प्रदेश में खुल सकता है… पदोन्नति पर लगा ‘ताला’

  • प्रमोशन में आरक्षण मामले में 20 को सुनवाई
  • गौरव चौहान
पदोन्नति

मप्र में लाखों अधिकारियो-कर्मचारियों की पदोन्नति प्रक्रिया पर लगा ताला खुलने की उम्मीद एक बार फिर से जगी है। प्रमोशन में आरक्षण मामले में 20 जनवरी को  मप्र हाईकोर्ट में सुनवाई होने वाली है। माना जा रहा है कि सरकार की मंशानुसार अदालत से कर्मचारियों की पदोन्नति की राह खुल सकती है। मप्र के कर्मचारी पिछले 10 साल से पदोन्नति की आस लगाए हुए हैं।
 गौरतलब है की मप्र में पदोन्नति प्रक्रिया पर प्रतिबंध होने के कारण हजारों कर्मचारी बिना प्रमोशन पाए ही रिटायर हो गए हैं। इस बीच पिछले दस साल से प्रतीक्षारत सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों के लिए मौजूदा माह में अच्छी खबर मिलने की उम्मीद है। पिछले दस साल से जिस प्रमोशन के लिए शासकीय सेवक इंतजार कर रहे हैं, इसी माह इस पर मप्र उच्चतम न्यायलय अपना फैसला दे सकता है। प्रमोशन में आरक्षण को लेकर 13 जनवरी को मप्र हाईकोर्ट में सुनवाई थी, लेकिन चीफ जस्टिस विपिन सचदेवा की व्यस्तता के कारण सुनवाई नहीं हो पाई। अब न्यायालय में प्रमोशन में रिजर्वेशन के विषय पर सुनवाई 20 जनवरी को होना है। जानकारी है कि इसमें सपाक्स, अजाक्स और सरकार के महाधिवक्ता का पक्ष सुनकर हाईकोर्ट अपना निर्णय दे सकता है। गौरतलब है कि विभागों में राज्य से लेकर ब्लाक और गांव स्तर तक सरकारी सेवकों की 31 दिसंबर को सेवानिवत्ति होती है। इस दौरान होने वाले समारोहों में निरंतर प्रमोशन न मिलने की पीड़ा बताई जा रही है। कर्मचारियों के अलावा उनके परिवार भी कहते हैं कि यह हमेशा कुंद्रा बहेगी कि जिस पद पर काम किया। उसी पर रिटायर्ड हुए। उच्च पदों पर जाने का मौका नहीं मिल पाया है।
2016 से प्रमोशन पर प्रतिबंध
 पिछले दस साल से प्रतिबंध होने के कारण अभी तक अधिकारी और कर्मचारियों के रिटायरमेंट का आंकड़ा करीब एक लाख तक पहुंच गया है। प्रतिमाह शासकीय सेवकों की सेवानिवृत्ति का क्रम बरकार है। लगातार प्रदेश में कर्मचारियों द्वारा मांग उठाई जा रही है कि प्रमोशन के रास्ते तत्काल खोले जाने चाहिए। साल 2016 से प्रमोशन पर प्रतिबंध लगा है। तब से स्थति यह है कि कर्मचारी अधिकारी जिस पद पर काम कर रहा है। उसी पद पर रहते हुए वह रिटायरमेंट ले रहा है। न्यायालयीन निर्णय नहीं होने के कारण प्रदेश में प्रतिबंधित प्रमोशन ने विभागों में सिस्टम को प्रभावित कर दिया है। हालात यह है कि उम्र का दायरा पूरा होने से ऊपर के पद निरंतर स्टिायरमेंट से रिक्त हो रहे हैं। अब पदोन्नतियां नहीं होने से योग्य लोग इन पदो पर वहीं पहुंच पा रहे है। काम की गति को बढ़ाने के लिए नियम विरूद्ध जूनियरों को सीनियर का प्रभार दिया जा रहा है। पीडब्ल्यूडी सहित अन्य निर्माण विभागों में एक्ज्युकेटिव इंजीनियर अभियंता की सीट संभाल रहे है। अन्य विभागों में योग्य न होने के बाद भी जूनियरों को वरिष्ठ पदों पर भेजकर काम लिया जा रहा है।
कर्मचारी संगठनों की अपनी-अपनी मांग
इस समय प्रदेश भर के सरकारी सेवकों की निगाहें मप्र हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी है। कर्मचारी प्रमोशन संघों की मांग है कि वर्ष 2016 से ही मिलना चाहिए। हाल में सरकार ने जो नया नियम बनाया था। उसमें वर्ष 2025 से पदोन्नतियां देने की पहल हुई थी, लेकिन फिर मामला न्यायालय में चला गया था। अब मांग है कि जब से प्रतिबंध है। उसी वर्ष से इस प्रक्रिया की शुरूआत होना चाहिए। तब से इस अवधि तक जितने अधिकारी कर्मचारी रिटायर्ड हुए है उन्हें इसका लाभ मिलना चाहिए। सपाक्स संघ के प्रांताध्यक्ष केएस तोमर का कहना है कि सरकार पहले तो यह तय करे कि आरक्षित और अनारक्षित कौन है? एससी-एसटी को 36 प्रतिशत आरक्षण क्यों, फिर पिछड़ों को भी 50 प्रतिशत लाभ मिलना चाहिए। नियम विरूद्ध प्रमोशन पा चुके लोगों को रिवर्ट क्यों नहीं किया गया?  सरकार को यह बताना चाहिए। प्रमोशन 2016 से दिया जाना चाहिए।  वहीं अजाक्स संघ के प्रवक्ता विजय शंकर श्रवण का कहना है कि निश्चित तौर पर हमें विश्वास है कि न्यायालय इस संवेदनशीनल मुद्दे को गंभीरता से निर्णय में परिवर्तित करगा। इससे 40 फीसदी आबादी को लाभ होगा। न्यायालय के निर्णय की सभी को प्रतीक्षा है।

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