लालसा होगी चर्चित

शीला मिश्रा
  • शीला मिश्रा

सुनो… मैं अरावली हूँ तन-मन से अति विचलित
तुम इंसानों में कैसी है लिप्सा दिन प्रतिदिन हो रही जो वर्धित
प्रकृति का इतना विनाश करके अचरज होता तुम सब हो हर्षित
मेरे पुत्र वृक्षों की निर्मम हत्या कर तुम्हारे मुख हर्ष से कैसे हैं गर्वित
और.. मैं… वेदना से भरा हुआ मेरे बंधु-बांधव भी हैं कुपित
कल-कल बहती मेरी बेटियाँ आज कितनी हैं आक्रोशित
ईश्वर करते रहे तुम्हें सावधान मानो बनकर जो आये याचित
डर है, पर्वत की श्रृंखला मेरे भाई कहीं बना न दें तुम्हें अब शापित
ऐसे विकास पर होगा विनाश देख सब रह जायेंगे अचंभित
दिखाया जो प्रकृति ने रौद्र रुप लालसा तुम्हारी, होगी खूब चर्चित ।

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