अब आसान नहीं होगा अवैध उत्खनन

Illegal mining will not be easy now

भोपाल/मनोज विजयवर्गीय/बिच्छू डॉट कॉम। प्रदेश में अवैध उत्खनन रोकने सरकार अब सैटेलाइट की मदद लेगी। इसकी तैयारियां की जा रही है। राज्य सरकार ने अपनी वर्ष 2010 में जारी खनन नीति में कहा भी था कि अवैध उत्खनन का पता चल लगाने के लिए हाई रेजोल्यूशन सैटेलाइट डाटा का प्रयोग किया जाएगा। दरअसल माइनिंग सर्विलांस सिस्टम एक तरह का पोर्टल होता है। जो सेटेलाइट से जुड़ा होता है इसमें स्वीकृत गौण खनिजों की खदानों के नक्शे केएमएल फाइल यानी कीहोल मार्कअप लैंग्वेज फाइल के रूप में दर्ज किए जाते हैं। इन फाइलों को गूगल अर्थ से लिंक कर दिया जाता है। यदि ठेकेदार स्वीकृत खदान क्षेत्र की सीमा से बाहर जाकर खनन करता है, तो यह सिस्टम से तुरंत पकड़ में आ जाता है, क्योंकि सैटेलाइट इसकी सूचना दे देता है।

केंद्र ने सिस्टम चार साल पहले लांच किया, राज्य सरकार पीछे
दरअसल केंद्र सरकार ने सबसे पहले इसकी शुरूआत करते है मुख्य खनिजों का अवैध उत्खनन पता लगाने के लिए वर्ष 2016 में माइनिंग सर्विलांस सिस्टम लांच किया था। साथ ही राज्य सरकारों ने कहा था कि खनिजों के अवैध उत्खनन जानने के लिए वे स्वयं यह सिस्टम लांच करें, लेकिन 4 साल में भी राज्य सरकार यह सिस्टम लॉन्च नहीं कर पाई। हालांकि इस सिस्टम को बनाने का काम किया जा रहा है। इसकी गति धीमी है। वहीं भारत सरकार के महालेखापरीक्षक (कैग) ने जांच में पाया गया है कि वर्ष 2015 से वर्ष 2018 तक गौण खनिज के अवैध उत्खनन के 1005 प्रकरण आए। जिनमें 8 करोड़ 30 लाख रुपयों का जुर्माना लगाया गया। यह गौण खनिजों के अवैध उत्खनन के प्रकरणों में बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है।
कैग ने ने कहा है कि गौण खनिजों के लिए राज्य सरकार को माइनिंग सर्विलांस सिस्टम दिसंबर 16 से लागू करना था,, परंतु वह ऐसा नहीं कर पाई। प्रदेश में गौण खनिजों के अंतर्गत रेत, बजरी, मुरम, पत्थर-चट्टानें, संगमरमर आदि आते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में रेत का सर्वाधिक अवैध उत्खनन होता है। यही वजह है कि इसको लेकर सियासी राजनीति भी हमेशा गरम रहती है।

अवैध उत्खनन रोकने उपग्रह की मदद
विभागीय सूत्रों की मानें तो पूरे प्रदेश में गौण खनिजों के अवैध उत्खनन उपग्रह की मदद से पकड़ने के लिए माइनिंग सिस्टम बनाया जा रहा है। पचास प्रतिशत से ज्यादा जिलों ने इसके लिए अपनी स्वीकृति खदानों का डिजिटल रिकॉर्ड दे दिया है। बाकी जिलों का डिजिटल रिकॉर्ड आने पर सारा रिकॉर्ड सिस्टम में डाला जाएगा। उसके बाद उपग्रह की मदद से अवैध उत्खनन पता चल सकेगा और कार्रवाई हो सकेगी।

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