चुनावी राज्यों में मप्र के मंत्रियों की अग्निपरीक्षा

अग्निपरीक्षा
  • प्रदर्शन से तय हो सकता है सियासी भविष्य, 2028 के टिकट पर भी पड़ सकता है असर
    गौरव चौहान
    / भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही वर्ष 2028 में होने हैं, लेकिन प्रदेश भाजपा के मंत्रियों और नेताओं के लिए चुनावी परीक्षा उससे पहले ही शुरू होने की तैयारी है। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश के नेताओं की चुनावी उपयोगिता, संगठनात्मक क्षमता और जनसंपर्क कौशल को परखना चाहता है। इसके लिए मंत्रियों, निगम-मंडलों के पदाधिकारियों और चुनिंदा विधायकों को उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित चुनावी राज्यों में जिम्मेदारी देने की तैयारी की जा रही है। इस कवायद को केवल दूसरे राज्यों में पार्टी का प्रचार करने की जिम्मेदारी के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे नेताओं की राजनीतिक क्षमता के आकलन से भी जोड़कर देखा जा रहा है। प्रदेश भाजपा संगठन ऐसे नेताओं की सूची तैयार कर रहा है, जिन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में भेजा जा सकता है। हालांकि, जिम्मेदारियों के अंतिम बंटवारे और नेताओं के चयन पर औपचारिक निर्णय होना बाकी है।
    प्रस्तावित रणनीति के तहत मंत्रियों को दीपावली के बाद उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में भेजे जाने की चर्चा है। उन्हें अपने निर्धारित क्षेत्रों में जाकर बूथ स्तर तक संगठन की स्थिति समझनी होगी। स्थानीय कार्यकर्ताओं से संपर्क, कमजोर बूथों की पहचान, पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने और चुनावी प्रबंधन को मजबूत करने जैसे काम उनकी जिम्मेदारी में शामिल हो सकते हैं। भाजपा के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनावी राज्यों में स्थानीय मुद्दों और सामाजिक समीकरणों के अनुरूप रणनीति बनाना जरूरी होता है। मध्यप्रदेश में मंत्री पद संभाल रहे नेताओं को दूसरे राज्यों में संगठनात्मक जिम्मेदारी देकर पार्टी यह भी देखना चाहेगी कि वे अपने प्रशासनिक अनुभव को चुनावी प्रबंधन में कितना उपयोगी बना पाते हैं।
    दूसरी टीम की निगरानी से बढ़ेगी जवाबदेही
    सूत्रों के मुताबिक, जिन क्षेत्रों में मध्यप्रदेश के नेताओं को जिम्मेदारी दी जाएगी, वहां केंद्रीय नेतृत्व अलग से दूसरी टीम भी सक्रिय कर सकता है। यह टीम संगठन की स्थिति, नेताओं की सक्रियता और उनके कामकाज का आकलन कर रिपोर्ट सौंपेगी। इस तरह संबंधित नेताओं के प्रदर्शन का मूल्यांकन केवल उनके अपने दावों के आधार पर नहीं, बल्कि स्वतंत्र फीडबैक के जरिए भी किया जा सकेगा। यदि किसी नेता का प्रदर्शन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहता है, तो चुनाव की घोषणा के बाद उसकी जिम्मेदारी बदली जा सकती है। इसके बाद उसे मध्यप्रदेश में अपनी विधानसभा और आसपास के उन क्षेत्रों में संगठन मजबूत करने का काम सौंपा जा सकता है, जहां भाजपा को कांग्रेस से चुनौती मिलती रही है।
    निगम-मंडल के पदाधिकारियों और विधायकों को भी मौका
    चुनावी जिम्मेदारियां केवल मंत्रियों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। निगम-मंडलों में पद संभाल रहे भाजपा नेताओं को भी उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय किया जा सकता है। उन्हें स्थानीय संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय बनाकर काम करना होगा। इसके अलावा, ऐसे विधायकों को भी जिम्मेदारी देने पर विचार किया जा रहा है, जिन्होंने पिछले विधानसभा या लोकसभा चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश में पार्टी के लिए काम किया था। उनके पुराने अनुभव और स्थानीय संपर्कों का उपयोग चुनावी रणनीति को मजबूत बनाने में किया जा सकता है। पंजाब के लिए भी मध्यप्रदेश के कुछ मंत्रियों और नेताओं को जिम्मेदारी सौंपे जाने की चर्चा है।
    2028 के टिकट की कसौटी भी बन सकता है प्रदर्शन
    इस पूरी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू मध्यप्रदेश का अगला विधानसभा चुनाव है। यदि दूसरे राज्यों में नेताओं के कामकाज का आकलन उनकी संगठनात्मक क्षमता के आधार पर किया जाता है, तो उसका असर प्रदेश में उनकी राजनीतिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। पार्टी के भीतर यह आकलन भविष्य में जिम्मेदारियों के वितरण और उम्मीदवारों के चयन के दौरान उपयोगी हो सकता है। हालांकि, दूसरे राज्यों में प्रदर्शन के आधार पर वर्ष 2028 के विधानसभा टिकट का फैसला किए जाने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। फिलहाल इसे संगठनात्मक मूल्यांकन की संभावित रणनीति के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
    केंद्रीय मंत्रियों की भूमिका पर भी नजर
    मध्यप्रदेश से केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल सांसदों को भी चुनावी राज्यों में जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। प्रदेश से वर्तमान में छह सांसद केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल बताए गए हैं। संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल में मध्यप्रदेश के प्रतिनिधित्व में बदलाव की चर्चाएं भी हैं, लेकिन राज्य के दो मंत्रियों को हटाए जाने या उनकी जगह किसी अन्य सांसद को शामिल किए जाने की बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं है। यदि चुनावी राज्यों में संगठनात्मक जिम्मेदारियों के साथ केंद्रीय मंत्रियों के कामकाज का भी आकलन होता है, तो यह उनके राजनीतिक प्रभाव और पार्टी के लिए उपयोगिता को परखने का एक अतिरिक्त माध्यम बन सकता है।
    नवरात्रि की बैठक में तय हो सकती है रणनीति
    प्रदेश भाजपा संगठन नवरात्रि के दौरान भोपाल में बैठक बुलाकर चुनावी राज्यों के लिए जिम्मेदारियों पर चर्चा कर सकता है। इसमें प्रदेश प्रभारी बिप्लब कुमार देव और संगठन प्रभारी चंद्रशेखर तिवारी की मौजूदगी में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तथा प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के साथ विचार-विमर्श की संभावना है। बैठक में किन नेताओं को किस राज्य और क्षेत्र की जिम्मेदारी दी जाएगी, इस पर अंतिम निर्णय होने की उम्मीद है। इसके बाद स्पष्ट होगा कि मध्यप्रदेश भाजपा के कितने मंत्री, विधायक और निगम-मंडलों के पदाधिकारी दूसरे राज्यों में चुनावी मोर्चा संभालेंगे। कुल मिलाकर, दूसरे राज्यों के चुनाव मध्यप्रदेश भाजपा के नेताओं के लिए संगठन विस्तार का अवसर होने के साथ अपनी क्षमता साबित करने की चुनौती भी बन सकते हैं। लेकिन इस अभियान का वास्तविक राजनीतिक असर तभी स्पष्ट होगा, जब जिम्मेदारियां तय होंगी और पार्टी उनके प्रदर्शन के आधार पर आगे की रणनीति बनाएगी।

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