
- सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त अपहारों पर सवाल उठाकर राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ाई
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले मुफ्त की रेवडिय़ां बांटने यानि फ्रीबीज पर कड़ी आपत्ति जाहिर की है। राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अगर वे इसी तरह मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली… जैसी सुविधाएं देते रहे, तो डेवलेपमेंट के लिए पैसे कहां से बचेगा? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कई सरकारें करोड़ों रुपये विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर सब्सिडी देने में खर्च कर रही हैं, जबकि वे बजट घाटे का सामना कर रही हैं और विकास एवं बुनियादी ढांचे के लिए धन की कमी की शिकायत कर रही हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अंधाधुंध मुफ्त सहायता, विशेष रूप से उन लोगों को जो उपयोगिताओं और सेवाओं के लिए भुगतान करने में सक्षम हैं, इससे एक ऐसी संस्कृति का जन्म हुआ है जो काम न करने को पुरस्कृत करती प्रतीत होती है। अगर मप्र की बात करें तो करीब 52 हजार करोड़ रुपये सालाना ऐसी योजनाओं पर खर्च होता है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं पर सवाल उठाकर राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। जिन राज्यों में नकद राशि बांटने वाली कई योजनाएं संचालित हो रही हैं, उन राज्यों की सरकारों की चिंता बढऩा स्वाभाविक है। दरअसल, मध्य प्रदेश सहित कई ऐसे राज्य हैं, जहां लाड़ली बहना जैसी रुपये बांटने वाली योजना का संचालन हो रहा है। बिहार में भी एनडीए को बहुमत दिलाने में महिलाओं को इसी तरह की योजना ने प्रभावित किया था। मप्र में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए लाड़ली बहना योजना के लिए 23 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी गई है, जो पूरे बजट का लगभग सात प्रतिशत है। इसके अलावा भी किसानों को सब्सिडी और लगभग दो करोड़ लोगों को मुफ्त राशन बांटा जा रहा है।
कई राज्यों में मुफ्त की योजनाएं
बता दें, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के मामले की सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। मुफ्त उपहारों और नकद हस्तांतरण योजनाओं को कोर्ट ने देश के आर्थिक विकास और कार्य संस्कृति के लिए हानिकारक बताया है। कोर्ट ने पूछा कि जो राज्य पहले से ही राजस्व घाटे में चल रहे हैं, वे मुफ्त बिजली और नकद योजनाओं का खर्च कैसे उठाएंगे? बता दें, कर्नाटक द्वारा इस तरह की नकद हस्तांतरण योजनाओं पर लगभग 28 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र में भी लगभग 46 हजार करोड़ रुपये का व्यय इस योजना पर हो रहा है। वहीं, मध्य प्रदेश भी इसमें पीछे नहीं है। भले ही लाड़ली बहना योजना सियासी तौर पर भाजपा सरकार के लिए फायदेमंद रही हो पर यह खजाने पर भारी पड़ रही है। आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ पीके शर्मा का कहना है कि चुनाव के पहले रेवड़ी बांटना बंद करना चाहिए। यह गलत परंपरा स्थापित हो रही है। इसके बजाय व्यक्ति की प्रोडक्टिविटी को बढ़ाना चाहिए। उसे काम देना चाहिए। मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली योजनाओं से काम करने की संस्कृति भी समाप्त हो रही है। हमारे देश में राज्यों का कर्ज सबसे उच्च स्तर पर है, जो खतरनाक है। इससे राज्य कंगाल हो चुके हैं। विकास के लिए राज्यों के पास धन नहीं बच रहा है। सारे राजनीतिक दलों को एक साथ बैठकर इस मुद्दे पर बात करनी चाहिए और इसका हल निकालना चाहिए।
मप्र में कई योजनाओं में नकद लाभ
लाड़ली बहना के अलावा भी यहां साइकिल, स्कूटी, लैपटॉप, राशन संबंधित कई योजनाओं में नकद लाभ दिया जा रहा है। इसी तरह 25 हजार करोड़ रुपये का भार विद्युत कंपनियों को मुफ्त और रियायती दर पर बिजली देने के एवज में अनुदान देने के कारण आ रहा है। स्कूटी, लैपटाप, साड़ी, जूते और कन्यादान जैसी योजनाएं भी सरकार के वित्त प्रबंधन को प्रभावित कर रही हैं। लाड़ली बहनों को सस्ता रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध कराया जा रहा है यानी जिस दर पर वह मिलता है, अंतर की राशि सरकार दे देती है। इसमें भी लगभग 800 करोड़ रुपये व्यय हो रहे हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो वर्ष में करीब 52 हजार करोड़ रुपये सालाना ऐसी योजनाओं पर खर्च किए जा रहे हैं। राज्य का बजट 4.38 लाख करोड़ रुपये है। जैसे-जैसे बजट का आकार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इन योजनाओं का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। विधानसभा चुनाव के समय तत्कालीन शिवराज सरकार ने लाड़ली बहना योजना लागू की थी। इसमें पहले लाड़ली बहनों को एक हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाते थे और फिर इसे बढ़ाकर 1,250 रुपये कर दिया और अब इसे बढ़ाकर 15 सौ रुपये कर दिए हैं। इस मामले में पूर्व वित्त मंत्री राघवजी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की चिंता सही है। सरकार को कैश ट्रांसफर वाली योजनाओं में संतुलन बनाना होगा। कर्ज का बोझ भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सरकार को आय के साधन बढ़ाने की जरूरत है और मितव्ययता भी बरतनी चाहिए। अन्यथा ब्याज और आर्थिक दबाव अर्थव्यवस्था के लिए बोझ बन जाएगा। कई राज्यों में यह स्थिति बन गई है।
