फर्जी किसान बनकर सरकारी खरीदी में सेंध


 3 हजार की मूंग 8.5 हजार में सरकार को बेची
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
। मध्यप्रदेश में किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम दिलाने के लिए चल रही सरकारी खरीदी व्यवस्था में ही सेंधमारी का मामला सामने आया है। रायसेन जिले में आरोपियों ने असली किसानों की जमीन को कागजों में अपना बताकर फर्जी पंजीयन कराया और बाजार में 3 हजार रुपए से कम कीमत वाली मूंग को सरकारी केंद्रों पर करीब 8.5 हजार रुपए प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य पर खपा दिया। मामला बाड़ी और बरेली तहसील की सहकारी समितियों से जुड़ा है, जहां वर्ष 2024-25 और 2025-26 में यह खेल चलने का आरोप है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने प्रारंभिक जांच में करीब 13.35 लाख रुपए के सरकारी नुकसान का पता लगाया है। मामले में तीन कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है।
घोटाले का तरीका सरकारी उपार्जन व्यवस्था की जानकारी रखने वालों ने ही खोजा। समर्थन मूल्य पर फसल बेचने के लिए किसान को पहले अपनी जमीन का पंजीयन कराना होता है। उपार्जन केंद्रों पर काम करने वाले कर्मचारियों को यह जानकारी रहती थी कि कौन किसान पंजीयन कराने नहीं आया है। आरोप है कि इसी जानकारी का इस्तेमाल कर ऐसे किसानों की जमीन के फर्जी पंजीयन करा दिए गए। कागजों में आरोपियों ने खुद को बटाईदार बताया, जबकि वास्तविक किसानों ने किसी को भी अपनी जमीन पर फसल बेचने का अधिकार देने से इनकार किया। इसके बाद बाजार से सस्ती और घटिया गुणवत्ता की मूंग खरीदी गई और उसे उन्हीं फर्जी पंजीयनों के आधार पर सरकारी खरीदी केंद्रों पर समर्थन मूल्य पर बेच दिया गया।
3 हजार से कम की मूंग, सरकार को 8,558 से 8,682 रुपए में
जांच में सामने आया है कि बाजार और बरेली मंडी से खरीदी गई मूंग की कीमत 3,000 रुपए प्रति क्विंटल से भी कम थी। इसके बाद यही मूंग सरकारी उपार्जन केंद्रों पर कई गुना ज्यादा कीमत पर बेची गई। वर्ष 2024-25 में मूंग का समर्थन मूल्य 8,558 रुपए प्रति क्विंटल, जबकि 2025-26 में यह 8,682 रुपए प्रति क्विंटल था। यानी बाजार की सस्ती मूंग को सरकारी समर्थन मूल्य पर खपाकर आरोपियों ने सरकारी खरीद व्यवस्था से सीधे आर्थिक लाभ उठाया।
जमीन किसी की, पंजीयन किसी और का
मामले की परतें तब खुलीं, जब जांच के दौरान एक किसान की करीब डेढ़ एकड़ जमीन का पंजीयन किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर मिला। दूसरे मामले में किसान की पत्नी और बहू के नाम दर्ज जमीनों के भी अलग-अलग पंजीयन सामने आए। जांच एजेंसी को यह भी पता चला कि जिन किसानों के नाम जमीन दर्ज थी, उनके बजाय दूसरे बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया था। जब किसानों से पूछताछ हुई तो उन्होंने फसल बेचने या किसी अन्य व्यक्ति को अपनी जमीन का अधिकार देने से साफ इनकार किया।
तीन समितियों में कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल
मामला जिला सहकारी बैंक की बाड़ी शाखा के अंतर्गत आने वाली कृषक सेवा सहकारी समितियों देहरीकला, भारकच्छ कला और गूगलवाड़ा से जुड़ा है। ईओडब्ल्यू के मुताबिक देहरीकला समिति के कंप्यूटर ऑपरेटर श्रीराम ठाकुर, समिति कर्मचारी रंजीत ठाकुर और भारकच्छ कला के कंप्यूटर ऑपरेटर गौरव ठाकुर ने मिलकर फर्जी पंजीयन और मूंग खरीदी की प्रक्रिया को अंजाम दिया। जांच में श्रीराम ठाकुर द्वारा अपने नाम पर बड़ी मात्रा में जमीन का पंजीयन कर मूंग बेचने की बात सामने आई है। रंजीत ठाकुर और गौरव ठाकुर पर भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी खरीदी का लाभ लेने का आरोप है।
अभी सिर्फ 13.35 लाख का मामला सामने आया
प्रारंभिक जांच में तीनों के जरिए शासन को करीब 13.35 लाख रुपए की चपत लगने का खुलासा हुआ है। हालांकि ईओडब्ल्यू अब यह जांच कर रहा है कि फर्जी पंजीयन का यह खेल सिर्फ सामने आए किसानों तक सीमित था या इसी तरीके से और किसानों की जमीन का इस्तेमाल किया गया। यदि जांच में और पंजीयन और खरीदी सामने आती है तो सरकारी नुकसान की रकम भी बढ़ सकती है। फिलहाल तीनों आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर दस्तावेजों, पंजीयन, बैंक खातों और खरीदी की पूरी प्रक्रिया की जांच की जा रही है। यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सरकारी खरीदी में किसान के नाम, जमीन, पंजीयन, बैंक खाते और उपज की जानकारी के आधार पर भुगतान किया जाता है। ऐसे में यदि फर्जी पंजीयन के जरिए बाहरी बाजार से खरीदी गई मूंग सरकारी केंद्र तक पहुंच गई, तो यह सिर्फ तीन कर्मचारियों की भूमिका का मामला नहीं, बल्कि पूरी सत्यापन व्यवस्था की निगरानी पर भी सवाल खड़ा करता है।

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