- कैचमेंट एरिया में बन रहे बंगले-रिसॉर्ट,बढ़ रहा कब्जा

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
झीलों की नगरी भोपाल का अहम जल स्रोत केरवा डैम गंभीर खतरे में है। डैम को भरने वाली केरवा नदी और आसपास के नालों पर लगातार हो रहे कब्जों ने इसके अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कैचमेंट एरिया में बंगले, फार्म हाउस और रिसॉर्ट खड़े हो चुके हैं, वहीं कई जगह अवैध प्लाटिंग धड़ल्ले से जारी है। सबसे गंभीर बात यह है कि इन निर्माणों में रसूखदार नेता और अधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। मेंडोरा-मेंडोरी से समसगढ़ तक किए गए जमीनी सर्वे में सामने आया कि नदी के दोनों किनारों पर पक्के निर्माण हो चुके हैं। कहीं पुलिया बनाकर जमीन बेची जा रही है तो कहीं जंगल से निकलने वाले नालों और केरवा नदी का प्राकृतिक बहाव ही मोड़ दिया गया है। हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में केरवा डैम का कैचमेंट एरिया पूरी तरह खत्म हो सकता है।
केरवा डैम के कैचमेंट में पिछले सालों में जमकर अवैध कब्जे हुए, कॉलोनियां काटी गईं। इसको लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पर्यावरणविदों ने याचिका तक लगाई, जहां से आदेश के बाद प्रशासन ने कुछ कार्रवाई तो की, लेकिन रसूखदार लोगों के कब्जे होने के कारण प्रशासन की कार्रवाई ठप हो गई। हाल ही में एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसमें केरवा डैम से लगी जमीन पर अवैध कालोनी काटी जा रही थी, जिस पर प्रशासन ने कार्रवाई तो की, लेकिन रसूखदार बिल्डर के दबाव के कारण यह कार्रवाई बीच में ही रोक दी गई। इसके बाद कोई भी जिम्मेदार अधिकारी इस पर सफाई देने को तैयार नहीं हुआ। बताया जाता है कि कालोनी केरवा डैम के कैचमेंट में ही काटी जा रही है। इससे कोलार की आबादी को मिलने वाला पेयजल प्रदूषित होगा और डैम का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा।
रसूखदारों के आगे सब पस्त
जानकारी के अनुसार केरवा डैम के कैचमेंट में भू-माफिया द्वारा अवैध निर्माण किए जा रहे हैं। इस क्षेत्र में सिर्फ कृषि व उद्यानिकी की अनुमति होने के बाद भी रसूखदार लोगों ने फार्म हाउस, बिल्डिंग, रिसोर्ट सहित अन्य अवैध कब्जे कर रखे हैं। इसके लिए केरवा डैम के कैचमेंट इलाके में अवैध मिट्टी, कोपरा व मुरम तक डाली गई है। इसको लेकर एनजीटी में पर्यावरणविदों ने याचिका लगाई थी। इस पर एनजीटी ने सख्त निर्देश देते हुए कहा था कि डैम के कैचमेंट इलाके की भूमि भले ही निजी हो, लेकिन यदि उस पर होने वाली गतिविधियां जलाशय, वेटलैंड और जलग्रहण क्षेत्र को नुकसान पहुंचाती हैं, तो उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जब प्रशासन व निगम अमले ने तीन दिन पहले संयुक्त रूप से कार्रवाई को अंजाम दिया तो रसूखदारों ने पहुंच का उपयोग कर कार्रवाई को बीच में ही रुकवा दिया। रसूखदार का दबदबा ऐसा रहा कि अधिकारियों ने कार्रवाई से दूरी बना ली और अब कैचमेंट इलाके में पसरे अतिक्रमण को तोडने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। पर्यावरणविद् रशीद नूर ने कहा कि केरवा डैम राजधानी की बड़ी आबादी को पीने का पानी देता है और यह क्षेत्र भोपाल के खूबसूरत जंगल व पर्यटन क्षेत्र से भी जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीछे के इलाके में नियमविरुद्ध तरीके से करोड़ों के बंगले बन गए हैं। सडक़ें नहीं हैं, लेकिन चार-चार करोड़ के मकान खड़े हैं। उन्होंने कहा कि मास्टर प्लान-2005 में जिस भूमि को बॉटनिकल गार्डन के लिए आरक्षित किया गया है, वहां बड़े निर्माण और अवैध कॉलोनियों का कारोबार शुरू हो चुका है। पंचायत से अनुमति लेकर मकान बनाए जा रहे हैं, जिनका सीवेज अंतत: डैम में जाएगा। रशीद नूर ने इसे पानी को जहरीला करने की बड़ी साजिश बताया और कहा कि जिस तरह बड़े तालाब और शाहपुरा झील में सीवेज मिला, वही हाल केरवा डैम का भी किया जा रहा है।
नियमों की आड़ में खुला खेल
मास्टर प्लान-2005 के अनुसार डैम और नदी के आसपास सीमित उपयोग की अनुमति है। लो-डेंसिटी क्षेत्र में 10 हजार वर्ग फीट जमीन पर सिर्फ 600 वर्ग फीट निर्माण की छूट है। लेकिन इसी नियम की आड़ में टीएंडसीपी और पंचायत से फार्म हाउस की अनुमति लेकर बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग और निर्माण किए जा रहे हैं, जो नियमों की भावना के खिलाफ है। जांच में सामने आया कि केरवा नदी से सटाकर पक्के मकान और बाउंड्री वॉल बन चुकी हैं। कुछ जगह फिल्म प्रोडक्शन हाउस और फार्म प्रोजेक्ट के नाम पर निर्माण हुआ है। नालों पर कब्जे से पानी का प्राकृतिक बहाव बाधित हो रहा है, जिससे डैम तक पानी पहुंचना मुश्किल होता जा रहा है। पर्यावरणविदों ने केरवा डैम को बचाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार नदी, डैम और तालाब से 50 मीटर के दायरे में निर्माण प्रतिबंधित है, लेकिन यहां खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह का कहना है कि एनजीटी के निर्देश पर केरवा डैम के कैचमेंट क्षेत्र में हर निर्माणों को चिह्नित किया गया है और बचे हुए निर्माणों को चिह्नित करने की कार्रवाई की जा रही है। सभी कब्जाधारियों को चेतावनी दी है कि वह सिर्फ निजी भूमि में कृषि व उद्यानिकी का कार्य ही करें। इसके अलावा यदि निर्माण किए जाते हैं तो उन्हें तोडने की कार्रवाई की जाएगी। एनजीटी के निर्देश पर तीन साल पहले प्रशासन ने केरवा और कलियासोत डैम का सीमांकन करवाते हुए सीमाएं चिह्नित करने की कार्रवाई की थी। इस दौरान केरवा डैम के केचमैट क्षेत्र में करीब 30 से अधिक अवैध निर्माण मिले थे, इनको हटाने बाकायदा लाल निशान तक लगाए गए थे। यह कार्रवाई मुश्किल से कुछ ही महीने तक चल पाई थी और बाद में पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया। नतीजा यह हुआ कि केरवा कैचमेंट में लोगों ने बड़े-बड़े निर्माण कर लिए हैं। एनजीटी ने राज्य वेटलैंड अधिकरण को निर्देश दिए हैं कि केरवा डैम के आसपास के प्रभाव क्षेत्र की पहचान और सीमांकन का कार्य दो महीने में पूरा करना होगा। अधिकरण ने साफ किया कि 33 मीटर के कैचमेंट क्षेत्र का उल्लंघन करने वाले भू-स्वामियों के खिलाफ कार्रवाई विधि सम्मत है और उन्हें अवैध मलबा हटाना ही होगा। इसी के बाद प्रशासन ने कार्रवाई की तो एक बड़े बिल्डर ने रसूख का उपयोग करते हुए इसे रुकवा दिया।
