खत्म हो रहा जांच एजेंसियों का खौफ

रिश्वतखोर
  • जीरो टॉलरेंस के बाद भी हर रोज ट्रैप हो रहे रिश्वतखोर

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। एमपी में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार ने जीरो टॉलरेंस पॉलिसी अपना रखी है, लेकिन घूसखोरी के मामले कम नहीं हो रहे हैं। आलम यह है कि दो अलग-अलग जांच एजेंसियों ने पिछले छह माह के दौरान ही 150 से अधिक सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को घूस लेते रंगे हाथ ट्रैप किया है। हर रोज ही एक न एक रिश्वतखोर जांच एजेंसियों के हत्थे चढ़ रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार इस अवधि में सबसे अधिक कार्रवाई पटवारियों और राजस्व विभाग के कर्मचारियों के खिलाफ की गई। इसके बाद पंचायत एवं ग्रामीण विकास, नगरीय प्रशासन, वन, सहकारिता, महिला एवं बाल विकास, पीडब्ल्यूडी, वेयरहाउसिंग समेत कई विभागों के अधिकारी और कर्मचारी पकड़े गए हैं।
ये हैं बड़े मामले, अब रिश्वत में ले रहे भारी रकम: इसी साल अप्रैल में रायसेन जिले की उदयपुरा नगर परिषद के सब इंजीनियर को दो लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया था। इसी महीने सागर में वन विभाग के रेंजर और लिपिक को भी 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। जुलाई में राजगढ़ जिले के जीरापुर में सहायक समिति प्रबंधक लोकायुक्त के जाल में फंसा, जबकि सितंबर में वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन के दो कर्मचारी 90 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किए गए। जांच एजेंसियों के छापों के दौरान यह भी खुलासा हुआ है कि पहले अधिकारी और कर्मचारी जहाँ छोटी-मोटी रिश्वत लेते थे, वहीं अब यह आंकड़ा काफी अधिक हो गया है। यह सिलसिला बताता है कि कार्रवाई के डर के बावजूद भ्रष्टाचार करने वालों के हौसले कम नहीं हुए हैं।
केस दर्ज होते ही मुचलके पर रिहाई, फैसले में लंबा समय: लोकायुक्त से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार जांच एजेंसी जब भी किसी कर्मचारी या अफसर को रंगे हाथ गिरफ्तार करती है तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होते ही इसकी जानकारी संबंधित विभाग या जिला कलेक्टर को दी जाती है। इसके तत्काल बाद ऐसे कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर उसे निलंबित किया जाता है। नियम के अनुसार निलंबन के 90 दिन के अंदर विभागीय स्तर पर की गई छानबीन के बाद अधिकांश अफसर या कर्मचारी बहाल हो जाते हैं और जांच एजेंसी की कई सालों की छानबीन के बाद जाकर कोर्ट में चार्जशीट पेश की जाती है। छापे के बाद लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू किसी भी आरोपी को मुचलके पर छोड़ देती है।
लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू को कार्रवाई का अधिकार
मप्र लोकायुक्त के आंकड़ों के अनुसार इस साल 1 अप्रैल से 30 सितंबर के बीच प्रदेश में 125 सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को रंगे हाथ रिश्वत लेते ट्रैप किया गया। इसी तरह प्रदेश की दूसरी जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू ने भी लगभग 25 सरकारी कर्मचारियों को घूसखोरी के आरोप में पकड़ा है। इसके अलावा प्रदेश में तैनात केंद्र सरकार के उपक्रमों और विभागों की बात करें तो सीबीआई ने भी इस साल 10 अफसरों और कर्मचारियों को रिश्वत लेते पकड़ा है। इस दौरान कई मामले ऐसे भी रहे जहां रिश्वत मांगने वाले कर्मचारी या अधिकारी किसी किसी प्राइवेट आदमी को भेज देते हैं और खुद बच निकलते हैं।

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