
- आंतरिक लड़ाइयों में उलझी मप्र कांग्रेस
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। एक तरफ कांग्रेस मप्र में सत्ता की वापसी की कोशिश में लगी हुई है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के नेता आंतरिक लड़ाइयों में उलझे हुए हैं। आलम यह है कि मप्र कांग्रेस इस वक्त अव्यवस्था, अहंकार और असफल नेतृत्व की गंभीर स्थिति से गुजर रही है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि आलाकमान की बैठकों में भी बड़े नेता शामिल नहीं हो रहे हैं। प्रदेश में कांग्रेस को और प्रभावी बनाने के लिए दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल ने प्रदेश के चुनिंदा पदाधिकारियों के साथ बैठक की। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया, डा. विक्रांत भूरिया सहित अन्य वरिष्ठ नेता अनुपस्थित रहे।
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस में गुटबाजी इस स्तर तक पहुंच चुकी है कि नेतृत्व का कोई भी निर्णय सर्वमान्य नहीं रह गया है। विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय पार्टी अपनी ही आंतरिक लड़ाइयों में उलझी नजर आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जहां नेतृत्व अहंकार से ग्रस्त हो, संगठन अनुशासनहीन हो और कार्यकर्ताओं में भ्रम हो- वहां रचनात्मक राजनीति संभव नहीं होती। ऐसे हालात में विपक्ष कमजोर होता है और लोकतांत्रिक संतुलन भी प्रभावित होता है। आज की स्थिति में मप्र कांग्रेस एक सशक्त विपक्ष के रूप में नहीं, बल्कि आंतरिक कलह और नेतृत्व संघर्ष के केंद्र के रूप में देखी जा रही है। अनुशासन समिति के अध्यक्ष भी यह मुद्दा उठा चुके हैं। दरअसल, पार्टी में कई नेता उपेक्षित हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव के पास प्रदेश के भीतर कोई काम नहीं है। उन्हें संगठन सृजन के लिए अन्य प्रांतों में पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जा रहा है। यही कारण है कि पूर्व नेता प्रतिपक्ष विधानसभा अजय सिंह हों या फिर डा. गोविंद सिंह, कांतिलाल भूरिया या फिर अन्य नेता, अपने-अपने क्षेत्र तक सीमित हो गए हैं।
बड़े नेताओं की अनुपस्थिति पर उठे सवाल
दिल्ली बैठक में बड़े नेताओं की उनुपस्थिति को लेकर मीडिया ने जब प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी से सवाल किए तो वह असहज हुए और झल्लाते हुए बोले कि किसे बुलाना है और किसे नहीं, यह हमारा आंतरिक मामला है। इस पर प्रदेश भाजपा ने तंज कसते हुए कहा है कि कमल नाथ बाहर, दिग्विजय सिंह पर्दे के पीछे भीतर, यही कांग्रेस की हकीकत है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि दिल्ली की बैठक के लिए केवल प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कार्यसमिति के सदस्य कमलेश्वर पटेल को बुलाया गया था। इसमें मुख्य रूप से संगठन सृजन अभियान और आगामी विधानसभा सत्र में पार्टी की भूमिका पर बात होनी थी, इसलिए केवल उससे जुड़े व्यक्तियों को बुलाया गया। दिग्विजय सिंह चूंकि प्रदेश में कांग्रेस के लिए आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करके संगठन को दे चुके हैं, इसलिए उन्हें और कार्यसमिति का सदस्य होने के कारण कमलेश्वर पटेल को बुलाया गया। पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ विदेश में हैं तो बाकी अपेक्षित नहीं थे। वरिष्ठ नेताओं की अनुपस्थिति को लेकर पूछे प्रश्न पर हरीश चौधरी ने जिस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त की, उसे लेकर भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने सवाल उठाते हुए कहा कि मीडिया के प्रश्न पर प्रदेश प्रभारी का तानाशाही भरा जवाब- यह पूछने का अधिकार आपको नहीं है… रहा। इसका आशय स्पष्ट है कि कांग्रेस सवालों से डरती है। उसे मीडिया की जवाबदेही स्वीकार नहीं। तो क्या इसे आंतरिक लोकतंत्र कहा जाए? कांग्रेस में लोकतंत्र केवल भाषणों तक सीमित है।
भाजपा ने ली चुटकी
वहीं भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल ने लिखा है कि मप्र कांग्रेस अव्यवस्था, अहंकार और असफल नेतृत्व की मिसाल! जब प्रदेश प्रभारी और नेता प्रतिपक्ष को ही दिल्ली जाकर अपनी पार्टी की अनुशासनहीनता गिनानी पड़े- तो समझिए नेतृत्व फेल है। जब अपने ही नेता प्रदेश अध्यक्ष की क्षमता पर सवाल उठाएं- तो समझिए संगठन खोखला है। और जहां न विश्वास है, न दिशा, न जवाबदेही- वहां राजनीति नहीं, सिर्फ अराजकता बचती है। मप्र कांग्रेस आज विपक्ष नहीं, आंतरिक कलह का संग्रहालय बन चुकी है। पार्टी के भीतर हालात तब और चिंताजनक हो गए, जब कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष की कार्यक्षमता और नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। इससे साफ है कि संगठन में न तो आपसी भरोसा बचा है और न ही स्पष्ट दिशा या जवाबदेही।
