
- प्रदूषित शहरों में समिति करेंगी निगरानी…
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। प्रदेश में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर सरकारी तंत्र की ढिलाई पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने राज्य शासन को निर्देश दिए हैं कि प्रदेश स्तर पर एक उच्चस्तरीय समिति के साथ-साथ प्रत्येकै प्रदूषित शहर में क्रियान्वयन समितियों का गठन किया जाए, ताकि वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की योजनाएं केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू हो सकें। एनजीटी सेंट्रल जोन बेंच ने भोपाल सिटीजन्स फोरम के संयोजक सुरेन्द्र तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किए। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि प्रदेश के आठ नॉन-अटेनमेंट शहरों के अलावा अन्य सभी प्रदूषित शहरों और क्षेत्रों को भी इस व्यवस्था में शामिल किया जाए। इसके तहत राज्य स्तरीय समिति प्रदूषण वाले क्षेत्रों की पहचान कर व्यापक कार्ययोजना तैयार करेगी, जबकि जिला स्तरीय समितियां उस कार्ययोजना को अमल में लाने की जिम्मेदारी निभाएंगी। एनजीटी ने राज्य शासन, प्रमुख सचिव पर्यावरण, नगरीय विकास और परिवहन, भोपाल विकास प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग, मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और मप्र पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण के चेयरमैन को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है कि अब तक प्रदूषण कम करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
राज्य और जिला स्तर पर होगी दोहरी व्यवस्था: एनजीटी के निर्देशों के अनुसार राज्य स्तर पर प्रमुख सचिव पर्यावरण, नगरीय विकास और परिवहन की एक उच्चस्तरीय समिति कार्य करेगी। यह समिति प्रदेश के उन सभी शहरों, कस्बों, सेमी-अर्बन और ग्रामीण क्षेत्रों की पहचान करेगी, जहां वायु गुणवत्ता तय मानकों से नीचे है। इसके बाद इन क्षेत्रों के लिए सुव्यवस्थित और समयबद्ध एक्शन प्लान तैयार किया जाएगा। साथ ही जिला स्तर पर प्रत्येक प्रदूषित शहर में कलेक्टर की अध्यक्षता में क्रियान्वयन जमिति बनाई जाएगी। इस समिति में नगर निगम आयुक्त, पुलिस आयुक्त या एसपी, आरटीओ जिला स्वास्थ्य अधिकारी, कृषि अधिकारी, लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री और मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी को शामिल किया जाएगा। आवश्यकता पडऩे पर विशेषज्ञों और तकनीकी जानकारों को भी समिति से जोड़ा जा सकेगा।
गंभीर स्वास्थ्य प्रभाव
एनजीटी ने अपने आदेश में वायु प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान का भी उल्लेख किया है। जर्मनी के गुटेनबर्ग विश्वविद्यालय के प्रो. थॉमस मुंजेल के अध्ययन का हवाला देते तेहुए हुए ट्रिब्यूनल ने कहा कि पीएम-2.5 जैसे सूक्ष्म कण सांस के जरिए फेफड़ों से रक्त में पहुंच जाते हैं। इससे शरीर में सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ता है और धमनियों की भीतरी परत को नुकसान होता है। भारतीय परिस्थितियों में इसका प्रभाव और गंभीर है, जहां प्रदूषण से होने वाली मौतों का आंकड़ा 15त्न से कम नहीं माना जा सकता। एनजीटी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि राज्य शासन और संबंधित विभागों ने निर्देशों का सख्ती से पालन नहीं किया, तो आगे और कठोर आदेश जारी किए जा सकते हैं।
इससे यह होगा लाभ
– वायु प्रदूषण पर समन्वित और प्रभावी नियंत्राण।
– योजनाओं का क्रियान्वयन कलेक्टर स्तर पर होने से जवाबदेही बढ़ेगी।
– स्वास्थ्य जोखिम कम होंगे और प्रदूषण से होने वाली बीमारियों में कमी आएगी।
– शहरी के साथ ग्रामीण और सेमी-अर्बन क्षेत्रों पर भी फोकस होगा।
– अदालत के आदेशों का पालन सुनिश्चित होगा।
विभागवार जिम्मेदारियां होंगी तय: ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिए हैं कि कार्ययोजना में यह भी स्पष्ट करें कि कौन सा विभाग प्रदूषण नियंत्रण के लिए क्या जिम्मेदारी निभाएगा। ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (जीआरएपी) की तर्ज पर एहतियाती और उपचारात्मक कदम तय किए जाएंगे।
