
- पुराने निर्माण बिलों से उच्च शिक्षा विभाग ने झाड़ा पल्ला
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश में आर्थिक तंगी के बीच सरकार जहां नए खर्च और खरीदी पर लगाम लगा रही है, वहीं पुराने निर्माण कार्यों के लंबित बिलों का बोझ भी अब सरकारी खजाने से हटाकर संस्थानों पर डाला जा रहा है। उच्च शिक्षा विभाग ने प्रदेश के 31 सरकारी कॉलेजों के 8 करोड़ 72 लाख 47 हजार 452 रुपए के लंबित बिलों का भुगतान राज्य शासन के मद से करने से इनकार कर दिया है। अब इन बिलों का भुगतान संबंधित कॉलेजों को अपनी जनभागीदारी समिति के मद से करना होगा।
खास बात यह है कि कॉलेज यदि इन पुराने बिलों का भुगतान जनभागीदारी समिति से करते हैं तो बाद में सरकार इसकी प्रतिपूर्ति या समायोजन नहीं करेगी। यानी जिन निर्माण कार्यों को कभी शासन की मंजूरी और राशि आवंटन के आधार पर शुरू कराया गया था, उनका बचा हुआ भुगतान अब कॉलेजों को अपने स्तर पर जुटाना होगा।
2022-23 में मंजूर कामों का भी भुगतान अटका
विभाग के आदेश से सामने आया है कि इनमें कई ऐसे निर्माण कार्य हैं जिन्हें वर्ष 2022-23 में मंजूरी देकर राशि आवंटित की गई थी। कुछ काम पूरे भी हो चुके हैं और कई मामलों में आंशिक बिलों का भुगतान पहले ही किया जा चुका है। लेकिन बकाया राशि के बिल अब लंबित हैं। विभाग ने कॉलेजों से कहा है कि यदि संबंधित काम पूरा हो चुका है और छात्रहित में उसका उपयोग किया जा रहा है तो जनभागीदारी समिति से भुगतान किया जा सकता है। इसके लिए पहले समिति की बैठक में प्रस्ताव पारित करना होगा। भुगतान के बाद कॉलेजों को उपयोगिता प्रमाण पत्र भी देना होगा।
वित्तीय वर्ष खत्म, नए बजट में प्रावधान नहीं
लंबित भुगतान रोकने के लिए शासन ने तर्क दिया है कि संबंधित कार्यों के लिए राशि वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए आवंटित की गई थी। संस्थाओं द्वारा निर्धारित वित्तीय वर्ष में काम पूरा नहीं किया गया। इसके बाद वित्तीय वर्ष 2026-27 में इन कार्यों के लिए बजट प्रावधान नहीं किया गया। विभाग ने कहा है कि भविष्य में बजट प्रावधान होने पर भुगतान की कार्रवाई की जाएगी। लेकिन इसी आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि जनभागीदारी समिति से किए गए भुगतान की बाद में प्रतिपूर्ति नहीं की जाएगी।
कॉलेजों के सामने दोहरी मुश्किल
सरकार के इस फैसले से कॉलेज प्रशासन के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ पुराने निर्माण कार्यों से जुड़े भुगतान का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ जनभागीदारी समिति के संसाधनों का इस्तेमाल छात्र सुविधाओं और कॉलेज की जरूरतों के लिए किया जाता है। ऐसे में करोड़ों रुपए के पुराने बिल चुकाने से कॉलेजों के दूसरे कामों के लिए उपलब्ध राशि प्रभावित होने की आशंका है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब निर्माण कार्यों को शासन ने मंजूरी दी, राशि आवंटित की और कई काम पूरे भी हो गए, तो उनका बकाया भुगतान कॉलेजों की जनभागीदारी समिति के खाते से क्यों कराया जा रहा है? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब कॉलेज अपनी समिति से भुगतान कर देंगे तो सरकार उसकी प्रतिपूर्ति भी नहीं करेगी। आर्थिक दबाव के बीच सरकार का यह फैसला फिलहाल सरकारी खजाने पर तत्काल भार कम कर सकता है, लेकिन इसका सीधा वित्तीय दबाव अब उन्हीं कॉलेजों पर पड़ रहा है, जिनके पास पहले से सीमित संसाधन हैं।
बड़े कॉलेजों पर लाखों का भार
इस फैसले का असर प्रदेश के कई बड़े सरकारी कॉलेजों पर भी पड़ा है। भोपाल के एमवीएम कॉलेज पर 89.41 लाख रुपए, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी विज्ञान एवं वाणिज्य महाविद्यालय पर 45.59 लाख और सरोजिनी नायडू महाविद्यालय पर करीब 9.13 लाख रुपए के लंबित भुगतान का भार आया है। जबलपुर के मोहनलाल हरगोविंददास गृहविज्ञान एवं विज्ञान महिला महाविद्यालय पर करीब 73.43 लाख रुपए, झाबुआ के आदेश महाविद्यालय पर 60.70 लाख, सेंधवा के वीर बलिदानी खाच्या नायक पीजी कॉलेज पर 70.91 लाख और सिरोंज के लाल बहादुर शास्त्री पीजी कॉलेज पर 79.40 लाख रुपए का भुगतान लंबित है।
