सात दशक में क्षेत्रीय दल नहीं बना सके मप्र में पैठ

Regional parties could not enter MP in seven decades

भोपाल/राकेश व्यास/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश देश के उन गिने चुने राज्यों में शामिल है , जहां पर हर चुनाव में अनेक क्षेत्रीय दल प्रगट होते हैं , लेकिन चुनाव समाप्त होते ही उनका कोई पता नहीं चलता है। इस प्रदेश में सात दशक के दौरान कोई भी क्षेत्रीय दल मतदाताओं में अपनी पैठ नहीं बना सका है , जिसकी वजह से प्रदेश में सिर्फ राष्ट्रीय दलों का ही जलवा बना हुआ है। खास बात यह है कि बसपा और सपा जरुर अपनी नाम के लिए उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहे हैं। प्रदेश में 1951 में हुए विधानसभा के पहले चुनाव में 13 दल मैदान में थे, जो 2018 आते -आते 119 तक पहुंच गए।
खास बात यह है कि बीते आम चुनाव में तो इन दलों में से 116 को तो खाता भी नहीं खुल सका। दरअसल प्रदेश के मतदाताओं की तासीर ऐसी है कि क्षेत्रीय की जगह राष्ट्रीय दलों को अधिक महत्व दिया जाता है। यही नहीं इस प्रदेश में वाम दलों जैसी राजनीतिक पार्टियां भी अपना वजूद नहीं कायम कर सकी हैं। अब प्रदेश में उपचुनाव में भाजपा, कांग्रेस सहित बसपा सभी 28 सीटों पर चुनावी मैदान में है। इनके अलावा कुछ क्षेत्रीय दल भी मैदान में उतर कर किस्मत आजमा रहे हैं। इस मामले में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कई बार विशेष उद्देश्य को लेकर किए जाने वाले आंदोलन में कुछ लोग राजनीतिक लाभ हासिल करने का प्रयास करते हैं। आम आदमी पार्टी का जन्म भी इसी तरह से ही हुआ था।

आप का भी नहीं चल सका जादू
2012 में गठित आप पार्टी का प्रभाव जिस तेजी से देश में बढ़ा था , जिसके चलते ही उसके बाद हुए चुनाव में दिल्ली में इस दल की सरकार बन गई थी। दिल्ली में सरकार बनने की वजह से मप्र में भी नौकरशाह, उद्योगपति, युवा सहित बड़ी संख्या में लोग इस दल से जुडना शुरू हुए थे , लेकिन दल की कार्यप्रणाली के चलते बाद में इससे दूर होते चले गए और परिणामस्वरुप 2018 में हुए विस के चुनाव में पार्टी द्वारा उतारे गए सभी 208 सीटों में से किसीभी सीट पर उसे जीत हासलि नहीं हो सकी।

शिवसेना भी नहीं दिखा सकी असर
महाराष्ट्र में भले ही अभी शिवसेना की सरकार हो और इसके पहले भी बगैर शिवसेना की मदद के महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार न बन सकी हो लेकिन मप्र में यह दल भी अपना प्रभाव नहीं बना पाया। 2003 में शिवसेना के सभी 40, 2008 में सभी 28, 2013 में सभी 23 और 2018 में सभी 81 उम्मीदवारों की जमानत तक नहीं बच सकी। बीते आम चुनाव में मप्र में शिव सेना को महज 0.17 प्रतिशत ही वोट मिल सके थे।

एनसीओ का 1972 से पता नहीं
1972 में इंडियन नेशनल कांग्रेस (आॅर्गेनाइजेशन) यानी एनसीओ चुनावी मैदान में उतरी थी , लेकिन उसके बाद से इस दल का ही पता नही है। उस समय इस दल ने 23 उम्मीदवार उतारे थे , लेकिन उनमें से कोई भी नहीं जीत सका था। उस समय इस दल के सभी प्रत्याशियों की जमानत तक जप्त हो गई थी। तब पार्टी को महज 0.29 फीसद वोट ही मिल सके थे।

लोकदल : कोई प्रत्याशी नहीं जीता
1985 में लोकदल ने भी मप्र में कदम रखे थे , तब उसने 78 सीटों पर चुनाव लड़ा था । इसके बाद भी उसका कोई प्रत्याशी विस तक नहीं पहुंच सका था। उस चुनाव में 72 की जमानत जब्त हो गई। हालांकि इस दौरान पार्टी का वोट शेयर 1.06 प्रतिशत रहा था।

इस तरह की भी है राजनितिक पार्टियां
कई दल तो ऐसे हैं जिनके नमा शायद ही मतदाताओं ने सुने हों , इनमें भारतीय बहुजन पार्टी, भारतीय मायनॉरटिज सुरक्षा महासंघ, इंडियन जस्टिस पार्टी, जय मानवता पार्टी, मायनॉरटीज डेमोकेटिक पार्टी, मध्यप्रदेश नव निर्माण सेना, पीपुल्स रिपब्लिकन पार्टी, रहबर पार्टी, राष्ट्रीय परिवर्तन दल, प्रगतिशील पार्टी, परिवर्तन समाज पार्टी, अहिंसा समाज पार्टी, आरक्षण विरोधी पार्टी, इंडियन प्रजा बंधु पार्टी, महानवादी पार्टी के नाम शामिल हैं।

बीते चुनाव में नहीं बची वामदलों की जमानत
मप्र में लगभग हर चुनाव में कोई न कोई वामदल चुनाव में प्रत्याशी उतारता रहा है , लेकिन पर्कड़ नहीं होने की वजह से उनके प्रत्याशियों में से एकाध को ही कभी कभार सफल्ता मिल सकी है। बीते आम चुनाव की बात की जाए तो वाम दलों का कोई भी प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सका था। अगर पुराने इतिहास पर नजर डालें तो 1977 में 7 वामदल थे। इनमें सीपीआई के 47 व सीपीआईएम के 5 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतरे थे , लेकिन जीत कोई भी नहीं सका था। इसी तरह से 1957 में दो, 1962 और 1967 में सीपीआई का एक-एक उम्मीदवार जीता था।

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