
- शून्य आधार बजटिंग और त्रिवर्षीय रोलिंग बजट में उलझी सरकार
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के पुनरीक्षित बजट अनुमान और वर्ष 2026-27 के बजट निर्माण की प्रक्रिया आरंभ कर दी है। इसके लिये वित्त विभाग द्वारा दिशा-निर्देश जारी कर दिये गये हैं। इस बार भी राज्य सरकार द्वारा शून्य आधार बजटिंग की प्रक्रिया को जारी रखते हुए वित्तीय अनुशासन और परिणाम आधारित बजट निर्माण को प्राथमिकता दी जा रही है। इसके साथ ही सरकार ने पहली बार वर्ष 2027-28 एवं वर्ष 2028-29 के लिए त्रिवर्षीय रोलिंग बजट तैयार करने का निर्णय लिया गया है, जो प्रदेश की दीर्घकालिक विकास रणनीति विकसित मप्र 2047 पर केन्द्रित है। मप्र का बजट मार्च में प्रस्तुत होगा। सभी विभाग इसकी तैयारी में जुटे हुए हैं। पहली बार तीन वर्ष की आवश्यकता का आकलन करके बजट तैयार किया जा रहा है लेकिन बजट के गणित में सरकार उलझ गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि केंद्र सरकार से प्रदेश सरकार को 34 हजार करोड़ रूपए नहीं मिले हैं।
दरअसल, केंद्र सरकार से वित्त वर्ष 2025-26 में 44 हजार करोड़ रुपये मिलना है। इसे शामिल करते हुए वर्तमान बजट बनाया गया था, लेकिन अभी तक 10 हजार करोड़ रुपये यानी मात्र 25 प्रतिशत राशि ही, मिली है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि जीएसटी दरों में संशोधन के कारण अनुमान गड़बड़ाया है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि जीएसटी दरों में संशोधन के कारण अनुमान गड़बड़ाया है। केंद्र सरकार भी आकलन कर रही है। मध्य प्रदेश को भी जीएसटी की नई दरों के प्रभावी होने से लगभग आठ हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है। इससे बजट का जो गणित सरकार ने लगाया है वह गड़बड़ा सकता है। इससे अधिकारी असमंजश में पड़े हुए हैं। वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव मनीष रस्तोगी का कहना है कि अब सिस्टम बदल गया है। बिल लगाते हैं और राशि का भुगतान सीधे संबंधित को हो जाता है। कितनी राशि प्राप्त हुई और कितनी शेष है यह बिल क्लियर होने के बाद ही पता लगता है।
बजट का पूरा गणित ही राशि प्राप्तियों पर निर्भर
दरअसल, बजट का पूरा गणित ही राशि प्राप्तियों पर निर्भर करता है। जीएसटी की नई दरों के कारण वैसे भी साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये कम मिलने के आसार हैं। राज्य का राजस्व भी अनुमान जैसा प्राप्त नहीं हो रहा है। प्रदेश की वित्तीय स्थिति से मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव और मुख्य सचिव अनुराग जैन अवगत है। अलग-अलग समीक्षा भी चुकी है। इनमें सभी विभागों से कहा गया है कि वे राजस्व संग्रहण पर ध्यान दें। टैक्स चोरी करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करें। बकाया वसूली के लिए अभियान चलाएं। राजस्व में वृद्धि के उपाय तलाशें। नगरीय निकाय और पंचायतों को आत्मनिर्भर चनाएं। आर्थिक गतिविधियां बढ़ाएं, जिससे राजस्व में वृद्धि हो। वहीं प्रदेश में चल रहे जल जीवन मिशन ने सरकार को 2,813 करोड़ रुपये का झटका दिया है। दरअसल, योजना के अंतर्गत 8,358 योजनाओं के आकलन में गलती हुई। सात लाख ग्रामीण परिवारों को क्रियाशील घरेलू नल कनेक्शन उपलब्ध कराने का प्रविधान ही नहीं हो पाया था। परियोजना का पुनरीक्षण कराया गया तो लागत 9026 करोड़ 97 लाख रुपये पहुंच गई। जबकि, मूल स्वीकृत लागत 6,213 करोड़ 76 लाख रुपये थी। अंतर की राशि के लिए केंद्र सरकार से अनुरोध किया तो वहां से साफ मना हो गया। ऐसे में काम पूरा करने के लिए राज्य सरकार को 2,813 करोड़ रुपये का प्रविधान करना पड़ा, जिसका राज कोष पर अतिरिक्त भार पड़ा। वित्त विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार अब प्रत्येक योजना के लिए यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि उस पर खर्च क्यों किया जा रहा है, उसका लाभ किसे होगा और उसका सामाजिक व आर्थिक असर क्या होगा। इस प्रक्रिया में गैर-प्रभावी योजनाओं को समाप्त करने और समान प्रकृति की योजनाओं को एकीकृत करने पर भी विचार किया जाएगा।
जीएसटी दरों में संशोधन का असर राजस्व पर पड़ा
प्रदेश सरकार ने वर्ष 2025-26 का बजट राजस्व प्राप्तियों में 14 प्रतिशत की वृद्धि के साथ तैयार किया था। इसमें बड़ा योगदान केंद्रीय करों के हिस्से में 17 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1,11,662 करोड़ का अनुमानित था। केंद्रीय सहायता अनुदान में 8 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 48,661 करोड़ मिलने का अनुमान था। विभिन्न केंद्रीय योजनाओं में 44,355.95 करोड़ मिलने थे। वित्तीय वर्ष समाप्त होने में तीन माह शेष हैं। दिसंबर, 2025 की स्थिति में इस राशि में से प्रदेश को केवल 9,744.79 करोड़ मिले हैं, जो 25 प्रतिशत के आसपास होता है। चूंकि, केंद्र सरकार द्वारा दी जानी वाली सभी राशियां अब बजट में उल्लेखित होती हैं, इसलिए इसका लेखा-जोखा वित्त विभाग के पास रहता है। अधिकारियों का कहना है कि जीएसटी दरों में संशोधन का असर राजस्व पर पड़ा है। इसके कारण केंद्र सरकार का अंशप्रभावित हुआ है। वहीं, राज्य की ओर से जो उपयोगिता प्रमाण पत्र भेजे जाते हैं, उनमें विलंब भी राशि के आवंटन को प्रभावित करता है। यही कारण है कि राशि कम मिली है। यदि वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक राशि प्राप्त नहीं होती है तो इसका असर आगामी बजट पर पड़ेगा।
