- सत्ता और संगठन को सुप्रीम कोर्ट के रुख का इंतजार

गौरव चौहान
कर्नल सोफिया कुरैशी वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख को देखते हुए भाजपा और सरकार के सामने खड़ी हुई समस्या। बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद मंत्री विजय शाह पर एक्शन लिया जा सकता है। मप्र सरकार और भाजपा संगठन अपने वरिष्ठ विधायक और जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह के मामले में पशोपेश में है, सुप्रीम कोर्ट ने मंत्री शाह के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। साथ ही सत्ता से लेकर संगठन विजय शाह का विकल्प ढूंढ रही है। केंद्रीय नेतृत्व से भी इसके संकेत मिल गए हैं। बताया जा रहा है कि कोर्ट से विजय शाह पर एक्शन हुआ तो उनका मंत्री पद जाएगा। भविष्य में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में निर्णय लिया जा सकता है। बता दें कि शाह भाजपा में प्रमुख आदिवासी चेहरा माने जाते हैं। सूत्रों के अनुसार, खंडवा, हरदा के साथ आदिवासी बाहुल्य इलाकों से बड़े चेहरे की तलाश जारी है।
जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दावोस यात्रा से लौटने के बाद मंत्री शाह के मामले पर चर्चा हो सकती है। डॉ. मोहन यादव मंत्रिमंडल में विजय शाह एक प्रमुख आदिवासी चेहरा हैं। लिहाजा उनके मामले में केंद्रीय नेतृत्व के साथ विचार-विमर्श कर कोई फैसला लिया जाएगा। भाजपा नेतृत्व विजय शाह पर कार्रवाई के मामले में शुरुआत से फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। यही वजह है कि शाह के विवादित बयान से देश भर में पार्टी की किरकिरी होने के सात महीने बाद भी उनका मंत्रिमंडल से इस्तीफा नहीं लिया गया। इसकी एक वजह विजय शाह का भाजपा का प्रभावी आदिवासी चेहरा होना है।
पार्टी की नजर आदिवासी वोट पर
मप्र की राजनीति में आदिवासी वोटर निर्णायक की भूमिका में होते हैं। ऐसे में भाजपा कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहती है, ताकि बड़ा वोट बैंक प्रभावित न हो। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें अजजा वर्ग के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में शाह से मंत्री पद छीनकर भाजपा आदिवासी वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहती, लेकिन जिस तरह से कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी मामले में मंत्री विजय शाह के खिलाफ कार्रवाई में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है और दो सप्ताह में अभियोजन मंजूरी पर निर्णय लेने का आदेश सरकार को दिया है। इससे उनके खिलाफ कार्रवाई करना सरकार की मजबूरी बनती जा रही है। गौरतलब है कि मंत्री विजय शाह ने मई में एक सभा में कर्नल सोफिया कुरैशी का नाम लिए बिना पाकिस्तानी आतंकियों को लेकर कहा था कि हमने उनकी बहन भेजकर उनकी ऐसी-तैसी करवाई। विजय शाह के विवादित बयान पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मप्र हाईकोर्ट ने 4 घंटे के भीतर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के आदेश पर मंत्री शाह के खिलाफ महू के मानपुर थाने में दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट के आदेश पर दर्ज एफआईआर रद्द किए जाने को लेकर शाह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ जहां कर्नल सोफिया को लेकर दिए गए मंत्री शाह विवादित बयान पर सख्ती दिखाई है, वहीं एसआईटी से मंत्री शाह से जुड़े कुछ अन्य कथित बयानों की पूरी जानकारी देने को कहा है। साथ ही इन पर हुई कार्रवाई की रिपोर्ट भी एसआईटी से मांगी है। इन पुराने विवादित बयानों से शाह की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। शाह पूर्व में कई बार विवादित टिप्पणियों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। वर्ष 2013 में तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान पर व्यक्तिगत टिप्पणी कर शाह एक बार मंत्री पद गंवा चुके हैं।
शाह की तत्काल गिरफ्तारी की उठी मांग
देश की जनता की भावनाओं को आहत करने वाले भाजपा सरकार के मंत्री विजय शाह के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट द्वारा केस दर्ज किए जाने के स्पष्ट आदेश के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई न होने से जनमानस में भारी रोष व्याप्त है। इसी लोकतांत्रिक आक्रोश को स्वर देने के लिए मध्यप्रदेश कांग्रेस महासचिव अमित शर्मा के नेतृत्व में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन किया गया। कांग्रेस महासचिव अमित शर्मा ने प्रदर्शन को संबोधित करते हुए कहा कि यह अत्यंत चिंताजनक और शर्मनाक है कि जिस मंत्री पर सुप्रीम कोर्ट ने केस दर्ज करने के निर्देश दिए हैं, उसे भाजपा सरकार खुला संरक्षण दे रही है। यह न केवल संविधान का अपमान है, बल्कि देश की जनता की भावनाओं के साथ सीधा खिलवाड़ है। अमित शर्मा ने कहा कि भाजपा सरकार का यह रवैया यह स्पष्ट करता है कि उनके लिए सत्ता और मंत्री सर्वोच्च हैं, जबकि संविधान, न्यायपालिका और जनभावनाओं का कोई महत्व नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं किया जा रहा, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करे? कांग्रेस महासचिव अमित शर्मा ने आगे कहा कि विजय शाह की तत्काल गिरफ्तारी केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता की भी अनिवार्य माँग है। भाजपा सरकार द्वारा कार्रवाई न किया जाना यह संदेश देता है कि कानून केवल आम जनता के लिए है, सत्ता में बैठे लोगों के लिए नहीं।
