
- कैग की रिपोर्ट में खुली मप्र की स्कूल शिक्षा की पोल
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में एक तरफ सरकार सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों के बराबर खड़ा करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थिति यह है कि प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों के एक लाख से ज्यादा पद से खाली पड़े हुए हैं। प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की यह चिंताजनक स्थिति भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 1 हजार 895 स्कूल ऐसे है जिनमें विद्यार्थी तो हैं पर इन स्कूलों में एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं हैं। वहीं 435 स्कूल ऐसे हैं जिनमें एक भी छात्र छात्राओं का नामांकन नहीं है पर इनमें 128 शिक्षक पदस्थ है। रिपोर्ट में शिक्षकों की युक्तीयुक्तकरण में गंभीर खामियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सही तरीके से नियोजन न होने से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों की संख्या में भारी अंतर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूल शिक्षा विभाग के 66 हजार 814 स्कूलों में, अगस्त 2023 तक, में से 435 स्कूलों में विद्यार्थियों का नामांकन शून्य था। इनमें से 105 स्कूलों में एक वर्ष से, 38 स्कूलों में दो वर्षों से, 33 स्कूलों में तीन वर्षों से तथा 259 स्कूलों में पिछले चार सालों से कोई नामांकन नहीं है। इनमें से 320 स्कूलों में शिक्षकों के लिए कोई पद स्वीकृत नहीं है। इसके बाद भी इन 320 स्कूलों में अगस्त 2023 तक 128 शिक्षक पदस्थ थे।
292 स्कूलों को बंद करने की प्रक्रिया चल रही
रिपोर्ट में कहा गया है कि विभाग ने उत्तर दिया कि शून्य नामांकन वाले स्कूलों एवं बिना किसी शिक्षक वाले 292 स्कूलों को बंद करने की प्रक्रिया चल रही है एवं शेष 143 स्कूलों में पदस्थ शिक्षकों के तबादले की प्रक्रिया चल रही है। कैग ने कहा कि यह उत्तर स्वीकार्य योग्य नहीं है क्योंकि विभाग द्वारा अपने उत्तर के समर्थन में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि डीपीआई भोपाल के आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल 40 हजार 565 प्राइमरी एवं 19 हजार 131 मिडिल स्कूल संचालित थे। लेखा परीक्षण में पाया गया कि 6 हजार 878 प्राइमरी स्कूलों में छात्रों का नामांकन 20 से कम था, जिसमें 11 हजार 882 शिक्षक पदस्थ थे। इनमें से 374 स्कूल भी शामिल हैं जिनमें नामांकन शुन्य था, इनमें 174 शिक्षक पदस्थ थे। इसी तरह 76 मिडिल स्कूलों में दस से कम छात्रों का नामांकन था। इनमें 113 शिक्षक पदस्थ थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि अपर्याप्त नामांकन वाले 6 हजार 954 प्राइमरी एवं मिडिल स्कूलों में युक्तियुक्तकरण न किए जाने के कारण शासन पर 11 हजार 995 शिक्षकों का परिहार्य वित्तीय भार पड़ा। इन शिक्षकों को उनकी सेवाओं के सर्वोत्तम उपयोग हेतु अधिक नामांकन वाले स्कूलों में पदस्थ किया जा सकता था।
गांवों के स्कूलों की स्थिति चिंताजनक
कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश के बावजूद 66 हजार 814 स्कूलों से संबंधित आंकड़ों के विश्लेषण से पाया गया कि स्कूल शिक्षा विभाग के 6 हजार 607 स्कूलों में 35 हजार 663 की स्वीकृत संख्या के सापेक्ष 47 हजार 396 शिक्षक पदस्थ किए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप इन स्कूलों में 11 हजार 733 शिक्षकों का अधिशेष था। इसके विपरीत 29 हजार 116 अन्य स्कूलों में 2 लाख 13 हजार 416 पदों की स्वीकृत संख्या के सापेक्ष केवल 1 लाख 13 हजार 734 शिक्षक ही पदस्थ थे। जिससे इन स्कूलों में 99 हजार 682 शिक्षकों की कमी पाई गई। लेखा परीक्षा में आगे पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में 62 हजार 213 स्कूल थे जिनमें स्वीकृत पद 2 लाख 81 हजार 887 के सापेक्ष लाख 98 हजार 175 शिक्षक पदस्थ थे। इसी तरह 4 हजार 601 शहरी स्कूलों में स्वीकृत पद 47 हजार 556 कके सापेक्ष 43 हजार 319 शिक्षक पदस्थ थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी क्षेत्रों के स्कूलों में जहां 91 फीसदी से अधिक शिक्षकों की पदस्थापना थी वहीं गांवों में यह प्रतिशत महज 70 या।
