- विदेश प्लेसमेंट से जुड़ा मप्र का नया प्रयोग…
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का तरीका बदलने की तैयारी है। अब कौशल विकास कार्यक्रम में केवल प्रशिक्षण देने को सफलता नहीं माना जाएगा, बल्कि उसका आकलन रोजगार मिलने के आधार पर किया जाएगा। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के विद्यार्थियों को जापान और जर्मनी में नौकरी दिलाने के लिए शुरू की जा रही चार करोड़ रुपए की परियोजना में सरकार ने भुगतान को सीधे प्लेसमेंट के परिणाम से जोडऩे का प्रावधान किया है। इसके तहत संबंधित एजेंसी को भुगतान उम्मीदवारों के विदेश में रोजगार की लिखित पुष्टि मिलने के बाद ही किया जाएगा। इस पहल के लिए मध्य प्रदेश का सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड 22 अक्टूबर को मुंबई स्थित नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के सोशल स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध होने जा रहा है। सरकारी भागीदारी वाले इस सामाजिक कल्याण कार्यक्रम में राशि जुटाने के साथ उसके उपयोग और परिणाम को भी महत्वपूर्ण बनाया गया है। वित्त विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सामाजिक कल्याण कार्यक्रम के लिए इस तरह बॉन्ड के माध्यम से वित्त जुटाने की पहल देश में अपनी तरह का पहला प्रयोग बताई जा रही है।
सरकारी कौशल विकास योजनाओं में प्रशिक्षण पूरा करने वाले उम्मीदवारों की संख्या एक प्रमुख उपलब्धि मानी जाती है, लेकिन प्रशिक्षण के बाद रोजगार मिलने की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। मध्य प्रदेश की इस परियोजना में इसी अंतर को दूर करने का प्रयास किया गया है। एजेंसी की जिम्मेदारी उम्मीदवारों को प्रशिक्षण देने के साथ उन्हें विदेश में रोजगार के लिए तैयार करने और प्लेसमेंट प्रक्रिया में सहायता करने की होगी। योजना के तहत उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग की जाएगी। चयनित विद्यार्थियों को तकनीकी कौशल, जापानी या जर्मन भाषा और व्यक्तित्व विकास का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद उन्हें संबंधित देशों में रोजगार के अवसरों से जोडऩे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। भुगतान को प्लेसमेंट की लिखित पुष्टि से जोडऩे का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजना पर खर्च होने वाली राशि का संबंध निर्धारित रोजगार परिणाम से रहे। हालांकि, इस मॉडल की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि कितने विद्यार्थी प्रशिक्षण के बाद विदेश में नौकरी हासिल कर पाते हैं और वहां रोजगार में बने रहते हैं।
चार करोड़ की परियोजना, तीन स्रोतों से जुटेगी राशि
परियोजना के लिए वित्तीय भागीदारी का ढांचा भी तैयार किया गया है। चार करोड़ रुपए की कुल लागत में राज्य सरकार 35 प्रतिशत राशि देगी, जबकि विद्यार्थियों की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत निर्धारित की गई है। शेष 50 प्रतिशत राशि राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) से जुड़े कौशल विकास तंत्र के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी। अधिकारियों के अनुसार, बॉन्ड को 100 प्रतिशत अभिदान मिल चुका है। इसमें नाबार्ड और निजी एजेंसियों ने निवेश किया है। इस वित्तीय मॉडल के जरिए सरकार सामाजिक कल्याण से जुड़ी परियोजना के लिए संसाधन जुटाने के साथ विभिन्न पक्षों की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती है।
वित्त विभाग की निगरानी में चलेगी योजना
मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल ने 18 नवंबर 2025 को हुई बैठक में प्रदेश में सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड के क्रियान्वयन से संबंधित संशोधनों को मंजूरी दी थी। इसके बाद इस व्यवस्था की निगरानी की जिम्मेदारी वित्त विभाग को सौंपी गई। कार्यक्रम का क्रियान्वयन पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग से संबंधित है। जापान और जर्मनी में रोजगार के लिए तकनीकी दक्षता के साथ भाषा का ज्ञान भी जरूरी है। ऐसे में योजना के तहत उम्मीदवारों को दोनों क्षेत्रों में तैयार करने पर जोर दिया जाएगा। सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि चयनित विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने के बाद वास्तविक रोजगार तक पहुंचाया जाए और निर्धारित परिणामों की पारदर्शी निगरानी की जाए।
सोशल स्टॉक एक्सचेंज से सामाजिक योजनाओं को वित्त
सोशल स्टॉक एक्सचेंज की अवधारणा केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2019-20 के केंद्रीय बजट में प्रस्तुत की थी। इसका उद्देश्य पात्र सामाजिक संस्थाओं और संगठनों को निर्धारित नियमों के तहत सामाजिक क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए धन जुटाने का मंच उपलब्ध कराना है। यह व्यवस्था भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के नियामकीय ढांचे के अंतर्गत संचालित होती है। मध्य प्रदेश की इस परियोजना में इस मंच का उपयोग ओबीसी विद्यार्थियों के कौशल विकास और विदेशी रोजगार के लिए संसाधन जुटाने में किया जा रहा है। अब इस प्रयोग की अहम कसौटी केवल चार करोड़ रुपए जुटाना नहीं, बल्कि यह साबित करना भी होगी कि परिणाम आधारित वित्तीय व्यवस्था से विद्यार्थियों को वास्तविक रोजगार दिलाने में कितनी मदद मिलती है।
19/10/2026
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