- मप्र में पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास नहीं हुए सफल

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
केंद्र औरा राज्य सरकार का फोकस गांवों को आत्मनिर्भर बनाने पर है। मप्र में इस दिशा में निरंतर काम हो रहे हैं। लेकिन इसका प्रभाव तनिक भी दिखाई नहीं दे रहा है। आलम यह है कि मप्र के गठन को करीब 70 साल होने को हैं, लेकिन पंचायतें मूलभूत सुविधाओं को तरस रही हैं। हर साल करोड़ों रूपए सडक़ नाली, पेयजल, भवन, सामुदायिक केंद्र और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए दिए जाते हैं। इसके बावजूद मप्र की 23 हजार पंचायतों में से एक भी अपनी आय से खुद को संचालित कर सकी हैं। इसके उलट, पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में पंचायतें आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रही हैं। पुणे की माण और हिंजवाडी पंचायतें 10 से 12 करोड़ रुपए तक की वार्षिक कमाई कर रही हैं। अहमदनगर जिले की हिवरे बाजार पंचायत तो देश की रोल मॉडल पंचायत के रूप में प्रसिद्ध है, जहां करोड़पति परिवारों की संख्या लगातार बड़ी है। यह पंचायत स्वयं की आय से विकास कार्यों का संचालन करती है।
पंचायतों को हर साल राज्य व केंद्रीय वित्त आयोग से हजारों करोड़ रुपए मिलते हैं, यह राशि अधोसंरचनात्मक विकास के लिए दी जाती है तब भी कई पंचायतों की हालत खस्ता है। जानकारी के अनुसार, पंचायतों के विकास पर हर साल राज्य सरकार 30 से 32 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। 2025-26 के लिए ग्रामीण विकास विभाग का बजट 19,050 करोड़ और पंचायत विभाग के लिए 13,279 करोड़ र प्रावधान किया है। यानी कुल 32.329 करोड़ का प्रावधान किया है। जबकि पिछले वित्तीय वर्ष के लिए उक्त विभागों के लिए 18 हजार 746 करोड़ में 9 हजार 123 करोड़ का प्रावधान किया था। प्रदेश की ही बिलकिसगंज व मुरवास के मॉडल को आधार बनाया जा सकता है। असल में ये उन्नत ग्राम पंचायत स्थानिक विकास योजना के तहत चिन्हित है। इनके समग्र विकास के लिए स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर को जिम्मा दिया था। बिलकिसगंज साल में 7 से 8 लाख रुपए राजस्व हासिल करती है जबकि मुरवारा ने ब्याज की राशि से कई काम किए हैं। पंचायत राज के डायरेक्टर के छोटे सिंह का कहना है कि पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने 4 के प्रयास कर रहे हैं लेकिन -अब तक कितनी पंचायतें आत्मनिर्भर बन चुकी है, इसका रिकॉर्ड नहीं है। पंचायतों में सामान्य काम करवा रहे
सांसदों के गोद लिए गांव भी बदहाल
आदर्श ग्राम योजना के तहत कुछ पंचायतों को जनप्रतिनिधियों ने पूर्व में गोद लिया था, लेकिन उनकी भी हालत ठीक नहीं हुई। केवल सामान्य काम सडक़, नाली और शौचालय बनकर रह गए। कई पंचायतों में तो 75 फीसदी शौचालय धराशायी हो गए। अब इन आदर्श गामों पर ध्यान भी नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ कमियां हैं, जिन्हें दूर कर दिया जाए तो स्थिति बदल सकती है। इसके लिए प्रत्येक पंचायत का अपना 10 वर्षीय मास्टर प्लान हो. आत्मनिर्भरता को कागज से जमीन पर उतारा जाए। विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ की जिम्मेदारी तय की जाए। सरपंचों को और अधिक जिम्मेदार बनाया जाए, पंचायतों में सचिवों का. स्थाई निवास हो। निगरानी की व्यवस्था की कागजी की बजाए, मैदानी बनाया जाए। पंचायत को दी जाने वाली राशि से विकास कार्यों की तुलना की जाए। सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था को पारदर्शी, बनाया जाकर, यई पार्टी आडिट भी कराया जाए। युवाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए. विकसित और आत्मनिर्भर पंचायत को प्रोत्साहन स्वरूप अलग से बजट दिया जाए। पंचायतों में भ्रष्टाचार और वित्तीय गड़बड़ी पर कार्रवाई को और सख्त किया जाए। पूर्व के वर्षों में जिन लोगों ने राशि हड़पी, उनसे की जाने वाली वसूली समय-सीमा में शत-प्रतिशत हो।
