प्रशासक राज से मुक्त होगी सहकारिता

सहकारिता
  • मप्र में सहकारिता चुनाव कराने की तैयारी में जुटी सरकार

विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मध्यप्रदेश में सहकारिता की राजनीति आठ साल से चुनाव के इंतजार में है। प्राथमिक कृषि साख समितियों से लेकर जिला सहकारी बैंकों और शीर्ष स्तर की सहकारी संस्थाओं तक निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह लंबे समय से प्रशासक व्यवस्था चल रही है। अब जब सहकारिता चुनाव कराने की चर्चा फिर तेज हुई है, तो उससे भी बड़ा सवाल खड़ा हो गया है-क्या चुनाव से पहले सहकारिता के पूरे नेटवर्क की सत्ता-संरचना बदली जाएगी? केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के मध्यप्रदेश दौरे के साथ यह मुद्दा फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आया है। किसान और सहकारिता से जुड़े स्थानीय नेता उम्मीद कर रहे हैं कि चुनाव को लेकर कोई स्पष्ट दिशा सामने आ सकती है। दूसरी ओर, प्रशासक व्यवस्था को लेकर यह चर्चा भी है कि अधिकारियों की जगह राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को जिम्मेदारी देने की तैयारी की जा रही है। यानी आठ साल से खाली पड़े निर्वाचित बोर्डों के बाद अब सहकारिता में चुनाव से पहले सत्ता की नई जमावट का दौर शुरू हो सकता है।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में सहकारिता सिर्फ खाद-बीज, ऋण और किसानों की जरूरतों से जुड़ी व्यवस्था नहीं है। यह गांव से लेकर जिला और प्रदेश स्तर तक एक बड़ा संगठनात्मक नेटवर्क भी है। करीब आठ साल से इस नेटवर्क में निर्वाचित बोर्डों की गैरमौजूदगी ने अब एक नया सवाल खड़ा कर दिया है-जब चुनाव नहीं होंगे तो सहकारिता की सत्ता किसके हाथ में रहेगी और किसके जरिए चलेगी? प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के चुनाव वर्ष 2017-18 से लंबित हैं। सरकार ने विधानसभा में चुनाव नहीं होने के पीछे अलग-अलग वर्षों की चुनाव आचार संहिता, सदस्यता सूची के पुनर्गठन, कोरोना काल, ऋणमाफी योजना और प्राथमिक कृषि साख समितियों के पुनर्गठन जैसे कारण बताए हैं। फरवरी 2026 के विधानसभा जवाब में भी सरकार ने कहा कि इन प्रक्रियाओं के चलते चुनाव नहीं कराए जा सके और फिलहाल निश्चित समय-सीमा बताना संभव नहीं है। यानी मामला अब सिर्फ चुनाव कब होंगे? का नहीं रह गया है। असली सवाल यह है कि इतने लंबे अंतराल में सहकारिता का निर्णय लेने वाला ढांचा कितना बदल गया है।
चुनाव टले तो स्थानीय प्रतिनिधित्व भी गया
सहकारी संस्था का मूल ढांचा निर्वाचित संचालक मंडल पर आधारित है। कानून में समिति के संचालक मंडल का कार्यकाल पांच साल निर्धारित है। लेकिन जब कार्यकाल खत्म हो जाता है और चुनाव नहीं होते, तब प्रशासनिक व्यवस्था के जरिए संस्था चलती रहती है। फरवरी 2024 के विधानसभा जवाब में सरकार ने बताया था कि 19,800 सहकारी संस्थाओं में प्रशासक नियुक्त थे, जिनमें लगभग 4,500 प्राथमिक कृषि साख समितियों भी शामिल थीं। यहीं से सहकारिता की पूरी तस्वीर बदलती है। निर्वाचित बोर्ड में किसान प्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याएं उठा सकता है, संचालक मंडल के भीतर निर्णयों पर सवाल कर सकता है और स्थानीय स्तर पर संस्था की दिशा प्रभावित कर सकता है। प्रशासक व्यवस्था में निर्णय का केंद्र निर्वाचित सदस्यों से हटकर नियुक्त व्यवस्था की ओर चला जाता है। इसका असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। खाद-बीज वितरण, ऋण, उपार्जन, सदस्यता, संस्था की आर्थिक स्थिति और किसानों की शिकायत जैसे मुद्दों पर स्थानीय प्रतिनिधित्व कमजोर होने का सवाल भी उठता है। सहकारी समितियों की सबसे बड़ी ताकत उनका स्थानीय चरित्र है। गांव का किसान अपने क्षेत्र की समिति में सदस्य होता है, प्रतिनिधि चुनता है और संचालक मंडल के जरिए संस्था के फैसलों में भागीदारी करता है। लेकिन जब चुनाव नहीं हुए तो यह पूरी कड़ी कमजोर पड़ गई। निर्वाचित संचालक मंडल की जगह प्रशासक बैठा। किसान सदस्य बना रहा, लेकिन उसके बीच से चुना गया प्रतिनिधि निर्णय लेने वाली कुर्सी पर नहीं रहा। यही वजह है कि अब बहस सिर्फ चुनाव की तारीख पर नहीं, बल्कि सहकारिता के लोकतांत्रिक चरित्र पर हो रही है।
चुनावों का मामला अदालत तक पहुंच चुका है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक 20 दिसंबर 2023 के हाईकोर्ट आदेश के बाद 10 मार्च 2024 तक चुनाव कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी थी, लेकिन बाद में चुनाव कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका। सरकार ने विधानसभा में भी न्यायालयीन मामलों सहित कई प्रक्रियागत कारणों का उल्लेख किया है। अदालत के स्तर पर भी ऐसे मामलों में प्रशासक व्यवस्था को स्थायी विकल्प नहीं बल्कि चुनाव होने तक की अंतरिम व्यवस्था के रूप में देखा गया है। मई 2024 के एक मामले में हाईकोर्ट ने प्रशासक को चुनाव कराने की दिशा में समयबद्ध कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। इससे एक बुनियादी सवाल और मजबूत होता है-अगर चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल प्रक्रिया है तो उसे अस्थायी कारणों से टालने के बाद उसकी नई समय-सीमा तय करना भी उतना ही जरूरी क्यों नहीं होना चाहिए?
एक प्रशासक के पास कई समितियां
लंबे समय से चल रही प्रशासक व्यवस्था की दूसरी समस्या प्रशासनिक क्षमता से जुड़ी है। कई जगह एक अधिकारी या प्रशासक के पास बड़ी संख्या में समितियों का प्रभार होने की बात सामने आती रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक व्यक्ति दर्जनों समितियों की स्थानीय समस्याओं, किसानों की शिकायतों, ऋण मामलों, खाद-बीज की उपलब्धता और संस्था के वित्तीय संचालन पर प्रभावी निगरानी कर सकता है? निर्वाचित बोर्ड के समय स्थानीय संचालक अपनी समिति की रोजमर्रा की समस्याओं से सीधे जुड़े रहते हैं। प्रशासक व्यवस्था में निर्णय प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से अधिक केंद्रीकृत हो जाती है।
सहकारिता का संकट सिर्फ चुनावी गणित नहीं है। प्राथमिक कृषि साख समितियों ग्रामीण अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। किसान इन संस्थाओं के माध्यम से खाद, बीज, ऋण और दूसरी सहकारी सेवाओं से जुड़े होते हैं। ऐसे में स्थानीय प्रतिनिधित्व कमजोर होने का असर व्यवस्था की जवाबदेही पर पड़ता है। यदि किसी किसान को खाद नहीं मिली, ऋण में देरी हुई या संस्था से जुड़ी कोई समस्या आई तो उसके पास शिकायत दर्ज कराने के लिए विभागीय तंत्र तो है, लेकिन निर्वाचित सहकारी प्रतिनिधि का वह राजनीतिक दबाव और स्थानीय हस्तक्षेप मौजूद नहीं है जो सामान्यत: ऐसी संस्थाओं की कार्यप्रणाली का हिस्सा होता है। इसीलिए सहकारिता के जानकारों का एक वर्ग लंबे समय से चुनाव को केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं बल्कि किसानों की भागीदारी बहाल करने की प्रक्रिया मानता रहा है। सहकारिता चुनावों को लेकर विवाद उस समय और बढ़ गया जब 2025 में सहकारी कानून में संशोधन किया गया। संशोधन के बाद विशेष परिस्थितियों में सरकार को चुनाव आगे बढ़ाने की व्यवस्था मिली। प्रशासक व्यवस्था की अवधि को लेकर भी सरकार के अधिकारों का दायरा बढ़ा। यहीं से विपक्ष और सहकारिता क्षेत्र से जुड़े लोगों ने सवाल उठाया कि अगर चुनाव पहले ही वर्षों से लंबित हैं तो चुनाव टालने की वैधानिक गुंजाइश बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी? दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि सहकारी संस्थाओं के संचालन में कई व्यावहारिक और कानूनी अड़चनें रही हैं। सदस्यता सूचियों का पुनर्गठन, चुनाव आचार संहिता, कोरोना काल, ऋणमाफी से जुड़ी पात्रता और न्यायालयीन प्रकरणों के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इसलिए विवाद अब दो दावों के बीच खड़ा है—सरकार इसे प्रक्रियागत मजबूरी बताती है, जबकि सहकारिता से जुड़े लोग इसे लंबे समय से चली आ रही लोकतांत्रिक रिक्तता मानते हैं।
2.21 लाख प्रतिनिधियों का सवाल
सहकारिता क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार प्रदेश में हजारों कार्यशील समितियां हैं। यदि प्रत्येक समिति के संचालक मंडल में औसतन प्रतिनिधियों की संख्या को आधार माना जाए तो लाखों स्थानीय लोगों की राजनीतिक-सहकारी भूमिका इस लंबे चुनावी अंतराल से प्रभावित हुई है। यह सिर्फ पदों का मामला नहीं है। सहकारी संस्था का अध्यक्ष और संचालक मंडल गांव में एक अलग तरह का स्थानीय नेतृत्व तैयार करता है। यही नेतृत्व आगे चलकर पंचायत, मंडी, जिला और विधानसभा स्तर की राजनीति में भी दिखाई देता है। आठ साल के चुनावी ठहराव ने इस स्थानीय नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार होने की प्रक्रिया को भी प्रभावित किया है। सहकारिता से जुड़े पूर्व पदाधिकारियों का दावा है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में किसान सहकारी बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े होने के बावजूद किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा से बाहर हैं। यह आंकड़ा सहकारिता व्यवस्था की पहुंच पर सवाल खड़ा करता है। हालांकि केसीसी से बाहर रहने के कारण केवल चुनाव न होना नहीं हैं। पात्रता, बैंकिंग प्रक्रिया, ऋण सीमा, भूमि रिकॉर्ड और अन्य प्रशासनिक कारण भी इसके पीछे हो सकते हैं। इसलिए इसे सीधे चुनाव न होने का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। लेकिन सवाल यह जरूर है कि जिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य किसान को स्थानीय स्तर पर वित्तीय सुविधा देना है, उसमें किसान की आवाज कितनी प्रभावी है?
सहकारिता में सदस्य सिर्फ ग्राहक नहीं होता, वह संस्था का हिस्सेदार भी होता है। इसलिए संस्था के आर्थिक प्रदर्शन और लाभ के वितरण का सवाल भी महत्वपूर्ण है। सहकारिता क्षेत्र के पूर्व पदाधिकारियों का दावा है कि कई वर्षों से समितियों में लाभांश वितरण की प्रक्रिया प्रभावी नहीं रही है। यदि यह स्थिति व्यापक स्तर पर है तो चुनाव से अलग भी इसकी जांच जरूरी होगी-कितनी समितियां लाभ में हैं, कितनी घाटे में, कितनों ने लाभांश बांटा और कितनों में नहीं बांटा गया। यानी चुनाव होने से सहकारिता की सारी समस्याएं अपने आप खत्म नहीं होंगी। चुनाव के साथ वित्तीय पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी होगी। सहकारी सुधारों के लिए बैद्यनाथन समिति की सिफारिशों को लंबे समय से महत्वपूर्ण माना जाता है। मध्यप्रदेश में भी सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने के लिए केंद्र से वित्तीय सहायता मिली थी। सहकारिता सुधारों का मूल विचार यही था कि संस्थाओं में सदस्यों की भागीदारी बढ़े और निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए लोकतांत्रिक संचालन सुनिश्चित हो। यही वजह है कि वर्तमान प्रशासक व्यवस्था को लेकर सवाल उठते हैं कि क्या लंबे समय तक नियुक्त व्यवस्था में चलने वाली सहकारी संस्था उस मूल सहकारी भावना को कायम रख सकती है? आने वाले सहकारी चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि यह केवल अध्यक्ष और संचालक चुनने की प्रक्रिया नहीं होगी। यह तय करेगा कि ग्रामीण सहकारिता का स्थानीय नेतृत्व किसके हाथ में जाता है। क्या पुराना नेतृत्व लौटेगा? क्या नई पीढ़ी सामने आएगी? क्या राजनीतिक दल सहकारी संस्थाओं में अपना संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत करेंगे? क्या किसान प्रतिनिधि वास्तव में संस्था के निर्णयों में प्रभावी होंगे? और क्या प्रशासक व्यवस्था सिर्फ चुनाव होने तक की अंतरिम व्यवस्था साबित होगी? इन सवालों के जवाब चुनाव कार्यक्रम से ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे।

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