद क्लोज-अप फोटो में खून के धब्बे, हथियार, पदचिह्न और दूसरे महत्वपूर्ण साक्ष्यों को बेहद करीब से रिकॉर्ड किया जाएगा। इसके साथ ही सबूतों की चेन ऑफ कस्टडी सुरक्षित रखने और डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी प्रामाणिकता बनाए रखने पर जोर रहेगा। यानी पुलिस की कोशिश अब यह होगी कि आरोपी के खिलाफ केस सिर्फ किसी गवाह के बयान पर निर्भर न रहे, बल्कि घटनास्थल से कोर्ट तक सबूतों की ऐसी कड़ी तैयार हो जिसे तोडऩा आसान न हो।

Related Articles