विभीषिका

– शीला मिश्रा
यहां- वहां बिखरे शरीर के टुकड़े
और खून से सनी यह पवित्र धरा
 चीत्कार से गूंजती चारों दिशाएं  
 युद्धस्थल असंख्य गिद्धों से भरा।

गूंज रहा है हवा की उदासी में
 रोती-बिलखती पत्नियों का रुदन
 पापा की क्षत-विक्षत देह देख
 नन्हे तड़पते मासूमों का क्रंदन।

 युद्ध की आग में रोज दफन हुए
 न जाने कितने कमसिन सपने
 रोती दीवारें सिसकती खिड़कियां
 राह तक रहीं कब आएंगे अपने।
प्रकृति हो रही तहस-नहस
आग उगलते हैं बम के गोले
इंसान बन गया है खूनी शैतान
मन में दुश्मनी के जलते शोले।

इंसान तो प्रतीक था शांति का
संदेश देता समरसता के लिए
क्यों बन गया लोभ का पुतला
मिटा देगा दुनिया स्वार्थ के लिए।

आग उगलते बम के गोलों से
आखिर क्या हासिल हो पाएगा
वर्चस्व प्राप्ति की लड़ाई में
सर्वस्व विनाश हो जायेगा।

 युद्ध में निर्दोष जो मारे गए
वे सब थे किसी के लाडले
थी मां -बाबा की स्नेहिल गोद
और ममता की छाँव में थे पले।

 मासूमों को अनाथ करके तुम
उसके क्रंदन में जश्न मनाओगे
 चीत्कार की ध्वनियों के बीच
क्या खुशी के गीत गा पाओगे।

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