- फूंक-फूंककर कदम रख रही एमपी सरकार

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर राज्य सरकार बेहद सावधानी बरत रही है। हाल के दिनों में सामने आए विवादित बयानों और कानूनी पेचीदगियों के बीच सरकार किसी भी सख्त कार्रवाई के बजाय बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में है। मामला चाहे कैबिनेट मंत्री विजय शाह का हो या अजाक्स अध्यक्ष संतोष वर्मा का, सरकार की धीमी कार्यप्रणाली के पीछे गहरे राजनीतिक मायने और आगामी बजट सत्र की रणनीतियां छिपी हुई हैं।
राजनीतिक नुकसान और 2018 का डर
सरकार की इस हिचकिचाहट के पीछे सबसे बड़ा कारण वोट बैंक का गणित है। भाजपा को डर है कि यदि इन प्रभावशाली चेहरों के विरुद्ध कोई बड़ा कदम उठाया गया, तो आदिवासी और दलित समाज में गलत संदेश जा सकता है। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी समाज का झुकाव कांग्रेस की ओर होने के कारण भाजपा को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। सत्ता और संगठन भली-भांति जानते हैं कि संतोष वर्मा और विजय शाह अपने-अपने समाज के बड़े चेहरे बन चुके हैं और उनके विरुद्ध कार्रवाई से राजनीतिक समीकरण बिगड़ सकते हैं। प्रदेश में सामान्य और आरक्षित वर्ग के बीच तनातनी का इतिहास पुराना है। जून 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के माई का लाल वाले बयान ने सामान्य और ओबीसी वर्ग को एकजुट कर दिया था, जिसका नुकसान पार्टी ने उठाया था। इसके बाद पदोन्नति में आरक्षण का मुद्दा भी 2016 से अनसुलझा है, जिससे दोनों ही पक्ष असंतुष्ट हैं। हाल ही में यूजीसी के समानता विनियम 2026 ने सवर्ण समाज को फिर से एकजुट कर दिया था, हालांकि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है।
बजट सत्र और डैमेज कंट्रोल की रणनीति
16 फरवरी से शुरू हो रहे विधानसभा के बजट सत्र से पहले सरकार विपक्ष को कोई मुद्दा नहीं देना चाहती। एक तरफ जहां सरकार एससी-एसटी वर्ग पर दर्ज मामलों का निराकरण एक माह में करने के निर्देश देकर उन्हें साधने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बीच समय की मांग कर राहत पाने का प्रयास किया जा रहा है। अब देखना यह होगा कि कोर्ट के दबाव और सामाजिक संतुलन के बीच सरकार खुद को कैसे सुरक्षित रख पाती है।
विवादित बयानों पर कार्रवाई की धीमी रफ्तार
विवादित बयानों पर कार्रवाई की धीमी रफ्तार एसटी वर्ग के बड़े नेता और मंत्री विजय शाह द्वारा कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई असभ्य टिप्पणी का मामला हो, या आइएएस अधिकारी संतोष वर्मा का ब्राह्मण बेटियों को लेकर दिया गया विवादास्पद बयान, शासन की कार्रवाई फिलहाल ठंडी पड़ती नजर आ रही है। विजय शाह के मामले में जहां सुप्रीम कोर्ट ने उनकी माफी को अस्वीकार कर दिया है, वहीं सरकार अब शीर्ष अदालत से और समय मांगने की तैयारी में है। दूसरी ओर, संतोष वर्मा के विरुद्ध चल रही जांच की गति को भी धीमा कर दिया गया है।
