हर साल लाखों खर्च के बाद भी पानी नहीं उगल पा रहे अधिकांश हैंडपंप…

Most of the hand pumps are unable to get water even after spending lakhs every year…

पीएचई विभाग के दावे खोखले साबित हुए…

भोपाल/अनिरुद्ध सोनोने/बिच्छू डॉट कॉम। राजधानी से सटे होशंगाबाद जिले में हर साल पीएचई विभाग आम लोगों को पेयजल संकट से निजात दिलाने के लिए लाखों रुपए खर्च कर रहा है, लेकिन फिर भी अधिकांश हैड़पंप पानी उगलने को तैयार नही हैं।
हालात यह हैं कि इस जिले के ग्रामीण अंचलों के तहत शामिल कम आबादी वाली बसाहटों में पेयजल व्यवस्था का काम लोक स्वास्थ्य ग्रामीण यांत्रिकी विभाग (पीएचई) के द्वारा हैंडपंप से की जाती है। इसके बाद भी फिलहाल जिले में अधिकांश हैंडपंपों से पानी नहीं निकल पा रहा है। जिसकी वजह से लोगों को पेयजल की भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार जिले में 8 हजार 631 हैंडपंप हैं। अधिकारी इनमें से महज सिर्फ 39 हैंडपंप ही बंद होने की बात स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। अगर विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो हर साल हैंडपंपों के सुधार पर लगभग 10 लाख रुपए से अधिक की राशि खर्च की जा रही है। जिसके चलते विभाग के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। बताया जाता है कि विभाग द्वारा रखरखाव के नाम पर राशि तो निकाली जाती है, लेकिन उसका उपयोग हैंडपंपों के सुधार कामों में नहीं किया जाता है। इस राशि को विभाग के अधिकारी और इंजीनियरों द्वारा सांठ-गांठ कर गोलमाल कर दिया जाता है। विभाग के अफसर एसके गुप्ता के दावे के मुताबिक जिले में 8 हजार 631 हैंडपंप हैं। इसमें से 8 हजार 592 हैंडपंप अभी चालू हैं। कहा जा रहा है कि वास्तव में जो आंकड़े विभाग बता रहा है वह सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी कई हैंडपंप लंबे समय से खराब पड़े हैं।

एक शराब की बोतल में हो जाता है काम
सूत्रों की माने तो विभाग के सोहागपुर में पदस्थ एक अफसर तो दिन भर सुरुर में रहते हैं। उनके बारे में नाम न छापने की शर्त पर एक ठेकेदार का कहना है कि अगर उनसे कोई काम करवाना है तो उन्हें एक शराब की बोतल देकर कोई भी काम करावाया जा सकता है। जिले में पदस्थ अफसरों की हालत यह है कि वे मैदान में निकलना ही मुनासिब नहीं समझते हैं। जिसकी वजह से जमीनी हकीकत सामने नहीं आ पाती है।

इस तरह के हैं हाल
सूत्रों की मानें तो विभाग के अफसर सिर्फ कार्यालय में बैठकर काम करते रहते हैं। विभाग द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में एक हैंडपंप के रखरखाव पर करीब ग्यारह सौ रुपए खर्च बताया गया है। जबकि हैंडपंप के मेंटनेंस के 2 हजार से 5 हजार के बिल लगाए जाते हैं। विभाग में अधिकारी और ठेकेदार मिलकर मेंटनेंस के नाम पर गड़बड़ी कर बाकी रकम हजम कर जाते हैं।

Related Articles