- भोपाल में सबसे ज्यादा अवैध कब्जों का दावा, कारोबार से मलाई खा रहे कब्जाधारी
- इंदौर-जबलपुर-ग्वालियर में भी सरकारी जमीनों पर बने ढांचे, पक्के निर्माण, ट्रस्ट और समितियों के जरिए कब्जे को स्थायी बनाने के आरोप
- गौरव चौहान

मध्यप्रदेश में सरकारी जमीनों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रदेश के चार बड़े शहरों भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक कीमत की जमीनों पर अवैध कब्जे होने का दावा किया जा रहा है। आरोप है कि कई जगह धार्मिक ढांचों की आड़ में सरकारी जमीनों पर कब्जे किए गए और धीरे-धीरे वहां पक्के निर्माण तक खड़े कर दिए गए। कुछ मामलों में ट्रस्ट और समितियां बनाकर इन संपत्तियों से आर्थिक गतिविधियां संचालित किए जाने की बात भी सामने आई है। इस पूरे मामले का दूसरा पहलू यह है कि सरकारी जमीनों पर कब्जे का असर अब केवल संपत्ति के नुकसान तक सीमित नहीं रह गया है। प्रमुख सडक़ों के किनारे बने ढांचे, अस्थायी टेंट और आयोजन स्थलों के कारण यातायात प्रभावित होने की शिकायतें हैं। सवाल यह है कि सरकारी जमीन पर निर्माण होने से लेकर उसके व्यावसायिक इस्तेमाल तक संबंधित विभागों की निगरानी कहां है? यदि जमीन सरकारी है, तो उस पर हुए निर्माण की अनुमति किसने दी और कार्रवाई के बावजूद कब्जे क्यों बने हुए हैं?
शहरों में सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण का स्वरूप धीरे-धीरे बदलने के आरोप हैं। शुरुआत में अस्थायी ढांचा खड़ा किया जाता है, फिर उसके आसपास निर्माण बढ़ता जाता है। कुछ स्थानों पर पक्के भवन बना दिए गए हैं। वहीं, कुछ कब्जों से जुड़े लोगों द्वारा ट्रस्ट या समितियां गठित किए जाने की बात भी कही जा रही है। इन परिस्थितियों में जमीन के वास्तविक स्वामित्व, निर्माण की अनुमति और संपत्ति के इस्तेमाल की जांच जरूरी हो जाती है। किसी धार्मिक स्थल या संस्था का अस्तित्व अपने आप में जमीन पर वैध अधिकार का प्रमाण नहीं है। इसी तरह, किसी ट्रस्ट या समिति का पंजीयन भी सरकारी जमीन पर कब्जे को वैध नहीं बनाता। हालांकि, प्रत्येक मामले में जमीन के रिकॉर्ड, निर्माण की स्थिति और संबंधित दस्तावेजों की अलग-अलग जांच आवश्यक है। जानकारों का कहना है कि लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होने पर अस्थायी अतिक्रमण स्थायी रूप ले लेते हैं। बाद में इन्हें हटाने पर स्थानीय विरोध, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक चुनौतियां सामने आती हैं। इसी कारण शुरुआत में ही अतिक्रमण रोकना अधिक प्रभावी माना जाता है।
भोपाल में सडक़ किनारे बने ढांचे बन रहे परेशानी
भोपाल में बागसेवनिया थाने से अमलतास चौराहे होते हुए 11 मील बायपास तक सडक़ किनारे बने कुछ ढांचों को लेकर यातायात की समस्या का मुद्दा उठाया गया है। आरोप है कि मुख्य मार्गों के पास धार्मिक ढांचे खड़े होने और विशेष अवसरों पर टेंट-तंबू लगाने से सडक़ पर आवाजाही प्रभावित होती है। स्थिति बिगडऩे पर पुलिस की मदद लेनी पड़ती है, लेकिन इसके बाद भी स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा है। यदि सडक़ के किनारे सरकारी भूमि पर अतिक्रमण है, तो उसका असर केवल संबंधित जमीन तक सीमित नहीं रहता। इससे सडक़ की उपलब्ध चौड़ाई कम हो सकती है, वाहनों की गति प्रभावित होती है और व्यस्त समय में जाम की स्थिति बनती है। ऐसे मामलों में राजस्व, नगर निगम, पुलिस और संबंधित सडक़ प्राधिकरण के बीच समन्वय की जरूरत होती है। अतिक्रमण के कारण सार्वजनिक रास्तों का इस्तेमाल प्रभावित हो रहा हो, तो प्रशासन को जमीन की सीमा और निर्माण की वैधता की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही, कार्रवाई केवल छोटे या नए अतिक्रमण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पुराने और प्रभावशाली कब्जों की भी समान मानकों पर जांच जरूरी है।
अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहे सवाल
सेवानिवृत्त सहायक भू-अभिलेख अधिकारी ओपी भट्ट के मुताबिक, जमीन से जुड़े मामलों में स्थानीय अधिकारी कई बार विवाद और विरोध से बचने की कोशिश करते हैं। उनका मानना है कि शासन स्तर पर व्यापक अभियान नहीं चलने से अतिक्रमण की समस्या बढ़ती है। वन एवं राजस्व मामलों के जानकार अनिल गर्ग ने भी जिला मुख्यालयों से लेकर पंचायत स्तर तक सरकारी जमीनों की सुरक्षा को लेकर उदासीनता की बात कही है। उनके अनुसार, बड़े पैमाने पर कब्जे होने के बाद जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराना कठिन हो जाता है। इसके लिए शासन स्तर पर समन्वित अभियान चलाने की आवश्यकता है। इन टिप्पणियों के बीच प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल महत्वपूर्ण है। सरकारी जमीनों का रिकॉर्ड राजस्व विभाग के पास होता है, जबकि शहरी क्षेत्रों में जमीन की प्रकृति के अनुसार नगर निगम, विकास प्राधिकरण या अन्य विभागों की भूमिका भी हो सकती है। ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि किस जमीन पर कब कब्जा हुआ, संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी कब मिली और उसके बाद क्या कार्रवाई की गई। यदि किसी अधिकारी की मिलीभगत के आरोप हैं, तो उनका निर्धारण दस्तावेजी साक्ष्य और निष्पक्ष जांच के आधार पर होना चाहिए। केवल अतिक्रमण मौजूद होने से किसी अधिकारी या संगठन की आपराधिक संलिप्तता स्वत: साबित नहीं होती।
जमीन पर कब्जे के बाद कमाई के रास्ते
अतिक्रमण को लेकर उठ रही शिकायतों में जमीन के आर्थिक इस्तेमाल का पहलू भी शामिल है। आरोप है कि कुछ स्थानों पर धार्मिक आयोजनों के नाम पर चंदा जुटाया जाता है, जबकि कुछ भवनों या परिसरों का विशेष अवसरों पर किराये के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यदि ऐसा किसी सरकारी जमीन पर बिना वैध अधिकार या अनुमति के हो रहा है, तो यह जांच का विषय है कि उससे होने वाली आय किसके पास जा रही है और संपत्ति का इस्तेमाल किस आधार पर किया जा रहा है। ऐसे मामलों में तीन स्तरों पर जांच की जा सकती है। पहला, जमीन का स्वामित्व और उसका वर्तमान उपयोग। दूसरा, निर्माण तथा आयोजन से संबंधित अनुमतियां। तीसरा, परिसर से होने वाली आय और उसके वित्तीय रिकॉर्ड। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कहां केवल अतिक्रमण है और कहां सरकारी संपत्ति का व्यावसायिक इस्तेमाल भी किया जा रहा है।
बड़े संगठनों के बोर्ड भी जांच के दायरे में
कुछ कब्जों को संरक्षण देने के लिए बड़े संगठनों के नाम वाले बोर्ड लगाए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या संबंधित संगठनों की वास्तविक भूमिका है या उनके नाम का इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर प्रभाव बनाने के लिए किया जा रहा है। किसी संगठन का बोर्ड लगा होना उसके आधिकारिक समर्थन या संलिप्तता का निर्णायक प्रमाण नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों में संगठन के अधिकृत पदाधिकारियों, स्थानीय इकाइयों और संबंधित निर्माण से जुड़े दस्तावेजों की पुष्टि की जानी चाहिए। यदि किसी संगठन का नाम उसकी अनुमति के बिना इस्तेमाल किया गया है, तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए। इस मामले में शिकायतों और आंतरिक स्तर पर कार्रवाई की बात कही जा रही है, लेकिन संबंधित संगठनों के नाम, शिकायतों की प्रतियां और कार्रवाई के आधिकारिक दस्तावेज सामने आने पर ही जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण किया जा सकेगा।
लैंडबैंक बचाने की मांग, अतिक्रमण हटाने के लिए अभियान जरूरी
सेवानिवृत्त आईएफएस एके बरोनिया, कर्मचारी नेता अनिल बाजपेयी, सेवानिवृत्त बैंक प्रबंधक शशिकांत यादव और विशेषज्ञ राजकुमार सिन्हा व नितिन सक्सेना ने सरकारी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि भविष्य में हरियाली, पर्यावरण संतुलन और बेहतर शहरी जीवन के लिए जमीन का सुरक्षित रहना जरूरी है। सरकारी जमीनें केवल राजस्व संपत्ति नहीं हैं। इनमें सडक़ विस्तार, सार्वजनिक सुविधाओं, हरित क्षेत्रों और भविष्य की विकास योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण भूमि भी शामिल होती है। यदि इन पर अनियंत्रित कब्जे बने रहते हैं, तो भविष्य में सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध कराना कठिन और महंगा हो सकता है। विशेषज्ञों की मांग है कि शासन स्तर पर अभियान चलाकर सरकारी जमीनों की पहचान, सीमांकन और रिकॉर्ड का सत्यापन कराया जाए। जिन स्थानों पर अवैध कब्जे प्रमाणित हों, वहां कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाए। साथ ही, कार्रवाई के बाद जमीन दोबारा कब्जे में न जाए, इसके लिए नियमित निगरानी की व्यवस्था भी बनाई जाए।
अब जवाबदेही तय करने का समय
10 हजार करोड़ रुपये से अधिक कीमत की जमीनों पर कब्जे का दावा यदि सरकारी रिकॉर्ड से पुष्ट होता है, तो यह सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण से जुड़ा बड़ा प्रशासनिक विषय है। लेकिन समस्या का समाधान केवल अतिक्रमण हटाने की घोषणा से नहीं होगा। इसके लिए शहरवार जमीनों की सूची, स्वामित्व का विवरण, कब्जे की अवधि, संबंधित विभाग और अब तक की गई कार्रवाई को सार्वजनिक करना जरूरी है। सरकार को यह भी स्पष्ट करना होगा कि कितनी जमीनों पर कब्जे की पुष्टि हुई है, कितने मामलों में नोटिस जारी किए गए, कितने प्रकरण अदालतों में लंबित हैं और कितनी भूमि वास्तव में मुक्त कराई गई है। जहां मिलीभगत के प्रमाण मिलें, वहां जिम्मेदार अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है। उसकी सुरक्षा में लापरवाही का नुकसान अंतत: सार्वजनिक सुविधाओं, पर्यावरण और शहरों की व्यवस्थित विकास योजनाओं को उठाना पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि कार्रवाई किसी धार्मिक पहचान या संगठन के आधार पर नहीं, बल्कि जमीन के स्वामित्व, कानून और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर हो।
