वीबी-जी राम जी से धूलेगा मनरेगा का दाग

मनरेगा
  • मोदी सरकार के नये कानून से उम्मीद

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 2005 में लागू हुई, जो भारत की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के रूप में लोकप्रिय हुई। पर जल्द ही यह योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। इसलिए मोदी सरकार मनरेगा की जगह नया कानून वीबी-जी रामजी लाने जा रही है। सरकार का दावा है कि इसमें भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।

विनोद कुमार उपाध्याय/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
केंद्र सरकार ने भले ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का नाम बदलकर विकसित भारत-जी राम जी (वीबी-जी राम-जी) कर दिया हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी भ्रष्टाचार के पुराने दलदल में धंसी हुई है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की ऑडिट रिपोर्ट में मप्र सहित देश के कई राज्यों से सामने आए आंकड़ों ने मनरेगा के उस कमजोर और खामियों से भरे सिस्टम को उजागर किया है, जहां मुर्दे मजदूरी कर रहे हैं, तालाब सिर्फ फाइलों में खोदे जा रहे हैं और बिचौलिये मजदूरों के पसीने की कमाई पर दावत उड़ा रहे हैं। यह स्थिति तब है जब 2014 के बाद सिस्टम को बेहतर बनाने की कोशिशें की गईं। 2016 में मनरेगा के तहत बनाए गए एसेट्स की जियो-टैगिंग को जरूरी कर दिया गया। कामों की तस्वीरें और जीपीएस लोकेशन सिस्टम में अपलोड की जाने लगीं। मजदूरों की पहचान को मजबूत करने के लिए आधार सीडिंग पर जोर दिया गया। आज 12 करोड़ से ज़्यादा एक्टिव मजदूरों के आधार नंबर मनरेगा से जुड़े हुए हैं। अब पेमेंट सीधे बैंक खातों में आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए किए जाते हैं। ई-पेमेंट का हिस्सा, जो पहले 37 प्रतिशत था, अब 100 प्रतिशत हो गया है। मप्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड से सामने आई तस्वीरें बताती हैं कि योजना का असली लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा। इस योजना को लेकर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि मनरेगा का नाम बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के कारण बदला गया। उन्होंने मजदूरों की जगह मशीनों का इस्तेमाल, मजदूरों की जगह ठेकेदारों का इस्तेमाल, बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए अनुमान, एक ही काम को बार-बार करना और नकली जॉब कार्ड जैसी गड़बडिय़ों का जिक्रकिया और कहा कि मनरेगा के तहत करप्शन खत्म कर दिया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि केंद्र ने नाम बदलकर जी राम जी तो कर दिया, लेकिन क्या सिर्फ नाम बदलने से लूट का यह पुराना खेल रुक पाएगा? ऑडिट ने भी मनरेगा में भारी अनियमितताओं को चिन्हित किया था। रिपोर्ट के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के मात्र 8 महीनों (अप्रैल 2025 से नवंबर 2025) में 302 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी पाई गई थी। इसके बाद भी पांच राज्यों में की गई पड़ताल में चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है।

मुर्दों के नाम पर हो रही पेमेंट
मप्र के झाबुआ जिले में मनरेगा से जुड़ा भ्रष्टाचार वर्ष 2020 से अब तक जांच के घेरे में बना हुआ है। आरोप हैं कि मृत व्यक्तियों के नाम पर फर्जी भुगतान किए गए, वहीं कई ऐसे लोगों को मजदूरी दी गई, जिन्होंने कभी मनरेगा के तहत काम ही नहीं किया। बार-बार शिकायतों के बावजूद जब स्थानीय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया। इंदौर खंडपीठ ने गंभीरता दिखाते हुए प्रकरण की जांच लोकायुक्त पुलिस को सौंपने के आदेश दिए। एक शिकायतकर्ता ने जांच के दौरान अपने पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें दर्शाया गया कि उनके पिता की मृत्यु वर्ष 2017 में हो चुकी थी, जबकि मनरेगा रिकॉर्ड में उनके नाम पर 2020 में भुगतान दिखाया गया। ऐसे ही आरोप जिले के चार विकासखंडों से सामने आए हैं, जिससे पूरे जिले में मनरेगा की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच के नतीजों का अब इंतजार किया जा रहा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इस कथित घोटाले के लिए जिम्मेदार कौन हैं और आगे क्या कार्रवाई होती है। वहीं छिंदवाड़ा में मनरेगा में इंसान नहीं बल्कि मुर्दे काम करते हैं। सरोरा ग्राम पंचायत के परसु टेकनकर की जनवरी 2025 में मौत हो चुकी है, लेकिन उसके बाद भी मनरेगा योजना में वह मजदूरी कर रहे हैं। यह जानकारी जब उनके परिजनों को लगी, तो उन्होंने इसकी शिकायत की है। छिंदवाड़ा के मोहखेड विकासखंड की ग्राम पंचायत सरोरा और उसके गांव गाडरवारा में मनरेगा में ऐसे मजदूर भी काम कर रहे हैं, जिनकी मौत एक साल से लेकर 3 साल के पहले हो चुकी है। यह पांच लोग हैं, जो अब जिंदा नहीं हैं, लेकिन उनके नाम से आज भी मनरेगा के तहत काम करवाकर मजदूरी दी जा रही है। शिकायत करने वाले ग्रामीण कार्तिक टेकनकर ने बताया कि 18 मजदूरों को बिना काम 261 दिनों की 2 लाख 96 हजार 496 रुपए की मजदूरी बांट दी गई। फिर सामने आया कि तीन मंजिला मकानों में रहने वाले अमीरों को मजदूर बनाकर भुगतान किया गया। अब मृत लोगों को कागजों में जिंदा कर मनरेगा का काम कराया जा रहा है। परसु टेकनकर की जनवरी 2025 में मौत हो चुकी है, जो कार्तिक गुर्जर के घर की बगल में रहते थे। उनकी बहू संगीता टेकनकर ने बताया कि उनके ससुर एक साल पहले मर चुके हैं। हालांकि वह कैमरे के सामने नहीं आ सकी। इसके अलावा चार लोग ऐसे हैं। जिनकी मौत दो या तीन साल पहले हो चुकी है। आरोप है कि उनके नाम से मनरेगा में मजदूरी निकाली जा रही है। मनरेगा योजना अब जीराम-जी योजना हो गई है, लेकिन यदि मनरेगा के कामों और मजदूरों की बारीकी से जांच की जाए, तो कई पंचायतों में ऐसा ही फर्जीवाड़ा सामने आ सकता है। ग्रामीणों का दावा है कि सरोरा पंचायत में 663 मनरेगा मजदूरों के नाम दर्ज है। इसमें अधिकतर जॉब कार्ड धारक गांव में निवास नहीं करते हैं। इसके बावजूद इनके खातों में मजदूरी का भुगतान किया जा रहा है।

मुरैना जिले में एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जहां मृतक लोगों के नाम मजदूरी में चढ़ाकर पैसे निकाले जा रहे थे, इतना ही नहीं नाबालिग बच्चों के नाम भी मजदूरी में चढ़ाकर पैसा निकाला जा रहा है। यह घोटाला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी साबित कर रहा है, यहां भ्रष्टाचार किस लेवल पर है। यही वजह है मुरैना जिले में कहा जा रहा है कि यहां तो भूतिया रोजगार भी मिल रहा है। इस घोटाले में सरपंच और सचिव की मिलीभगत सामने आ रही है। मुरैना जिले के पोरसा जनपद में आने वाली डोंडरी पंचायत के सरकारी रिकॉर्ड में कई मृतक मजदूरों को मनरेगा में काम करते हुए दिखाया गया है, इतना ही नहीं, नाबालिग बच्चे भी मजदूरी करते हुए कागजों में दर्ज कर दिए गए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सरपंच और सचिव ने भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं पार कर भूत-प्रेतों से लेकर मासूम बच्चों तक सभी को कागजों में मजदूर बना दिया है। यहां मनरेगा का पैसा सीधे मृतकों के खातों में डाला गया है। जबकि रकारी रिकॉर्ड में दर्ज कई मजदूर अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वे आज भी काम कर रहे हैं और मनरेगा की तरफ से उन्हें मजदूरी भी मिल रही है। वहीं इस भ्रष्टाचार की जब ग्रामीण शिकायत करते हैं तो जिम्मेदार अधिकारी महज़ औपचारिक कार्रवाई कर मामला दबा देते हैं। यही कारण है कि वे पंचायतों में इस तरह का भूतिया रोजगार बेरोकटोक चलता जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस खुलासे के बाद कोई सख्त कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह कागजों में दबा दिया जाएगा? वहीं मुरैना जिले का यह मामला फिलहाल चर्चा में बना हुआ है, क्योंकि भले ही यह घोटाला एक गांव में हुआ है, लेकिन जिस तरह से मृतक लोगों के नाम पर मजदूरी का पैसा निकाला जा रहा है। वह एक बड़े घोटाले को उजागर कर रहा है। फिलहाल इस मामले में जांच कराने की बात कही गई है।

आठ महीनों में 302 करोड़ की गड़बड़ी
गौरतलब है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की ऑडिट रिपोर्ट में अप्रैल 2025 से नवंबर 2025 के बीच 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 55 जिलों में 11.14 लाख मामलों में अनियमितताएं सामने आईं। जांच में 302.45 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी सामने आई, जिसमें से करीब 293 करोड़ रुपये की वसूली का दावा किया गया है। जिन प्रदेशों में ये गड़बड़ी सामने आई उनमें तमिलनाडु (10 जिले), आंध्र प्रदेश (4), केरल (6), पंजाब (5), उत्तर प्रदेश (2), हरियाणा, उत्तराखंड, गुजरात, जम्मू और कश्मीर, छत्तीसगढ़ और बिहार (हर राज्य का एक जिला) शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कई जगह काम जमीन पर हुआ ही नहीं, लेकिन भुगतान पूरा कर दिया गया। जांच में सामने आया कि कई राज्यों में रोक के बावजूद ठेकेदारों से काम कराया गया। बड़े कामों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया गया ताकि निचले स्तर पर मंजूरी मिल सके। कई जगहों पर 80 साल से ज़्यादा उम्र के मजदूरों को मनरेगा के तहत काम करते हुए दिखाया गया। कई मामलों में एक ही वेंडर से बार-बार सामान खरीदा गया या एक ही टेंडर के खिलाफ पेमेंट किया गया। कुछ फाइलों में रॉयल्टी पेमेंट और जीएसटी से जुड़े दस्तावेज गायब थे।

यूपी-बिहार में कागजों में काम
यूपी-बिहार में भी ऐसे मामले सामने आए हैं जहां कागजों पर काम हो रहा है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में मनरेगा योजना में बड़ी अंधेरगर्दी का मामला सामने आया है। सिसवा ब्लॉक के शिकारपुर गांव में मनरेगा कार्यस्थल पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, टिंकू श्रीवास्तव के खेत से नाले तक मिट्टी भराई और उसी नाले की सफाई के काम में 13 मस्टर रोल के तहत 100 से अधिक मजदूरों को काम करते हुए दिखाया गया था। जबकि जांच में कार्यस्थल पर एक भी मजदूर मौजूद नहीं मिला। इतना ही नहीं, वहां ऐसे कोई निशान भी नहीं दिखे जिससे यह पता चल सके कि उस दिन वहां कोई काम किया गया है। इस बारे में सवाल किए जाने पर ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि रामदयाल ने दावा किया कि काम हुआ था, लेकिन त्योहार होने की वजह से मजदूर जल्दी चले गए। हालांकि यह दलील कई सवाल खड़े करती है। यदि त्योहार के चलते मजदूर काम पर नहीं थे, तो फिर उसी दिन काम दर्ज क्यों किया गया? उन्होंने यह भी कहा कि करीब 50 मजदूरों ने काम किया था, लेकिन मस्टर रोल से जुड़ी जानकारी होने से इनकार कर दिया। वहीं रिकॉर्ड में दर्ज एक मजदूर संतराज ने बताया कि काम तो हुआ था, लेकिन वह यह स्पष्ट नहीं कर सका कि वास्तव में कितने मजदूर वहां काम कर रहे थे। इस गंभीर मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मनरेगा के जिला समन्वयक गौरवेंद्र सिंह ने कहा कि कागजों पर काम दिखने और मौके पर मजदूर गायब होने की जानकारी मिली है। इस पूरे प्रकरण की गहन जांच कराई जाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल, लोकायुक्त पुलिस भी इस मामले की जांच कर रही है और जल्द ही बड़ी कार्रवाई की उम्मीद है। वहीं बिहार के भागलपुर जिले के जगदीशपुर प्रखंड की सैनो पंचायत में मनरेगा के तहत करीब 20 करोड़ रुपये के बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। आरोप है कि जमीन पर कोई काम नहीं हुआ, लेकिन कागजों में योजनाएं दिखाकर सरकारी धन की निकासी कर ली गई। ग्रामीणों के मुताबिक, न तो सिंचाई के लिए बनाए जाने वाले नाले पर कोई काम हुआ, न ही तालाबों का जीर्णोद्धार किया गया और न ही खेतों का समतलीकरण हुआ। गांव में केवल योजनाओं के सूचनात्मक बोर्ड लगाए गए, जबकि वास्तविक काम नदारद रहा। जांच के बाद जिला विकास आयुक्त ने पंचायत रोजगार सेवक को पद से हटा दिया है। जांच में यह भी सामने आया कि फर्जी वेंडरों के ज़रिये सरकारी धन की हेराफेरी की गई। आरोपित अधिकारी पर 13 अलग-अलग स्थानों पर जमीन खरीदने का आरोप है, जिनमें माता-पिता, पत्नी और नाबालिग बेटों के नाम पर संपत्तियां शामिल हैं, जिनकी अनुमानित कीमत 59 लाख रुपये से अधिक बताई जा रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार, ‘निशांत ट्रेडर्स’ नामक एक वेंडर से निकाली गई राशि आरोपित अधिकारी और उसकी पत्नी के संयुक्त खाते में जमा कराई गई। फिलहाल उसका अनुबंध समाप्त कर दिया गया है, हालांकि उसे 30 दिनों के भीतर अपील करने का अधिकार दिया गया है। इसी तरह बिहार के ही मुंगेर जिले के असरगंज प्रखंड की चौरगांव पंचायत में भी मनरेगा के तहत गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। किसानों का कहना है कि नहर खुदाई के नाम पर तीन बार राशि निकाली गई, लेकिन जमीन पर कोई काम नहीं हुआ। ग्रामीणों के मुताबिक, अचानक बांध से पानी छोड़े जाने के कारण खेत जलमग्न हो गए, जिससे गेहूं, मक्का सहित कई फसलें बर्बाद हो गईं। किसानों का आरोप है कि बीते 10 वर्षों से नहरों की सफाई नहीं हुई, जबकि मनरेगा के तहत इस मद में करोड़ों रुपये खर्च दिखाए गए। इस मामले पर उपमंडलीय अधिकारी ने कहा है कि पूरे प्रकरण की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। नुकसान का आकलन कर किसानों को मुआवजा दिया जाएगा और यदि अनियमितताएं पाई जाती हैं तो संबंधित अधिकारियों व कर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

झारखंड-छत्तीसगढ़ में बिचौलिए मालामाल
रिपोर्ट में झारखंड और छत्तीसगढ़ में मनरेगा के तहत हुए फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। झारखंड के साहिबगंज जिले के बरहरवा प्रखंड स्थित मिर्जापुर पंचायत में मनरेगा के तहत चलाई जा रही बकरी शेड निर्माण योजना में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि योजना का लाभ दिलाने के नाम पर बिचौलियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया है। ग्रामीणों के आरोपों के मुताबिक, लाभार्थियों से प्रति व्यक्ति 3,000 रुपये की अवैध वसूली की गई। कई मामलों में योजना किसी और के नाम से स्वीकृत कर दी गई, जबकि वास्तविक लाभार्थी को अधूरा निर्माण ही मिला। आरोप है कि शेड का निर्माण पूरा किए बिना ही पूरी राशि निकाल ली गई। लाभार्थियों ने यह भी बताया कि भुगतान सुनिश्चित कराने के लिए दूसरे लोगों के नाम के बोर्ड लगाकर फोटो खींची गईं, जिन्हें दस्तावेज के तौर पर अपलोड कर दिया गया। इससे कागजों में काम पूरा दिखा दिया गया, जबकि ज़मीन पर हकीकत कुछ और थी। मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए साहिबगंज के उप विकास आयुक्त (डीडीसी) ने कहा कि यह प्रकरण प्रशासन के संज्ञान में आया है और इसकी जांच शुरू कर दी गई है। जांच के बाद दोषियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। वहीं छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले की पसौरी पंचायत में मनरेगा की जमीनी हकीकत चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है। ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास जॉब कार्ड तो हैं, लेकिन पिछले दो वर्षों से कोई काम नहीं मिला। सरकार द्वारा गारंटीड रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 किए जाने के बावजूद दर्जनों जॉब कार्डधारकों को न तो रोजगार दिया गया और न ही बेरोजगारी भत्ता मिला। ग्रामीणों के अनुसार, काम की मांग को लेकर पंचायत कार्यालय के कई चक्कर लगाए गए, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। महिलाओं और बुजुर्गों ने बताया कि रोजगार न मिलने से रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है। बच्चों की पढ़ाई, इलाज और घरेलू खर्चों पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
ऑडिट रिपोर्ट में 1,000 से ज़्यादा वर्क साइट्स का इंस्पेक्शन किया गया। 11,14,627 मामलों में अनियमितताएं पाई गईं, जिनमें खर्च दिखाए जाने के बावजूद ज़मीन पर काम का न होना, गैर-अनुमति वाले कामों को करना, वित्तीय अनियमितताएं और फंड का दुरुपयोग, मंजूरी पाने के लिए कामों को जानबूझकर छोटे-छोटे हिस्सों में बांटना और साफ मनाही के बावजूद ठेकेदारों और थर्ड पार्टियों को काम देना शामिल है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें अधिकारी, ठेकेदार और यहां तक कि बैंक मैनेजर भी शामिल थे। कई मामलों में, काम सिर्फ कागजों पर था, ज़मीन पर नहीं। सबसे ज्यादा मामले आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में पाए गए। गवर्नेंस और मॉनिटरिंग में भी गंभीर कमियां पाई गईं। नकली और इनएक्टिव जॉब कार्ड, बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए मस्टर रोल, अधूरे और खराब क्वालिटी के काम और स्थानीय जरूरतों के हिसाब से न बनाए गए एसेट्स को बार-बार दिखाया गया। मिनिस्ट्री की जांच में यह भी पता चला कि शुरुआती सालों में मनरेगा के तहत मॉनिटरिंग और रिकॉर्ड-कीपिंग बहुत कमज़ोर थी। कई जगहों पर करोड़ों के काम सिर्फ कागजों पर दिखाए गए थे, लेकिन जमीन पर कोई सडक़, तालाब या बांध नहीं थे। कोई फोटो नहीं थे, कोई जियो-लोकेशन नहीं था और कोई सही रिकॉर्ड नहीं था। कई मामलों में, एक ही व्यक्ति के नाम पर कई जॉब कार्ड जारी किए गए थे। मरे हुए लोगों के नाम पर भी पेमेंट किया गया था। असली मजदूरों तक पैसे पहुंचने के बजाय सिस्टम में फैले बिचौलियों ने पैसे हड़प लिए। जनवरी 2014 तक, मनरेगा रिकॉर्ड के साथ सिर्फ 76 लाख मजदूरों के आधार नंबर लिंक थे, जबकि इस स्कीम के तहत करोड़ों लोग रजिस्टर्ड थे। पंचायत लेवल पर रिकॉर्ड मैनेजमेंट बहुत खराब पाया गया। फील्ड स्टाफ को 22 से 29 अलग-अलग रजिस्टर रखने पड़ते थे, जिससे गलतियां, हेरफेर और दुरुपयोग होना तय था। इस गड़बड़ी की वजह से फर्जी मस्टर रोल और गलत पेमेंट हुए।

जी राम जी आशा की किरण
मनरेगा में हो रहे भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए केंद्र सरकार 20 साल पुराने मनरेगा कानून को बदलकर एक नई योजना लेकर आई है, जिसका नाम है विकसित भारत-जी राम जी। सरकारी अधिकारियों ने साफ किया है कि जिन मजदूरों के पास मनरेगा का जॉब कार्ड है वे नए ग्रामीण रोजगार कानून विकसित भारत जी राम जी के तहत भी काम मांग सकेंगे। यानी आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। पुराने मनरेगा जॉब कार्ड का इस्तेमाल आप नई जी राम जी योजना में काम पाने के लिए भी कर सकेंगे। मनरेगा से नई योजना में जाते समय मजदूरों को किसी तरह की परेशानी नहीं होगी और रोजगार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार चाहती है कि जब पुरानी स्कीम से नई स्कीम में बदलाव हो, तो मजदूरों को काम मिलने में कोई दिक्कत न आए और सब कुछ आसानी से चलता रहे। विकसित भारत जी राम जी योजना को मनरेगा का नया और मजबूत रूप माना जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, जी राम जी योजना अगले वित्तीय वर्ष से लागू की जाएगी। केंद्र सरकार नियम बनाएगी और उन्हें जारी करेगी। इसके बाद राज्यों को इस योजना में शामिल होने और अपनी योजना तैयार करने के लिए छह महीने का समय मिलेगा। हालांकि इसे लागू करने की सही तारीख अभी तय नहीं की गई है। सरकार का कहना है कि मनरेगा से जी राम जी योजना में बदलाव धीरे और आसानी से किया जाएगा। इसी वजह से पुराने मनरेगा जॉब कार्ड को ही नई योजना में काम मांगने के लिए मान्य रखा जाएगा। इससे मजदूरों को नया कार्ड बनवाने या दोबारा पंजीकरण की जरूरत नहीं पड़ेगी।
नई योजना में सबसे बड़ा बदलाव रोजगार के दिनों को लेकर किया गया है। पहले मनरेगा में साल में 100 दिन का काम मिलता था लेकिन जी राम जी योजना में इसे बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। यानी अब गांव के मजदूरों के पास ज्यादा कमाई करने का मौका होगा। नई योजना में मजदूरी का भुगतान हर हफ्ते करने का प्रावधान है। अब मजदूरों को उनके काम का पेमेंट हर हफ्ते किया जाएगा। अगर किसी वजह से पैसे मिलने में देरी होती है तो मजदूर को मुआवजा देना भी जरूरी होगा। इसके अलावा सरकार ने इस नई योजना को काफी सख्त बनाया है ताकि मजदूरों का हक न मारा जाए। नए कानून के तहत अगर कोई मजदूर रोजगार मांगता है और उसे काम नहीं मिलता है, तो उसे बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा।अब यह भत्ता पाना मजदूर का कानूनी अधिकार होगा। जी राम जी योजना का फोकस सिर्फ काम देने तक सीमित नहीं है। इसके तहत गांवों में पानी से जुड़े काम सडक़ तालाब खेत और आजीविका से जुड़े काम कराए जाएंगे। इससे गांव की व्यवस्था मजबूत होगी और किसानों -मजदूरों को लंबे समय तक फायदा मिलेगा। जी राम जी एक्ट को मनरेगा से बहुत बेहतर बताया जा रहा है। सरकार का साफ कहना है कि मनरेगा को खत्म नहीं किया जा रहा बल्कि उसे नए और बेहतर रूप में बदला जा रहा है। जी राम जी एक्ट को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत आधार माना जा रहा है जो रोजगार सुरक्षा के साथ गांवों को आगे बढ़ाने का काम करेगा।

गांव के लोगों के लिए बड़ी राहत
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि गांव के मजदूरों को रोजगार की गारंटी पहले से ज्यादा मजबूत मिलेगी। पुराने जॉब कार्ड चलते रहेंगे ज्यादा दिन काम मिलेगा और समय पर पैसा मिलने की व्यवस्था भी होगी। ऐसे में जी राम जी योजना को गांव और गरीब के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। यदि काम मांगने के 15 दिनों के भीतर रोजगार नहीं मिलता, तो मजदूर बेरोजगारी भत्ते का हकदार होगा। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता नई योजना विकसित भारत-रोजगार आजीविका मिशन के बारे में गलत जानकारी फैला रहे हैं। चौहान ने जोर देकर कहा कि नया कानून काम के अधिकार को पहले से ज्यादा मजबूत करेगा। शिवराज ने कहा कि विपक्ष यह झूठ फैला रहा है कि नई योजना में रोजगार केवल कुछ पंचायतों में ही मिलेगा। उन्होंने साफ किया कि यह योजना देश की सभी पंचायतों में लागू होगी। चौहान ने कहा कि यह बयान कि काम का अधिकार छीना जा रहा है एक झूठ है। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि राहुल गांधी और खडग़े गलत जानकारी देकर अपनी ही पार्टी को कमजोर कर रहे हैं। हमने काम के अधिकार को कागज से उतारकर जमीन पर मजबूत किया है। उन्होंने बताया कि अब 100 दिनों के बजाय 125 दिन का काम दिया जाएगा। साथ ही, 15 दिनों के भीतर बेरोजगारी भत्ता देने का नियम भी बनाया गया है। मंत्री ने तुलना करते हुए कहा कि यूपीए सरकार ने मनरेगा पर करीब दो लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे, जबकि मौजूदा सरकार ने नौ लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं। उन्होंने बताया कि नई योजना छह महीने में लागू हो जाएगी और तब तक मनरेगा जारी रहेगी। उन्होंने कहा राज्यों पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। केंद्र पहले से ही ज्यादा पैसे दे रहा है। राज्य जो निवेश करेंगे, वह गांवों में इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए होगा।

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