कविता

  • पीयूशा विजयवर्गीय
कविता

मैं अल्हड़ सी एक नदी, तुम अनंत धीर  समंदर…
तुमसे मिलने की लगन में उन्मुक्त सी अपनी रौ में बहती जाती हूं….
चट्टानों का सीना चीर, हर मर्यादा को लांघती जाती हूं…
बस एक धुन मन में लिए मिलन का गीत गुनगुनाती हूं…
कहते हैं सब मुझसे..अरी पगली खो देगी खुदको.. किसी का कहां सुन पाती हूं…
मुझे तो मिलना है तुम में…खो देना है खुद को…एकाकार हो जाना है…
अपने अस्तितव को तुम में विलीन कर, पा लेना है अपने प्रेम की पूर्णता…

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