- भोपाल से चारों दिशाओं में दौड़ेंगे हाईस्पीड कॉरिडोर
- ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर और मंदसौर से राजधानी की कनेक्टिविटी होगी तेज
विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम - भोपाल (डीएनएन)। मध्य प्रदेश में आने वाले वर्षों में सडक़ परिवहन का नक्शा बड़े स्तर पर बदलने की तैयारी है। प्रदेश के प्रमुख महानगरों और बड़े शहरों को राजधानी भोपाल से तेज रफ्तार और नियंत्रित यातायात वाली सडक़ों से जोडऩे के लिए ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे का सर्किट तैयार किया जा रहा है। प्रस्तावित और प्रक्रियाधीन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भोपाल से इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और मंदसौर तक पहुंचना पहले की तुलना में तेज और सुगम हो सकता है। इन परियोजनाओं में कुछ का डीपीआर तैयार कराने की प्रक्रिया चल रही है, कुछ के प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास मंजूरी के लिए भेजे गए हैं, जबकि कुछ परियोजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट लगभग तैयार बताई जा रही है। सरकार की प्राथमिकता इन कॉरिडोर को राजधानी के आसपास बनने वाले नए बायपास और प्रमुख सडक़ों से जोडऩे की है। कुल मिलाकर इन प्रस्तावित प्रोजेक्ट्स की लागत करीब 50 हजार करोड़ रुपये आंकी जा रही है। हालांकि, अंतिम लागत डीपीआर, जमीन अधिग्रहण और परियोजना की स्वीकृति के बाद ही स्पष्ट होगी।
सरकार का फोकस केवल नई सडक़ बनाने तक सीमित नहीं है। योजना यह है कि भोपाल को प्रदेश के प्रमुख आर्थिक, औद्योगिक और प्रशासनिक केंद्रों से ऐसी सडक़ों के जरिए जोड़ा जाए, जिन पर लंबी दूरी का यातायात तेजी से संचालित हो सके। प्रस्तावित नेटवर्क में प्रमुख रूप से भोपाल-इंदौर, भोपाल-जबलपुर, भोपाल-ग्वालियर और भोपाल-मंदसौर कॉरिडोर शामिल हैं। इनके साथ राजधानी के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में प्रस्तावित बायपास भी महत्वपूर्ण कड़ी होंगे। सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं के आकार लेने के बाद राजधानी से बड़े शहरों की यात्रा में समय की बचत होगी। साथ ही औद्योगिक माल की आवाजाही, पर्यटन, व्यापार और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिलने की उम्मीद है।
भोपाल-इंदौर 6 लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे
भोपाल और इंदौर के बीच प्रस्तावित सिक्सलेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे इस पूरे नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है। परियोजना को मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा गया है। प्रस्तावित परियोजना पर करीब 4 हजार करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। इस नए कॉरिडोर के बनने से भोपाल और इंदौर के बीच मौजूदा मार्ग की तुलना में दूरी कम होने की उम्मीद है। उपलब्ध प्रस्ताव के अनुसार दूरी करीब 25 किलोमीटर तक कम हो सकती है। हालांकि, अंतिम दूरी और रूट डीपीआर तथा स्वीकृत एलाइनमेंट पर निर्भर करेगा। इंदौर प्रदेश का प्रमुख औद्योगिक और व्यावसायिक केंद्र है, जबकि भोपाल प्रशासनिक राजधानी है। ऐसे में दोनों शहरों के बीच तेज कनेक्टिविटी को सरकार आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मान रही है।
भोपाल-जबलपुर की दूरी 47 किलोमीटर घटेगी
भोपाल-जबलपुर ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे की डीपीआर तैयार कराने की प्रक्रिया चल रही है। वर्तमान में दोनों शहरों के बीच सडक़ दूरी करीब 286 किलोमीटर बताई गई है। प्रस्तावित नए रूट की लंबाई लगभग 239 किलोमीटर होने का अनुमान है। इस तरह करीब 47 किलोमीटर दूरी कम हो सकती है। वर्तमान यात्रा में लगभग पांच घंटे लगते हैं, जबकि प्रस्तावित कॉरिडोर से यह समय करीब साढ़े तीन घंटे तक आने का अनुमान लगाया जा रहा है। जबलपुर महाकौशल क्षेत्र का प्रमुख शहर होने के साथ-साथ औद्योगिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। इसलिए राजधानी से सीधी और तेज कनेक्टिविटी का असर पूरे महाकौशल क्षेत्र पर पड़ सकता है।
भोपाल-ग्वालियर के बीच 320 किलोमीटर का कॉरिडोर
भोपाल और ग्वालियर के बीच प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एक्सेस-कंट्रोल्ड फोरलेन की लंबाई करीब 320 किलोमीटर बताई जा रही है। वर्तमान में दोनों शहरों के बीच सडक़ दूरी लगभग 400 किलोमीटर है। एमपीआरडीसी ने डीपीआर तैयार कराने के लिए टेंडर जारी किया है। डीपीआर के लिए करीब 6.23 करोड़ रुपये की लागत से सर्वे कराया जाना प्रस्तावित है। प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक नया रूट बनने के बाद भोपाल-ग्वालियर के बीच यात्रा में करीब दो घंटे तक की बचत हो सकती है। यह कॉरिडोर मध्य प्रदेश के उत्तरी हिस्से को राजधानी से जोडऩे के लिहाज से अहम माना जा रहा है। ग्वालियर की कनेक्टिविटी आगरा और दिल्ली की ओर जाने वाले मार्गों से भी जुड़ती है। ऐसे में भोपाल-ग्वालियर एक्सप्रेस-वे का असर केवल दोनों शहरों तक सीमित नहीं रहने की संभावना है।
भोपाल-मंदसौर का सफर 5-6 घंटे में
भोपाल-मंदसौर ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे भी प्रस्तावित सर्किट का हिस्सा है। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 11,550 करोड़ रुपये बताई गई है। मौजूदा समय में भोपाल से मंदसौर की सडक़ दूरी लगभग 366 किलोमीटर है। प्रस्तावित नए मार्ग से यह दूरी करीब 320 किलोमीटर रह सकती है। यात्रा का समय भी 8-9 घंटे से घटकर करीब 5-6 घंटे होने का अनुमान है। मंदसौर और पश्चिमी मध्य प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों को राजधानी से बेहतर कनेक्टिविटी मिलने से व्यापारिक गतिविधियों को लाभ हो सकता है।
भोपाल में भी बदल रहा सडक़ नेटवर्क
इन बड़े प्रोजेक्ट्स को सफल बनाने के लिए राजधानी भोपाल के आसपास की सडक़ व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है। सरकार की योजना है कि बाहर से आने वाले एक्सप्रेस-वे सीधे शहर के भीतर भारी यातायात न बढ़ाएं। इसके लिए भोपाल के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बायपास विकसित किए जा रहे हैं। भोपाल के प्रस्तावित पूर्वी बायपास की लंबाई करीब 52 किलोमीटर बताई गई है। इसे सिक्सलेन बनाया जाना प्रस्तावित है और इसकी अनुमानित लागत करीब 4 हजार करोड़ रुपये है। यह बायपास शहर के पूर्वी हिस्से में बाहरी यातायात को निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। एक्सप्रेस-वे नेटवर्क के साथ इसके जुडऩे से लंबी दूरी के वाहनों को शहर के अंदर प्रवेश किए बिना आगे जाने का रास्ता मिलेगा। पश्चिमी बायपास की लंबाई करीब 36 किलोमीटर होगी। इसे फोरलेन बनाया जाना प्रस्तावित है। इसकी अनुमानित लागत 4,500 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। इस परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी दी गई है। पश्चिमी क्षेत्र से आने-जाने वाले यातायात के लिए यह बायपास महत्वपूर्ण होगा।
भोपाल-विदिशा फोरलेन भी नेटवर्क की अहम कड़ी
भोपाल से विदिशा जाने वाली सडक़ को भी फोरलेन करने की तैयारी है। परियोजना को कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है। करीब 45 किलोमीटर लंबे इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 1,617 करोड़ रुपये है। भोपाल के आसपास बनने वाले बायपास और विदिशा रोड को प्रस्तावित एक्सप्रेस-वे नेटवर्क के साथ जोडऩे पर राजधानी के चारों ओर एक व्यापक कनेक्टिविटी सिस्टम तैयार किया जा सकेगा। यही वजह है कि सरकार इन परियोजनाओं को अलग-अलग सडक़ परियोजनाओं के बजाय एक बड़े नेटवर्क के रूप में देख रही है।
सिंहस्थ 2028 से पहले काम शुरू कराने की तैयारी
मध्य प्रदेश में उज्जैन सिंहस्थ 2028 को देखते हुए भी सडक़ और परिवहन कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर जोर है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के प्रदेश में आने की संभावना को देखते हुए इंदौर, भोपाल और दूसरे प्रमुख शहरों के बीच तेज सडक़ संपर्क महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि इन परियोजनाओं से जुड़े काम समय रहते शुरू हों और प्रमुख कॉरिडोर को चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जाए। हालांकि इतनी बड़ी परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरी, वित्तीय स्वीकृति और निर्माण एजेंसी का निर्धारण जैसे कई चरण होते हैं। इसलिए सभी एक्सप्रेस-वे सिंहस्थ से पहले पूरी तरह तैयार हो जाएंगे, ऐसा दावा करना अभी जल्दबाजी होगी। मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने इन सडक़ परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की है। समीक्षा में अलग-अलग परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति, डीपीआर, टेंडर और संबंधित एजेंसियों की तैयारियों पर चर्चा की गई। भोपाल-इंदौर परियोजना केंद्र सरकार की मंजूरी की प्रक्रिया में है, जबकि भोपाल-जबलपुर और भोपाल-ग्वालियर परियोजनाओं के डीपीआर से जुड़ी प्रक्रिया चल रही है। भोपाल-मंदसौर परियोजना की डीपीआर पर भी काम आगे बढ़ रहा है। इन परियोजनाओं में अधिकांश काम मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन यानी एमपीआरडीसी से जुड़े हैं, जबकि भोपाल-इंदौर कॉरिडोर के लिए राष्ट्रीय स्तर की एजेंसी की भूमिका प्रस्तावित है।
एक्सप्रेस-वे से बदल सकता है आर्थिक भूगोल
ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे का सबसे बड़ा फायदा केवल यात्रा का समय कम होना नहीं होगा। बेहतर सडक़ कनेक्टिविटी से औद्योगिक निवेश, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और कृषि उत्पादों के परिवहन को भी गति मिल सकती है। जहां एक्सप्रेस-वे बनते हैं, वहां उनके आसपास नए लॉजिस्टिक हब, वेयरहाउस, औद्योगिक क्षेत्र, होटल और व्यावसायिक गतिविधियां विकसित होने की संभावना रहती है। यदि मध्य प्रदेश का यह प्रस्तावित सर्किट योजनाबद्ध तरीके से विकसित होता है तो भोपाल के साथ-साथ रास्ते में आने वाले जिलों को भी आर्थिक लाभ मिल सकता है। कृषि प्रधान क्षेत्रों के लिए तेज सडक़ संपर्क का मतलब यह भी है कि उत्पाद बड़े बाजारों तक कम समय में पहुंच सकेंगे। इससे परिवहन लागत और समय में कमी आने की संभावना है। करीब 50 हजार करोड़ रुपये के स्तर की परियोजनाओं को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा। जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी, वित्तीय संसाधन, निर्माण की गुणवत्ता और समयसीमा जैसी चुनौतियां सामने रहेंगी। इसके अलावा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के साथ इंटरचेंज, सर्विस रोड, पुल-पुलिया और शहरों के आसपास कनेक्टिंग रोड का निर्माण भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। केवल एक्सप्रेस-वे बना देने से अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी सुनिश्चित नहीं होगी। भोपाल में पूर्वी और पश्चिमी बायपास तथा भोपाल-विदिशा फोरलेन को इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि इन परियोजनाओं में तालमेल रहता है तो राजधानी के आसपास बनने वाला पूरा सडक़ नेटवर्क अधिक प्रभावी हो सकता है। मध्य प्रदेश में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे का यह नेटवर्क आने वाले वर्षों में प्रदेश के सडक़ परिवहन का नया ढांचा तैयार कर सकता है। भोपाल-इंदौर, भोपाल-जबलपुर, भोपाल-ग्वालियर और भोपाल-मंदसौर जैसे कॉरिडोर राजधानी को प्रदेश के अलग-अलग आर्थिक और भौगोलिक क्षेत्रों से जोड़ेंगे।
11/09/2026
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