
मेरे मन की देहरी पर ,
वे चुपके -चुपके आते हैं।
आस बँधाते, मनुहार करते,
हौले से कुछ कह जाते हैं।
जब होता मेरा रीता -सा मन,
साँसों की उखड़ती लय व स्पंदन,
जीवन से क्षुब्ध हो विकल नयन,
वे आशा के दीप जलाते हैं।
मेरे मन की देहरी पर ,
वे चुपके-चुपके आते हैं।
जब होती संवेदनाएँ आहत मेरी,
तब शब्दों में ढलने लगती हैं।
गीतों के शब्दों में गुँथी भावना,
पीड़ा प्रतिबिंबित करती है।
होता आंदोलित तन और मन,
व्यर्थ सा लगता यह जीवन।
बन उन गीतों की सुरमयी धुन,
वे जीवन को महका जाते हैं।
मेरे मन की देहरी पर ,
वे चुपके -चुपके आते हैं।
एकांत प्रिय साथी बन जाता,
स्वसंवाद की गठरी खुलती है।
अनवरत बहती अश्रुधारा,
मुझसे गलबहियाँ करतीँ है।
झिलमिल-झिलमिल बूँदे बन,
बहती जाती मन की तड़पन।
तब सुखद समीर का झोंका बन,
वे कानों में गीत सुनाते हैं।
मेरे मन की देहरी पर,
वे चुपके-चुपके आते हैं।
- शीला मिश्रा
