
- शीला मिश्रा
प्रेम को कहाँ कोई बाँध पाया है शब्दों में
न ही व्यक्त हो पाया पूर्ण रूप से भावों में।
प्रेम तो व्यक्त होता है
राधा की हर श्वास में
मीरा की आस में
द्रोपदी के विश्वास में
प्रेम ध्वनित होता है
संगीत के अनहद नाद में
सुरों की मीठी तान में
नृत्य के पदताल में
प्रेम सुनाई देता है
कोयल की कूक में
पपीहे की पुकार में
चातक की प्यास में
प्रेम झलकता है
विरह की व्याकुलता में
मिलन की आकुलता में
संवाद की मधुरता में
प्रेम बढ़ता है
महकती अमराईयों में
बहकती पुरवाइयों में
बजती शहनाइयों में
प्रेम को कहाँ कोई बाँध पाया है शब्दों में
न ही व्यक्त हो पाया पूर्ण रूप से भावों में।
