मध्य प्रदेश में एफसीआई की लापरवाही पड़ रही है शिव सरकार को भारी

 केन्द्रीय एजेंसी एफसीआई

-गोदाम खाली नहीं हो पाने की वजह से यह गेहूं गोदामों के साथ अस्थाई शेडों में रखा हुआ है

भोपाल/प्रणव बजाज/बिच्छू डॉट कॉम।
केन्द्रीय एजेंसी एफसीआई द्वारा तय कोटे के तहत प्रदेश के गोदामों से गेहूं नहीं उठाने की वजह से मप्र सरकार के सामने नई मुसीबत में आ गई है। अब गेहूं का प्रदेश में बड़े पैमाने पर उपार्जन हो रहा है, ऐसे में गेहूं का सुरक्षित भंडारण करना मुश्किल बन रहा है। यही वजह है कि प्रदेश के गोदामों में अभी भी 60 लाख मीट्रिक टन गेहूं का भंडारण बना हुआ है। इसकी वजह से पर्याप्त मात्रा में गोदाम रिक्त नहीं हुए हैं। अगर जल्द ही पुराने गेहूं का उठाव नहीं किया गया तो नए गेहूं  के भंडारण  के लिए जगह नहीं बन सकेगी। यही वजह है कि प्रदेश सरकार को बड़ी मात्रा में सायलो बैग और अस्थाई शैड बनाने में राशि खर्च करनी पड़ रही है। इसके बाद भी उपार्जित पूरे गेहूं का सुरक्षित भंडारण करना मुश्किल बना रहेगा। यह हालात प्रदेश में तब बने हुए हैं जबकि इस बार एक करोड़ पंैतीस लाख मीट्रिक टन गेहूं उपार्जित करने का लक्ष्य तय किया गया है। यह देश में सर्वाधिक गेहूं उपार्जित करने का किसी भी प्रदेश का सर्वाधिक लक्ष्य है। इस मामले में मप्र इस बार पंजाब को पीछे छोड़ने जा रहा है।

एफसीआई की गेहूं उठाने में की जा रही लापरवाही का नतीजा यह है कि सरकार चाहकर भी प्रदेश के सभी किसानों का गेहूं खरीदने की स्थिति में नहीं आ पा रही है। इसकी वजह से किसानों को खुले बाजार में अपनी फसल बेचने के लिए भी प्रेरित करना मजबूरी बनती जा रही है। दरअसल प्रदेश में बीते माह की 27 मार्च से सरसों और मसूर की फसल का भी उपार्जन किया जा रहा था और इसके दो दिन बाद 1 अप्रैल से गेहूं का उपार्जन भी शुरू कर दिया गया है। इस बीच अचानक बदले मौसम की वजह से किसानों में अपनी फसल जल्द बेचने की होड़ मच गई है। इस वजह से प्रदेश की तमाम मंडियों में ट्रेक्टर ट्रालियों की लंबी लाइनें लगना शुरू हो चुकी हैं। इसकी वजह है खरीदी केन्द्रों में पर्याप्त व्यवस्थाओं का न होना। खास बात यह है कि इन खरीदी केन्द्रों पर टोकन देने के बाद भी किसानों को लंबा इंतजार फसल विक्रय के लिए करना पड़ रहा है। यही वजह है कि सरकार द्वारा साफ किया जा चुका है कि अगर कहीं किसानों को फसल का समर्थन मूल्य से अधिक दाम मिलता है तो वे फसलों को वहां बेच सकते हैं। इसके साथ ही अगर किसानों को कोई परेशानी हो रही है तो वे अपनी समस्या समाधान के लिए कमल सुविधा केन्द्रों व मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की भी मदद ले सकते हैं।
नाथ का फैसला बना मुसीबत की बड़ी वजह
दरअसल प्रदेश में जब कमलनाथ सरकार के समय बगैर केन्द्र की सहमति के मनमर्जी करते हुए किसानों को 160 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस दिया गया था। इसकी वजह से केन्द्र सरकार ने मप्र में खरीदे गए गेंहू में से 6 लाख 45 हजार मीट्रिक टन गेहूं को सेंन्ट्रल पूल के तहत लेने से इंकार कर दिया। इसकी वजह  से प्रदेश के गोदामों में रखा गेहूं का उठाव नहीं हो सका। इसकी वजह से अब प्रदेश सरकार इस गेहूं की नीलामी करने की तैयारी कर रही है। यह गेहूं वर्ष 2019 -20 में खरीदा गया था।  
लगातार दूसरे साल पंजाब से आगे रहेगा मप्र
मप्र देश का ऐसा प्रदेश बन चुका हैं , जहां पर सर्वाधिक गेहूं का उपार्जन किया जाता है। बीते साल भी इस मामले में मप्र ने पंजाब को पीछे छोड़ दिया था। यही स्थिति इस बार भी बनती दिख रही है। बीते साल मप्र में कोरोना के बाद भी एक करोड़ 29 लाख मीट्रिक टन गेंहू की खरीदी की गई थी , जबकि इसका लक्ष्य इस बार पांच लाख मिट्रिक टन अधिक तय किया गया है। बीते साल सरकार द्वारा खरीदे गए गेहूं के एवज में 25 हजार करोड़ रुपए का भुगतान किया था। यह भुगतान इसके पूर्व के वर्ष से 11 हजार करोड़ रुपए अधिक था।
बीते साल का 22 लाख मीट्रिक टन अभी भी नहीं पहुंच सका गोदामों में
प्रदेश में गेहूं भंडारण की हालत यह है कि अभी भी बीते साल का करीब 22 लाख मीट्रिक टनगेहूं अब भी गोदामों में नहीं पहुंच सका है। गोदाम खाली नहीं हो पाने की वजह से यह गेहूं गोदामों के साथ अस्थाई शेडों में रखा हुआ है। इसकी वड़ी वजह है केन्द्र सरकार द्वारा तय मात्रा में गेहूं का उठाव नहीं किया जाना। एक साल बाद भी प्रदेश में खरीदे गए गेंहू में से सिर्फ 83 फीसदी ही गेहूं अब तक परिवहन हो पाया है।

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