
- परंपरागत प्रजातियों में होगा बदलाव
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। प्रदेश में पड़ोसी राज्य गुजरात की गिर नस्ल की गाय किसानों और पशुपालकों के लिए कामधेनु बनेंगी। इसके लिए एमपी में गोवंश के नस्ल सुधार के लिए सबसे बड़ा अभियान शुरू किया गया है। बता दें कि मध्यप्रदेश में गोवंश की ऐसी अभी कोई परंपरागत नस्ल नहीं है, जो दुग्ध उत्पादन और खेती दोनों के साथ मौसम की विपरीत परिस्थितियों जैसे तेज गर्मी. बारिश और सर्दी को झेल सके। ऐसे में अब एमपी में कृत्रिम गर्भाधान (एआई) के लिए पड़ोसी राज्य गुजरात की प्रजाति पर ही सबसे अधिक भरोसा किया जा रहा है। इसके अलावा परंपरागत रूप से पाकिस्तानी नस्ल साहीवाल जो अब हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में बड़ी संख्या में मिलती है की नस्ल को भी अपनाया जा रहा है।
1.51 लाख सोर्टेड सीमन के डोज लगाए: वित्त वर्ष (2025-26) के दौरान गोवंश की नस्ल सुधार के लिए पशुपालन विभाग दो मोर्चों पर काम कर रहा है। इसमें पहला सेक्सड सोटेंड तकनीक है। इससे प्रदेश के 1.51 लाख से अधिक पशुओं का गर्भाधान किया जा चुका है। पशुपालन विभाग के उप संचालक डॉ अनुपम अग्रवाल के अनुसार इस तकनीक का फायदा यह है कि इसमें बछिया पैदा होने की संभावना 90 प्रतिशत से भी अधिक होती है। इससे भविष्य में दूध उत्पादन में क्रांतिकारी बढ़ोतरी होना तय है।
देसी नस्लों में बीमारी का खतरा
मालवी, निमाड़ी, केनकाथा और गौलाओ देसी गोवंश के मुख्य ब्रीड हैं। इनमें से कुछ स्थानीय वातावरण में ढले हुए हैं लेकिन उनसे दुग्ध उत्पादन कम होता है। इसके अलावा इनमें रोग प्रतिरोधक क्षमताएं भी कम होती हैं। इसी कारण प्रदेश के पशुपालन विभाग ने गिर और साहीवाल नस्लों को बढ़ावा देने की मुहिम शुरू की है। सरकार ने हिरण्य गर्भा नाम के इस अभियान में वेटनरी के 8000 प्रशिक्षित स्टाफ और सहयोगियों को फील्ड में उतारा है, जो पशुपालकों और किसानों को देसी ब्रीड का कृत्रिम गर्भाधान गिर या साहीवाल की नस्ल से कराने की सलाह दे रहे हैं।
