छोटे शहरों में भी बनेंगी हाईराइज बिल्डिंग

हाईराइज बिल्डिंग
  • मास्टर प्लान के बिना वाले शहरों में भी निर्माण के नियम होंगे आसान

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में अब शहरों का विकास सिर्फ जमीन पर फैलाव तक सीमित नहीं रहेगा। छोटे शहरों में भी बहुमंजिला इमारतों के निर्माण का रास्ता खोलने की तैयारी है। इसके लिए राज्य सरकार भूमि विकास नियमों में व्यापक बदलाव कर रही है। प्रस्तावित संशोधनों में फ्लोर एरिया रेशियो (एफएआर) की अधिकतम सीमा तीन से बढ़ाकर चार करने और चुनिंदा क्षेत्रों में अनलिमिटेड एफएआर देने का प्रावधान शामिल है। इससे एक ही भूखंड पर अधिक निर्माण संभव हो सकेगा।
खास बात यह है कि जिन शहरों में अब तक मास्टर प्लान लागू नहीं हो पाया है, वहां भी भवन निर्माण के नियमों को सरल बनाने पर जोर है। सरकार का उद्देश्य आम नागरिकों के लिए नियमों को समझना आसान करना, अनियोजित निर्माण पर नियंत्रण रखना और शहरों में वर्टिकल डेवलपमेंट को बढ़ावा देना है। वर्ष 2012 में बने भूमि विकास नियमों में अब तक 50 से अधिक संशोधन हो चुके हैं। अलग-अलग संशोधनों के कारण नियमों को समझना मुश्किल हो गया है। नए ड्राफ्ट में इन बदलावों को एक जगह समेटने की तैयारी है। नए नियमों में भवनों की ऊंचाई से जुड़े प्रावधानों में भी बदलाव प्रस्तावित हैं। विशेष अनुमति की सीमा 30 मीटर से बढ़ाकर 45 से 60 मीटर तक करने की तैयारी है। इससे चौड़ी सडक़ों के आसपास ऊंची इमारतों के निर्माण के लिए बार-बार विशेष अनुमति लेने की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि, यह प्रस्तावित व्यवस्था है और अंतिम प्रावधान नियमों को मंजूरी मिलने के बाद ही स्पष्ट होंगे। इसी तरह एफएआर की अधिकतम सीमा तीन से बढ़ाकर चार करने का प्रस्ताव है। कुछ शर्तों के साथ चुनिंदा क्षेत्रों में अनलिमिटेड एफएआर की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। एफएआर यह तय करता है कि किसी भूखंड के कुल क्षेत्रफल के मुकाबले उस पर कितने क्षेत्र में निर्माण किया जा सकता है। इसकी सीमा बढऩे का मतलब है कि तय शर्तों के अधीन उसी जमीन पर ज्यादा निर्माण की गुंजाइश बन सकती है।
मास्टर प्लान नहीं, तो भी नियमों से तय होगा निर्माण
जिन शहरों में मास्टर प्लान लागू नहीं है, वहां भवन निर्माण की ऊंचाई, खुली जगह, हरियाली, ग्राउंड कवरेज और जमीन के उपयोग जैसे महत्वपूर्ण पहलू भूमि विकास नियमों के आधार पर तय होते हैं। ऐसे में नियमों में बदलाव का असर छोटे शहरों के विकास पर भी पड़ सकता है। नए नियमों में फ्रंट, साइड और रियर मार्जिनल ओपन स्पेस, ग्राउंड कवरेज, भवन की ऊंचाई और एफएआर की गणना को सरल बनाने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार की मंशा है कि आम नागरिक नियमों को आसानी से समझकर अपने भवन की योजना बना सकें और हर छोटी जानकारी के लिए आर्किटेक्ट या कंसल्टेंट पर निर्भरता कम हो। हालांकि, निर्माण की जटिलता और सुरक्षा संबंधी जरूरतों के अनुसार विशेषज्ञों की मदद फिर भी जरूरी हो सकती है।
नियम बदलने के पीछे सरकार के प्रमुख उद्देश्य
मास्टर प्लान के बिना वाले शहरों में निर्माण के नियम आसान करने के पीछे सरकार का उद्देश्य है भवन निर्माण से जुड़े नियमों को सरल और एक जगह उपलब्ध कराना, मास्टर प्लान लागू नहीं होने वाले शहरों में अनियोजित निर्माण पर नियंत्रण, क्षैतिज विस्तार के बजाय वर्टिकल डेवलपमेंट को प्रोत्साहित करना, अग्निसुरक्षा और अन्य आधुनिक सुरक्षा मानकों को शामिल करना, नई निर्माण तकनीकों के अनुरूप नियमों को अपडेट करना और  ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के तहत निर्माण और निवेश की प्रक्रिया आसान बनाना है। नए नियमों का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम ड्राफ्ट में ऊंचाई, एफएआर, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी शर्तें किस तरह तय होती हैं। फिलहाल प्रस्ताव छोटे शहरों में भी बहुमंजिला निर्माण की संभावनाएं बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देते हैं।
खेतों तक फैलते शहरों पर लगेगा दबाव
शहरों की आबादी बढऩे के साथ आवास और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए जमीन की मांग भी बढ़ रही है। अब तक शहरों का विस्तार मुख्य रूप से आसपास की जमीन पर निर्माण करके होता रहा है। इससे कृषि भूमि पर दबाव बढऩे और शहरों के अनियोजित विस्तार की आशंका रहती है। सरकार वर्टिकल डेवलपमेंट को बढ़ावा देकर कम जमीन में अधिक आवास और व्यावसायिक सुविधाएं विकसित करना चाहती है। यदि ऊंची इमारतों के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक नियम लागू होते हैं, तो इससे जमीन के उपयोग की दक्षता बढ़ सकती है। लेकिन इसके साथ सडक़, पार्किंग, पानी, सीवेज, बिजली और अग्निसुरक्षा जैसी सुविधाओं की क्षमता का ध्यान रखना भी जरूरी होगा।
ड्राफ्ट पर मांगे जाएंगे सुझाव
संशोधित भूमि विकास नियमों का ड्राफ्ट गुरुवार को इंदौर में आयोजित अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा जारी किए जाने की संभावना है। इसके बाद आम नागरिकों और संबंधित पक्षों से एक महीने तक सुझाव और आपत्तियां मांगी जाएंगी। प्राप्त सुझावों और सुनवाई के बाद नियमों को अंतिम रूप देकर लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

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