चमड़ा, स्टोन क्रशर, पटाखा फैक्ट्री के लिए अलग जोन

  • प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर सख्ती, सामान्य औद्योगिक क्षेत्रों में नहीं मिलेगी जमीन

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश में औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देने की तैयारी है। राज्य के नए औद्योगिक भूमि एवं भवन प्रबंधन नियम-2026 के तहत अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को सामान्य औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन या शेड आवंटित नहीं किए जाएंगे। चमड़ा उद्योग, स्टोन क्रशर, पटाखा निर्माण, ईंट-चूना भ_े और कई अन्य गतिविधियों को इसके दायरे में रखा गया है। ऐसे उद्योगों को उन्हीं औद्योगिक क्षेत्रों में जगह मिल सकेगी, जहां उनके लिए अलग जोन या विशिष्ट क्षेत्र चिह्नित और आरक्षित होंगे। इस व्यवस्था से औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषणकारी गतिविधियों को नियंत्रित करने और पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील उद्योगों को अन्य इकाइयों से अलग रखने की कोशिश की गई है। वहीं, अपशिष्ट जल और खतरनाक अपशिष्ट के उपचार से जुड़ी सेवा प्रदाता इकाइयों को भूमि आवंटन के लिए पात्रता देकर प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित बुनियादी सुविधाओं को बढ़ावा देने का प्रावधान किया गया है।
नए नियमों के अनुसार, कई ऐसी औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों को सामान्य औद्योगिक क्षेत्रों में भूमि आवंटन से बाहर रखा गया है, जिनसे प्रदूषण, अपशिष्ट या अन्य पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं-चमड़ा उद्योग और कसाईखाने, शहरी अपशिष्ट, मृत पशुओं तथा कचरे का संग्रहण, कबाड़ का संग्रहण और रेत की ग्रेडिंग, ईंट एवं चूना भ_े, खुली सैंड ब्लास्टिंग, विस्फोटक और आतिशबाजी का निर्माण व संग्रहण, चारकोल निर्माण और स्टोन क्रशर, फ्लाई ऐश ईंट निर्माण, आरा मशीन, कंक्रीट मिक्सर और हॉट मिक्स प्लांट, मृत पशु अपशिष्ट का प्रसंस्करण और उससे खाद बनाना, ऑटोमोबाइल स्टॉक यार्ड आदि। इन गतिविधियों से जुड़े उद्यमियों को जमीन आवंटन के लिए संबंधित औद्योगिक क्षेत्र के निर्धारित जोन और नियमों के अनुरूप ही अवसर मिलेगा।
खतरनाक उद्योगों के लिए शहर से दूर अलग जोन
अति प्रदूषणकारी और खतरनाक श्रेणी के उद्योगों को सामान्य औद्योगिक क्षेत्रों से अलग रखने की व्यवस्था की गई है। इनके लिए शहरों से दूर विशेष औद्योगिक जोन विकसित करने की अवधारणा रखी गई है, ताकि रिहायशी क्षेत्रों और दूसरी औद्योगिक इकाइयों पर इनके संभावित प्रतिकूल प्रभाव को कम किया जा सके। ऐसे उद्योगों में कई प्रकार के रासायनिक, पेट्रोलियम, धातु प्रसंस्करण और ऊर्जा उत्पादन से जुड़े संयंत्र शामिल हैं। रासायनिक उद्योग: खनिज लवण, अम्ल, क्षार, क्लोरीन, अमोनिया गैस और ब्लीचिंग पाउडर बनाने वाली इकाइयां। इसके अलावा डाई एवं डाई-स्टफ इंटरमीडिएट, सिंथेटिक प्लास्टिक, कीटनाशक, फफूंदनाशक, खरपतवारनाशक और विभिन्न कार्बनिक रसायनों का निर्माण करने वाले उद्योग भी इस श्रेणी में शामिल हैं। वहीं पेट्रोलियम उद्योग जैसे कच्चे तेल का रिफाइनिंग और प्रसंस्करण, नेफ्था क्रैकिंग, कार्बन ब्लैक, पेट्रोलियम कोक और विभिन्न प्रकार के ईंधन एवं लुब्रिकेटिंग ऑयल का उत्पादन करने वाली इकाइयां, धातु एवं अन्य भारी उद्योग जैसे सिंटरिंग, स्मेल्टिंग, ब्लास्ट फर्नेस और अयस्कों के प्रसंस्करण से जुड़ी इकाइयों के अलावा रेडियोधर्मी तत्वों के निर्माण जैसे कार्यों को भी अलग श्रेणी में रखा गया है। इसके अतिरिक्त पेपर और पेपर पल्प उद्योग, अल्कोहल डिस्टिलरी, शक्कर कारखाने, साइनाइड एवं आर्सेनिक यौगिक बनाने वाली इकाइयां, इलेक्ट्रो-थर्मल उद्योग और थर्मल पावर परियोजनाएं भी सूची में शामिल हैं।

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