मेहगांव में बिकाऊ के अलावा जातिवाद का सबसे बड़ा मुद्दा

The biggest issue of casteism apart from selling in Mehgaon

बसपा के मैदान में आने से त्रिकोणीय मुकाबला हो सकता है

भोपाल/हृदेश धारवार/बिच्छू डॉट कॉम। ग्वालियर-चंबल अंचल के तहत आने वाले भिंड जिले की मेहगांव विधानसभा सीट पर इस बार बिकाऊ के अलावा जातिवाद सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। इस सीट पर कांग्रेस के हेंमत कटारे और भाजपा के ओपीएस भदौरिया के बीच चुनावी जंग हो रही है। यहां पर बसपा ने योगेश नरवरिया पर भी दांव लगाया है। वे मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास कर रहे हैं। यहां से बीते आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर ओपीएस भदौरिया जीते थे। वे उसके बाद भाजपा में शामिल हो गए थे । भदौरिया अब भाजपा प्रत्याशी हैं। यही वजह है कि इस सीट पर कांग्रेस ने बिकाऊ को मुद्दा बना रखा है। बसपा भी यहां पूरी ताकत से मैदान में दिख रही है। बसपा ने यहां से बहुजन संघर्ष दल के पूर्व विधायक मुन्ना लाल नरवरिया के भतीजे योगेश को प्रत्याशी बनाया है। जिसकी वजह से इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला होता नजर आने लगा है। इस सीट पर कोई एक मुद्दा फिल्हाल हावी नही है। यहां पर मूलभूत सुविधाओं के अलावा बिकाऊ और जातिवाद का मुद्दा भी अहम बना हुआ है। जनसंघ, भाजपा, कांग्रेस, बसपा, बहुजन संघर्ष दल और निर्दलीय प्रत्याशी भी जीत चुका है। यह बात अलग है कि सत्तर के दशक तक यह सीट पारंपरिक रुप से कांग्रेस की रही है। इसके बाद अगर 1980 के बाद से यहां नजर डालें तो कांग्रेस और भाजपा यहां से तीन-तीन बार जीत चुकी है। यह इलाके की पहली ऐसी सीट है जहां पर लगभग पिछड़ा वर्ग का पूरी तरह से प्रभाव रहा है। यही वजह है कि इस सीट पर पांच बार पिछड़ी जाति का प्रत्याशी जीत चुका है। इस सीट पर लोधी मतदाता भी प्रभावशाली हैं,यहां जातियगणित के चलते ही बसपा के नरेश गुर्जर और बहुजन संघर्ष दल के मुन्ना सिंह नरवरिया जीतकर सभी को चौका चुके हैं। इन सीटों की ही तरह इस सीट पर भी सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत समस्याएं लोगों के लिए मुश्किल बनी हुई हैं । उधर कांग्रेस प्रत्याशी हेमंत कटारे का बाहरी होने पर कहना है कि उनका विधानसभा क्षेत्र अटेर सीधे तौर पर मेहगांव से लगा है। मेरे पिता खुद इस सीट से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं। उनका इस इलाके के लोगों से आत्मीय लगाव रहा है। भाजपा प्रत्याशी ओपीएस भदौरिया का कहना है कि कांग्रेस के पास कुछ कहने को नहीं है , जिसकी वजह से ही सिंधिया और उनके समर्थकों पर 35 करोड़ रुपए में बिकने का निराधार आरोप लगा रहे हैं। दलबदल के मामले में भदौरिया का कहना है कि जनता ने कांग्रेस को विकास के लिए चुना था, लेकिन 15 महीने में कोई बड़े काम नहीं हुए। इसलिए हमें पार्टी छोड़ना पड़ी।

पहली बार मिला यहां मंत्री पद
अब तक के इतिहास में देखें तो यह पहला मौका है कि जब मेंहगाव विधायक को मंत्री बनाया गया है। दलबदल कर भाजपा में जाने की वजह से भले ही भदौरिया विधायक नहीं हैं, लेकिन मंत्री हैं। इस वजह से उनके समर्थकों में उत्साह बना हुआ है। यही नहीं उन्हें अपने समाज की एकजुटता का भी फायदा मिलता नजर आ रहा है। खास बात यह है कि इस जिले से भदौरिया के अलावा अरविंद भदौरिया भी मंत्री हैं। और वह दोनों एक ही खांप यानी भदौरिया हैं ।

कटारे को ससुराल का फायदा
कांग्रेस उम्मीदवार हेमंत कटारे की मेहगांव इलाके में ही ससुराल है। हालांकि वे पड़ौसी विस सीट अटेर विधानसभा से एक बार उपचुनाव जीत चुके हैं। बीते आम चुनाव में भाजपा के अरविंद भदौरिया से वे हार गए थे। अब फिर वे उप चुनाव में अपनी ससुराल से किस्मत आजमा रहे हैं। ससुराल की वजह से भी उन्हें फायदा अधिक हो रहा है।

एससी मतदाताओं पर नजर
इस सीट पर हर चुनाव में लगभग जातिगत प्रभाव के आधार पर ही प्रत्याशियों का चयन किया जाता है। यह सीट क्षत्रिय और ब्राह्मद्दण बाहुल्य है। इस वर्ग के प्रत्याशी होने की वजह से यहां पर गुर्जर-नरवरिया, बघेल और मुस्लिम निर्णायक भूमिका में आ जाते हैं। उपचुनाव में भाजपा ने क्षत्रिय, कांग्रेस ने ब्राह्मण और बसपा ने पिछड़ा वर्ग पर दांव लगाया है। इसके चलते इस बार एससी और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में आ चुके हैं।

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