- भाजपा और संघ की आड़ में कांग्रेस नेतृत्व को दिखाया आईना
- गौरव चौहान

मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का अचानक बागी तेवर दिखाना सिर्फ संयोग नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संकेत है। दरअसल, जिस तरह कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा हो रही है उससे वे नाराज है। शायद यही वजह है कि उन्होंने भाजपा और संघ की आड़ में कांग्रेस नेतृत्व को आईना दिखाया है। भाजपा और आरएसएस मॉडल में जमीनी कैडर, अनुशासन और संगठनात्मक सीढिय़ां सबसे बड़ी ताकत मानी जाती हैं। दिग्विजय का संगठन की शक्ति लिखना, कांग्रेस में कैडर-बेस्ड स्ट्रक्चर की कमी पर सीधा कटाक्ष माना जा रहा है।
यह सर्वविदित है कि कांग्रेस में भाजपा और आरएसएस के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से अधिक किसी ने नहीं बोला होगा। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री ने अनुशासन और कार्यकर्ताओं के महत्व के तर्क पर आरएसएस और भाजपा के संगठन शक्ति की जो प्रशंसा की, वह यूं ही नहीं है। इसके गहरे निहितार्थ हैं। राजनीति के मंझे खिलाड़ी दिग्विजय ने ऐसा करके वास्तव में अपनी ही पार्टी कांग्रेस में वरिष्ठों की उपेक्षा को लेकर शीर्ष नेतृत्व पर अपरोक्ष निशाना साधा है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने भाजपा संगठन की तारीफ की और कांग्रेस के संगठन की कमियां बताईं तो कांग्रेस के बहुत से नेता परेशान हुए हैं। वे बताने में जुट गए हैं कि दिग्विजय सिंह की वजह से कब-कब कांग्रेस को कितना नुकसान हुआ है। दिग्विजय सिंह के बारे में सब जानते हैं कि उनका एक वैचारिक स्टैंड है और वे अपने मन की बात कहने में पीछे नहीं हटते हैं। कई बार उनका इस तरह बेबाक बोलना कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है। इस बार भी उन्होंने जो कहा भले उनकी मंशा ठीक रही हो लेकिन कांग्रेस को इसका नुकसान होगा क्योंकि इससे भाजपा के प्रचारित किए जा रहे नैरेटिव को बल मिलता है।
वरिष्ठ नेता हाशिए पर
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से पहले दिग्विजय सिंह ने एक्स हैंडल पर की अपनी पोस्ट में संघ की प्रशंसा करके भले ही अब उन्होंने चुप्पी साध ली है लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के लिए उलझन पैदा कर दी है। माना जा रहा है कि एक बार फिर वरिष्ठों की उपेक्षा और संगठनात्मक कमजोरियों को लेकर इनकी लामबंदी से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। संयोग नहीं है कि इस बार यह आवाज उस मध्य प्रदेश से उठी है, जहां कांग्रेस मजबूत और सीधे भाजपा से मुकाबले में है, यानी साफ संकेत देने की कोशिश है कि यदि उपेक्षा नहीं थमी तो परिणाम पार्टी के हित में नहीं होंगे। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में हुए पीढ़ी परिवर्तन से प्रदेश में पिछले काफी समय से वरिष्ठों में नाराजगी के स्वर उठते आ रहे हैं। वजह यह कि दूसरी पीढ़ी के पार्टी में फ्रंट पर आने से वरिष्ठ नेता हाशिए पर हैं। फिर चाहे पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया, अजय सिंह हों या फिर अन्य नेता। ये सभी अपने क्षेत्र में ही सिमटकर रह गए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ भी परिदृश्य से लगभग गायब हैं। संगठन सृजन अभियान के माध्यम से जिला और ब्लॉक अध्यक्ष नियुक्त किए गए लेकिन विरोध हर जगह सुनाई दिया।
भाजपा को भा गए दिग्गी राजा
हमेशा भाजपा के निशाने पर रहने वाले दिग्विजय सिंह अचानक भाजपा को भा गए हैं। दिग्विजय सिंह के संघ और भाजपा के संगठन की प्रशंसा करने पर प्रतिक्रिया में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मीडिया से कहा कि हमारा संगठन है ही प्रशंसा के लायक। आइए, भाजपा में स्वागत है। वहीं, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि आरएसएस आदर्श संगठन है। जो सही बात है, वह उनकी जुबान पर आ गई। हमारे यहां सबका स्वागत है, जिनके विचार हमसे मिलते हैं, वे आ सकते हैं। वहीं भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव और मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने संघ और भाजपा के संगठन की प्रशंसा करने पर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की तुलना सरदार पटेल से की। विजयवर्गीय ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद होना स्वभाविक है लेकिन सच कहने का साहस भी होना चाहिए, जो हर किसी में नहीं होता। उन्होंने कांग्रेस के अंदर 50 के दशक के नेता सरदार पटेल और अन्य नेताओं की उस परंपरा पर चलने का काम किया है, जो सच कहने की हिम्मत रखते हैं। वहीं संघ की प्रशंसा के बाद अब इसको लेकर दिग्विजय सिंह ने चुप्पी साध ली है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा भाजपा में आने का ऑफर देने पर प्रतिक्रिया में दिग्विजय ने कहा कि अरे छोडि़ए। मुझे कुछ नहीं कहना है। वहीं, संघ की प्रशंसा वाले दिग्विजय के बयान से मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी हरीश चौधरी ने असहमति जताई है। एक्स पर पोस्ट करके चौधरी ने कहा है कि संगठन शक्ति जैसे शब्द का प्रयोग जिनके संदर्भ में किया जा रहा है, वो व्यक्ति संगठन शक्ति से नहीं बल्कि षड्यंत्र, साजिश, घृणा, वोट चोरी तथा उद्योगपतियों के धनबल के सहारे प्राप्त सत्ता से प्रधानमंत्री बने हैं।
