हारे हुए रावत हर जगह हो रहे आगे

  • उपचुनाव में हार का असर

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
कांग्रेस से आए नेताओं को भाजपा भले ही अंतर्मन से स्वीकार कर सत्ता से संगठन तक रचाने बसाने में जुटी है, लेकिन मैदान में खींचतान रुकने का नाम नहीं ले पा रही है। सागर में पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह और कांग्रेस से आए गोविंद सिंह राजपूत के बीच पटरी बैठाने में संगठन अभी सफल भी नहीं हो सका था कि अब श्योपुर से खींचतान सामने आ गई है। पार्टी के पुराने नेता सीताराम आदिवासी अभी तक पूर्व मंत्री रामनिवास रावत से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं। अब तो सीताराम को रामनिवास के कारण अपनी ही पार्टी की सरकार में खुद को बेगाना मानने लगे हैं। अब जिले में ही तवज्जो न मिलने से उनकी पीड़ा और चढ़ गई है। कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आए रामनिवास रावत की भाजपा ने वन मंत्री बनाने के बाद विजयपुर से उपचुनाव लाया था, लेकिन वे हार गए। इसके चलते उनका मंत्री पद भी चला गया। मगर उनका रुतबा और रौब अभी भी हर जगह कायम है। सत्ता और संगठन में उन्हें भरपूर महत्व मिल रहा है। भाजपा के पुराने नेता मध्यप्रदेश सहरिया विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री सीताराम आदिवासी पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। उनका यह दर्द नए साल की पूर्व संध्या पर सामने भी आ गया। सीताराम का कहना है कि मैं वर्तमान में मंत्री हूं। इसके बावजूद न तो बैठकों में बुलाया जा रहा और न ही कोई सम्मान दिया जा रहा है। जबकि रावत को हर स्तर पर तवज्जो मिल रही है। अपना दर्द मीडिया को दिखाते हुए सीताराम ने कहाकि हाल ही में जिले में हुई बैठक में उन्हें आमंत्रित तक नहीं किया गया। पिछली बैठक में वे पहुंच गए थे तो वहां भी उनका कोई सम्मान नहीं हुआ। सौताराम की तकलीफ यह है कि रामनिवास वर्तमान में न तो विधायक हैं और न सांसद। पार्टी में भी कोई पद नहीं है, बावजूद इसके मुख्यमंत्री, मंत्री, कमिश्नर कलेक्टर सभी उन्हीं को महत्व देते हैं। उनके बताए काम भी तत्काल होते हैं। मगर मैं आदिवासियों से जुड़े काम लेकर जाता हूं तो कोई ध्यान नहीं देता।
सत्ता-संगठन इसलिए नाराज
चंबल अंचल की विजयपुर, जौरा और बमोरी जैसी 10-15 विधानसभा सीटें आदिवासी वोटों से ही तय होती हैं। सीतारात क्षेत्र का बड़ा चेहरा रहे हैं, लेकिन जब सीताराम को टिकट नहीं दिया गया, तो आदिवासी नाराज हो गए और भाजपा यहां बुरी तरह हार गई। उपचुनाव में पार्टी ने रावत और सीताराम को बैटकार सामंजस्य बनाने की पुरजोर कोशिश की थी, लेकिन रावत की हार ठीकरा पूरी तरह से सीताराम के सिर फूय। जबकि सीताराम का कहना है कि उन्होंने पूरी ताकत लगाई। मुख्यमंत्री ने भी लगातार दौरे किए। सीताराम इस हार को रावत के कर्म से जोड़ते हुए कहते हैं कि जिसके कर्म ही खराब हों, तो दूसरा क्या कर सकता है। उनके भाजपा में आने से जिले का माहौल ही चिगड़ गया है। इसी तरह की खींचतान सागर जिले में भी बनी हुई है। कांग्रेस से भाजपा में आए मंत्री गोविंद सिंह राजपूत और पूर्व मंत्री व खुरई विधायक भूपेंद्र सिंह के बीच तनातनी कम नहीं हो पा रही है। हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने सागर दौरे के बीच दोनों को साथ बैठाया था। प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश में जुटे हैं। वे भी मानते हैं इन दोनों के बीच की तनातनी पार्टी के लिए अच्छी नहीं है।
आदिवासियों की भी उपेक्षा के आरोप
पूर्व विधायक सीताराम आदिवासी ने रघुनाथपुर और भ्रमपुरा क्षेत्र का जिक्र करते हुए आरोप  लगाया कि आदिवासी इलाकों में सोलर पंप और सोलर प्लांट के नाम पर आदिवासियों की  जमीन छीनी जा रही है। सीताराम ने कहा कि जिन जमीनों पर सोलर प्लांट लगाने की कोशिश हो रही है, वहां आदिवासी वर्षों से खेती कर रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर आदिवासियों की जमीन पर ही क्यों परियोजनाएं थोपी जा रही हैं, क्या और कहीं जमीन नहीं है? सहरिया जनजाति के विकास की राशि भी कम होती जा रही है। इससे नाराजगी बढ़ती जा रही है।
रामनिवास को बगल में बैठाते हैं कलेक्टर
सीताराम का दुख यह भी है कि बैठकों में कलेक्टर भी उनको सम्मान नहीं देते, लेकिन रामनिवास को बैठाया अपने बगल में बैठाते हैं। जबकि प्रोटोकॉल में में मंत्री होने नाते बड़ा हूं। जिला पंचायत अध्यक्ष और वर्तमान मंत्री को यह स्थान मिलना चाहिए था। हालत तो यह हो गई है कि प्रभारी मंत्री भी रावत को ही महत्व देते हैं। रामनिवास की हर बात सुनी जाती है। मुझ पर कोई ध्यान ही नहीं देता।
सांसद को रावत नहीं, मैंने जिताया

उपेक्षा से नाराज सीताराम यह कहने से नहीं चूके कि लोस चुनाव में पार्टी को रामनिवास ने नहीं, बल्कि उनके क्षेत्र के आदिवासियों ने जिताया है। रावत समाज के 10-15 हजार वोटों से चुनाव नहीं जीता जा सकता। जिले के आदिवासी मतदाताओं ने एकजुट होकर मतदान किया था। इसके बावजूद मुख्यमंत्री बार-बार रामनिवास को श्रेय दे रहे हैं।

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