दिग्गी राजा का इंकार…सक्रिय हुए दावेदार

  • मप्र में राज्यसभा के लिए सजने लगी चौसर

गौरव चौहान
 मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ऐलान किया है कि वो तीसरी बार राज्यसभा नहीं जाएंगे। उन्होंने अपनी सीट खाली करने का फैसला किया है। ताकि किसी नए चेहरे को मौका मिल सके। दिग्विजय सिंह के राज्यसभा सीट छोडऩे के ऐलान के बाद अब मप्र कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। मगर, दिग्विजय ठहरे खाटी कांग्रेसी नेता, उन्होंने सीट छोडऩे की तो बात की लेकिन एक ऐसा बयान दे दिया जिससे पार्टी में इस एक राज्यसभा सीट पर लड़ाई एसटी-एससी वर्ग के लिए आन पड़ी हैं। दरअसल, हाल ही में दिग्विजय सिंह ने मप्र कांग्रेस सरकार बनने पर आदिवासी या एससी मुख्यमंत्री बनाए जाने के सवाल पर कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति का मुख्यमंत्री बनता है तो मुझे प्रसन्नता होगी। दिग्विजय सिंह ने जैसे ही दो दिन में दो बड़े बयान दिए, कांग्रेस नेताओं की जैसी लॉटरी निकल पड़ी। सबसे पहले राज्यसभा सीट पर कांग्रेस का अनुसूचित विभाग एक्टिव हुआ।
गौरतलब है कि मप्र में कुल 11 राज्यसभा सीटें हैं। इनमें से आगामी 9 अप्रैल को दो सीटें खाली हो जाएंगी। एक सीट कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की और दूसरी भाजपा के डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी की है। इस साल दोनों सीटों के लिए चुनाव होना हैं। मप्र विधानसभा में 230 सदस्य हैं। विधानसभा में भाजपा के 164 और कांग्रेस के 65 विधायक हैं, एक अन्य है। इस हिसाब से कांग्रेस को एक सीट मिलना तय है। ऐसे में दिग्विजय सिंह के राज्यसभा की सीट छोडऩे के बयान के बाद प्रदेश कांग्रेस में हलचल तेज हो गई है। दिग्विजय सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल आगामी 9 अप्रैल को समाप्त हो रहा है और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि वे तीसरी बार राज्यसभा जाने के इच्छुक नहीं हैं। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस के भीतर राज्यसभा की एक सीट को लेकर दावेदारों की सक्रियता अचानक बढ़ गई है। दिग्विजय सिंह के बयान के तुरंत बाद कांग्रेस नेताओं के समर्थक सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए हैं। फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप ग्रुप्स में अपने-अपने नेताओं के समर्थन में पोस्ट, वीडियो और पुराने योगदानों की सूची साझा की जा रही है। समर्थक यह बताने में जुट गए हैं कि उनके नेता ने पार्टी के लिए क्या योगदान दिया है और क्यों उन्हें राज्यसभा भेजा जाना चाहिए। इससे साफ है कि यह मुकाबला केवल वरिष्ठता का नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक संतुलन का भी है।
कम से कम राज्यसभा तो भेजा जाए
कांग्रेस के अनुसूचित विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने दिग्विजय सिंह का बयान आते ही तुरंत उन्हें चि_ी लिखी और कहा आपने तो अनुसूचित विभाग के नेता को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही है। ऐसे में कम से कम राज्यसभा तो उन्हें भेजा जाए। ताकि इससे अनुसूचित जाति को मजबूती मिल सके। अप्रैल में राज्यसभा सीट खाली होने से पहले ही कांग्रेस में अंदरूनी घमासान शुरू हो गया है। कांग्रेस के अंदर दिग्विजय सिंह पहले ही अपने बयानों से मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। पहले सीडब्ल्यूसी की बैठक में आरएसएस की तारीफ और फिर मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के लिए एससी-एसटी वर्ग के उम्मीदवार की वकालत और अब राज्यसभा सीट खाली करने का बयान दे दिया। इससे पहले दिग्विजय और प्रदेशाध्यक्ष की समानांतर पदयात्राएं चल रही थीं। दिग्विजय जहां मनरेगा में बदलाव के दुष्प्रभाव बता रहे थे। वहीं जीतू पटवारी बूथ चलो, गांव चलो के लिए पदयात्रा निकाल रहे थे। उस समय भी गुटबाजी की बात सामने आई थी।
कांग्रेस में तीन नाम पर चर्चा तेज
दिग्विजय सिंह के राज्यसभा सीट छोडऩे के बाद अब इस बात पर घमासान मचा हुआ है कि ये सीट किसी खाते में जाएगी। इस रेस में तीन नाम सबसे आगे हैं। इस दौड़ में सबसे पहला नाम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ का है। कमलनाथ फिलहाल छिंदवाड़ा जिले से विधायक हैं। वो केंद्र की सियासत में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर राज्यसभा सीट के सहारे वो केंद्र की राजनीति में फिर से एंट्री ले सकते हैं। वहीं अरुण यादव ओबीसी नेता हैं। लंबे वक्त से संघर्ष कर रहे हैं। पिछली दफा उनके नाम पर चर्चा हुई लेकिन उनकी जगह अशोक सिंह को भेज दिया गया। अरुण यादव मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। इस बार वो अपनी दावेदारी जरूर करेंगे। वहीं जीतू पटवारी फिलहाल कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। विधानसभा चुनाव हार चुके हैं लेकिन मेहनती नेता माने जाते हैं। इस बीच अगर उन्हें राज्यसभा में जाने का मौका मिलता है तो उनकी प्रोफाइल को और भी मजबूती मिलेगी। जब प्रदेश अध्यक्ष सांसद या कम से कम विधायक हो तो उसका एक अलग प्रभाव पड़ता है। जीतू पटवारी राहुल गांधी की पसंद हैं। लिहाजा वो भी प्रयासरत होंगे कि ये सीट उन्हें मिलें। इनके अलावा राज्यसभा की दौड़ में पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन का नाम भी चर्चा में है। इसके अलावा पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल और सज्जन सिंह वर्मा भी राज्यसभा सांसद के लिए दावेदारी कर रहे हैं। सज्जन वर्मा के समर्थक सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर कर रहे हैं। इन सभी नेताओं के समर्थक अपने-अपने स्तर पर पार्टी हाईकमान तक संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। नरेला विधानसभा सीट से विधानसभा प्रत्याशी रहे महेंद्र सिंह चौहान ने भी सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर कर खुद की राज्यसभा के लिए दावेदारी जताई है। दिग्विजय सिंह के बयान के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस के पास राज्यसभा के लिए कई मजबूत विकल्प मौजूद हैं। हालांकि यही स्थिति पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौती भी बन गई है। पार्टी को ऐसा नेता चुनना होगा जो संगठन, जातिगत संतुलन और आगामी चुनावी रणनीति के लिहाज से सबसे उपयुक्त हो। दिग्विजय सिंह का राज्यसभा की सीट छोडऩे का बयान केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। उनके इस कदम को पार्टी में नई पीढ़ी को आगे लाने और नेतृत्व में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि दिग्विजय सिंह अब मिशन-2028 के मद्देनजर प्रदेश कांग्रेस संगठन को मजबूत करने पूरे प्रदेश में सक्रियता बढ़ाएंगे।

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