
-395.93 हेक्टेयर वन भूमि नजूल घोषित
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र के एकमात्र हिल स्टेशन पचमढ़ी पर राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। पचमढ़ी शहर को अब अभयारण्य से बाहर कर दिया है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए राज्य सरकार पचमढ़ी के विकास पर जोर दे रही है। इसके लिए सरकार 395.93 हेक्टेयर जमीन वन विभाग से लेकर इसे नजूल भूमि घोषित करेगी जिससे इसे खरीदा या बेचा जा सकेगा। माना जा रहा है कि पचमढ़ी में अब विकास कार्यों को लेकर बड़ी तेजी देखने को मिलेगी।
दरअसल, गत दिनों कैबिनेट ने पंचमढ़ी नगर के साडा के नियंत्रण वाली नजूल भूमि को संशोधित करते हुए 395.93 हेक्टेयर क्षेत्र को पंचमढ़ी अभयारण्य से बाहर कर राजस्व नजूल घोषित करने की स्वीकृति दी। इस फैसले से पंचमढ़ी के शहरी क्षेत्र में विकास कार्यों का रास्ता साफ होगा। इससे पहले तकनीकी कारणों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के चलते यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही थी। जल्द ही इस संबंध में गजट नोटिफिकेशन जारी होगा। इसके बाद पचमढ़ी नगर की 395.939 हेक्टेयर जमीन विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) के स्वामित्व में आ जाएगी।
इस फैसले से करीब 49 साल बाद अब पचमढ़ी में विकास कार्यों में तेजी आएगी और यहां बने पुराने व जर्जर मकानों, होटलों व रिसॉट्र्स का रेनोवेशन/री-डेवलपामेंट किया जा सकेगा। अभी पचमढ़ी नगर अभयारण्य के दायरे में होने के कारण यहां व्यावसायिक गतिविधियां चलाने और नए निर्माण की अनुमति नहीं है। जून, 1977 में पचमढ़ी अभयारण्य को अधिसूचित किया गया था। गौरतलब है कि मप्र सरकार ने 1 जून, 1977 को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 18 (1) के तहत अभयारण्य को अधिसूचित किया था। उस समय अभयारण्य में शामिल और बाहर रखे जाने वाले क्षेत्रों की सीमाएंस्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं थीं। इसी कारण सरकार स्वयं वहां कोई विकास कार्य नहीं कर पाई थी।
अब होंगे कई तरह के विकास कार्य
पचमढ़ी नगर की भूमि अब साडा के स्वामित्व में होगी। सरकार का मानना है कि इस फैसले से क्षेत्र में विकास कार्यों में तेजी आएगी। पुराने व क्षतिग्रस्त मकानों, होटलों और रिसॉट्र्स को ध्वस्त करके उसी स्थान पर फिर से बनाया जा सकता है। पुराने होटलों और रिसॉट्र्स के रेनोवेशन/री-डेवलपामेट की अनुमति होगी। हालांकि कोई नया होटल नहीं बनाया जाएगा। होम स्टे को तय नियमों के तहत विकसित किया जा सकता है। सडक़ों, सीवरेज और पेयजल जैसी सुविधाओं पर काम किया जाएगा। सरकारी और पर्यटन संबंधी परियोजनाएं पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के माध्यम से लागू की जाएंगी।पचमढ़ी अभयारण्य सतपुड़ा पर्वतमाला में स्थित एक प्रसिद्ध संरक्षित क्षेत्र है, जो अपनी जैव विविधता, घने जंगलों, गुफाओं और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। इसे सतपुड़ा की रानी कहते हैं और यह यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त है। यह क्षेत्र बाघ, तेंदुआ, सांभर समेत कई दुर्लभ पक्षियों का घर है। यहां पांडव गुफाएं व धूपगढ़ जैसे प्राकृतिक व धार्मिक स्थल भी हैं।
पर्यावरणविद नाखुश, कोर्ट जाने की तैयारी
मप्र सरकार द्वारा पचमढ़ी अभयारण्य से 395.939 हेक्टेयर भूमि को राजस्व भूमि घोषित करने के फैसले से पर्यावरणविद नाखुश हैं और वे इस फैसले को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। वाइल्ड लाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे ने कहा कि सरकार के इस फैसले से सबसे बड़ा नुकसान पारिस्थितिकी तंत्र को होगा, जैसा शिमला या नैनीताल में हुआ है। मानवीय हस्तक्षेप बढऩे से भूजल स्तर प्रभावित होगा। ऐसे क्षेत्रों में अनुशासित प्रबंधन होता है। यह फैसला सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की सुरक्षा के लिए बनाए गए इको सेंसिटिव जोन के नियमों के भी प्रतिकूल होगा। उन्होंने कहा, मैं इस फैसले को अदालत में चुनौती दूंगा, क्योंकि पचमढ़ी सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के इको सेंसिटिव जोन में आता है। ऐसा लगता है कि यह निर्णय कुछ प्रभावशाली लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए लिया गया है। पर्यावरणविद् सुभाष सी. पांडे ने कहा कि भले ही पचमढ़ी अभयारण्य के एक किलोमीटर के दायरे को इको सेंसिटिव जोन माना जाए और अभयारण्य के आसपास का क्षेत्र सख्त नियमों के अधीन रहे, फिर भी इस फैसले का असर नगर और वन्य प्राणियों पर पड़ेगा। पचमढ़ी में जनसंख्या का बोझ बढ़ेगा। नए निर्माण और वाहनों की आवाजाही जैसी गतिविधियों में वृद्धि के कारण नगर में वायु प्रदूषण बढ़ेगा। नगर में तेज संगीत बजने से जंगल में वन्य प्राणी परेशान होंगे। उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर इस फैसले का शहर के प्राकृतिक स्वास्थ्य और अभयारण्य के वन्य प्राणियों पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों तरह से प्रभाव पडेगा।
