तामोट प्लास्टिक पार्क में 84% भूखंड खाली

  • 108 करोड़ की अधोसंरचना, फिर भी निवेशक नहीं
  • गौरव चौहान
तामोट प्लास्टिक पार्क

सरकार ने तामोट में प्लास्टिक उद्योग का बड़ा हब खड़ा करने के लिए सडक़, बिजली, पानी और दूसरी जरूरी सुविधाओं पर करीब 108 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, लेकिन इसके बावजूद पार्क अपेक्षित औद्योगिक गतिविधि नहीं पकड़ सका। मंडीदीप से करीब 15 किलोमीटर दूर विकसित देश के दूसरे सबसे बड़े प्लास्टिक पार्क में एक दशक के बाद भी अधिकांश भूखंड खाली हैं।
121.90 एकड़ में विकसित इस पार्क में 172 भूखंड आरक्षित किए गए हैं, लेकिन अब तक सिर्फ 28 भूखंडों की बुकिंग हुई है। इनमें भी केवल 10 इकाइयां स्थापित हो पाई हैं। इन इकाइयों में करीब 10 से 15 करोड़ रुपये का निवेश और लगभग 150 लोगों को रोजगार मिलने की जानकारी है। यानी जिस पार्क से करीब 5 हजार प्रत्यक्ष और 15 हजार अप्रत्यक्ष रोजगार की उम्मीद की गई थी, वहां रोजगार और निवेश दोनों लक्ष्य से काफी दूर हैं।
जमीन और सुविधाएं तैयार, उद्योगों का इंतजार
तामोट प्लास्टिक पार्क की योजना करीब 12 साल पहले छोटे-बड़े प्लास्टिक उद्योगों को एक ही स्थान पर जमीन और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के सहयोग से विकसित इस पार्क में अधोसंरचना खड़ी करने पर करीब 108 करोड़ रुपये खर्च किए गए। लेकिन सरकारी निवेश के मुकाबले निजी निवेश की रफ्तार बेहद धीमी रही। अधिकांश भूखंड खाली होने से पार्क की वास्तविक औद्योगिक क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है।
निवेश खींचने के लिए दो बार घटाए भूखंडों के दाम
निवेशकों को आकर्षित करने के लिए एमपीआईडीसी ने भूखंडों की कीमतों में दो बार बदलाव किया। पहले भूखंड की दर 450 रुपये प्रति वर्गमीटर और डेवलपमेंट चार्ज 1350 रुपये था। बाद में भूखंड की दर घटाकर 340 रुपये प्रति वर्गमीटर की गई, जबकि डेवलपमेंट चार्ज 1360 रुपये रखा गया। इसके बावजूद बड़े निवेशकों की कमी बनी हुई है। उद्यमियों का कहना है कि जमीन की कीमतों के अलावा पार्क में उद्योगों की श्रेणी और निवेश की शर्तों को भी अधिक लचीला करने की जरूरत है।
इन्वेस्टर्स समिट भी नहीं बदल सकी तस्वीर
तामोट को निवेश के नक्शे पर लाने के लिए ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का भी सहारा लिया गया। करीब डेढ़ साल पहले भोपाल में हुए समिट के दौरान थाईलैंड, ब्राजील सहित अन्य देशों के निवेशकों को तामोट प्लास्टिक पार्क में निवेश के लिए आमंत्रित किया गया था। उम्मीद थी कि विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी से पार्क में बड़े उद्योग आएंगे और खाली भूखंडों में गतिविधियां शुरू होंगी। लेकिन समिट के बाद भी पार्क में अपेक्षित बड़ा निवेश नहीं आ सका।
5 हजार रोजगार का सपना, अब तक 150 लोगों को काम
तामोट पार्क को विकसित करते समय इसका एक बड़ा उद्देश्य रोजगार पैदा करना भी था। अनुमान था कि यहां करीब 5 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और 15 हजार लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। लेकिन मौजूदा स्थिति में स्थापित 10 इकाइयों से लगभग 150 लोगों को ही रोजगार मिल पाया है। यानी रोजगार के घोषित लक्ष्य और मौजूदा स्थिति के बीच बड़ा अंतर है। यही अंतर अब इस परियोजना की सफलता पर सवाल खड़ा करता है।
उद्यमियों की मांग- मिक्स इंडस्ट्री को मिले अनुमति
उद्यमी एवं एसोसिएशन ऑफ ऑल इंडस्ट्रीज, मंडीदीप के पूर्व अध्यक्ष संजय खंडेलवाल के मुताबिक एमपीआईडीसी द्वारा तय भूखंड दरों में और कमी की जरूरत है। उनका कहना है कि यदि यहां मिक्स इंडस्ट्रीज को अनुमति दी जाए तो अधिक संख्या में प्लॉट बिक सकते हैं। दूसरी ओर एमपीआईडीसी का कहना है कि पार्क में भूखंडों की बुकिंग जारी है और कुछ फैक्ट्रियों का निर्माण भी चल रहा है। पार्क के बाहर भी बड़ी कंपनियां गतिविधियां कर रही हैं।
अब सवाल निवेश के साथ नीति पर भी
तामोट की कहानी में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पार्क में सुविधाएं बनीं या नहीं, बल्कि यह है कि 108 करोड़ रुपये की अधोसंरचना तैयार होने के बावजूद निजी निवेश क्यों नहीं आया। एक दशक में 172 में सिर्फ 28 भूखंडों की बुकिंग और 10 इकाइयों की स्थापना बताती है कि केवल जमीन और बुनियादी सुविधाएं तैयार कर देने से औद्योगिक क्लस्टर अपने आप सक्रिय नहीं होता। अब चुनौती पार्क में खाली भूखंडों को भरने के साथ ऐसे निवेश माहौल और नीतिगत व्यवस्था तैयार करने की है, जिससे बड़े उद्योग यहां आएं, उत्पादन शुरू हो और रोजगार के पुराने लक्ष्य जमीन पर दिखाई दें।

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