बृजेन्द्र तिवारी: एक अनथक योद्धा

  • स्मृति शेष…

राकेश अचल
आखिर बृजेन्द्र तिवारी भी इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए। वे दो दिन पहले ही मेरे ख्वाब में आए थे। निष्प्राण गस्त के ताजिया की गली में अपने घर पर। लेकिन सचमुच उनकी विदाई आज हुई और भीतर तक तोड़ भी गई। बृजेन्द्र तिवारी अधिकांश लोगों के भाई साहब थे अपने हम उम्र लोगों को छोडक़र। समाजवादी संस्कार उनके गुणसूत्रों मेओ थे। वे अपने पिता स्वर्गीय विष्णुदत्त तिवारी की राजनीतिक विरासत के स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे।वे 977 में गिर्द से विधायक रहे थे। तब बृजेन्द्र तिवारी की उम्र 27  साल की रही होगी। आपको शायद यकीन न हो लेकिन हकीकत है कि बृजेन्द्र तिवारी को उनके पिता 1984 में ही विधायक बना देखना चाहते थे, लेकिन जरा सी बात पर उन्होंने अपना फैसला बदल दिया था। दरअसल उस साल ग्वालियर के हम पांच पत्रकारों ने मजाक में विधानसभा चुनाव का पर्चा भरा था। मैं गिर्द विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी था। कांग्रेस के उम्मीदवार माधवराव सिंधिया के बाल सखा बालेंदु शुक्ल चुनाव लड रहे थे। बृजेन्द्र भाई साहब के पिताजी ने मुझे अपने घर बुलाया और पूरा चुनावी गणित समझाकर मैदान से हटने को कहा। उनका कहना था कि- इस क्षेत्र में शुक्ला और तिवारी में सीधी टक्कर होगी और यदि गलती से भी तुम 500 वोट भी ले गए तो बृजेन्द्र चुनाव हार जाएगा। मैने कहा हम तो मजाक में लड रहे हैं, बृजेन्द्र जी को लडने दीजिये, लेकिन वे नहीं माने और उन्होंने बृजेन्द्र जी को चुनाव मैदान से हटा लिया।
बृजेन्द्र तिवारी के साथ हमारे रिश्ते यहीं से अंकुरित हुए जो बाद में पारिवारिक रिश्तों में बदल गए। भाई साहब अपने आचरण और व्यवहार दोनों से समाजवादी थे। किसान थे, फक्कड़ थे, अक्खड थे। कोई उन्हे झुका नहीं सकता था।वे अपने पिता की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी बने लेकिन  शायद 1990  में वो भी भाजपा में शामिल होने के बाद। ये उनका आखरी चुनाव नहीं था, वे बार-बार लडे और हारे भी लेकिन झुके नहीं हाँ हताशा में उन्होंने भाजपा छोडी, कांग्रेस में गए लेकिन बात नहीं बनी। चुनाव मैदान में वे भले टिक ना पाऐ हों किंतु उनकी उपस्थित  हर प्रतिद्वंदी को आतंकित करती थी। वे किसान थे और किसानों के नेता भी। लंबी कद-काठी पर झूलता मोटी खादी का कुर्ता उन पर खूब फबता था। तिवारी जी पर विधायक की पेंशन के अलावा आय के साधन खेत ही थे। कोई कमी नहीं थी लेकिन वे शादी -ब्याह में कभी मोटा लिफाफा लेकर नहीं गए। जन्मदिन है तो 20 रुपए और शादी है तो 101 रुपए। दिखावे से दूर। घर पर भी और  बाहर भी। वे अपनी पीढ़ी के जुझारू छात्र नेता और बाद में राजनेता बने। जातिवाद से सदा बिदकते थे। यहाँ तक कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के भांजे अनूप मिश्रा जो उनके मित्र भी थे और सजातीय भी चुनाव मैदान में उन्हे पिघला नहीं सके। मेरे पास बृजेन्द्र तिवारी के साथ 42 साल के सत्संग के तमाम रोचक, अविश्वसनीय किस्से हैं। दो दिन पहले ही मैं भाजपा नेता जगदीश शर्मा से बृजेन्द्र तिवारी के स्वास्थ्य को लेकर चर्चा कर रहा था। विसंगति देखिए कि बडे जिगर वाले तिवारी जी को जिगर की असाध्य बीमारी ही निगल गई। बहुत याद आएंगे पंडित जी। उनके जैसे अब कम ही बचे हैं। मेरी उनके परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना और विनम्र श्रद्धांजलि। एक ही मलाल है कि जब तिवारी जी दुनिया छोड़कर गए तब मैं अमेरिका में बैठा हूँ उनके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सका।

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